ईश्वर सत्य है और सर्वत्र है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके प्रश्नोंके संक्षिप्त उत्तर निम्नलिखित हैं—

१—ईश्वर सत्य है और सर्वत्र है। तुकाराम, नामदेव, सूरदास, तुलसीदास, गौरांग महाप्रभु, श्रीरामकृष्ण परमहंस आदिपर अविश्वास करनेका कोई कारण नहीं है। जो भी भगवान‍्का सच्चा भक्त हो, वह आज भी भगवान‍्के दर्शन प्राप्त कर सकता है।

२—रूस तथा चीनमें क्या है और क्या नहीं है, यह तो विवादकी बात है। किंतु आप स्वयं कहते हैं कि वहाँ सम्पन्नताके साथ ईमानदारी-सत्य आदि हैं और भारतमें दरिद्रताके साथ चोरी-बेईमानी आदि। इसका अर्थ यही है कि दोनों स्थानोंके लोग अपने-अपने कर्मोंका फल भोग रहे हैं। भगवान‍्को केवल मुखसे मानना या न मानना कोई अर्थ नहीं रखता। मुखसे भगवान‍्को मानकर भी जो पाप करते हैं, उनका भगवान‍्को न माननेवालोंसे अधिक दु:खी रहना तो ठीक ही है। उनका अपराध तो और भी बड़ा हो जाता है।

३—भारतमें जो वर्तमान समाज है, व्यापक रूपमें वह अध्यात्ममें विश्वास कहाँ करता है? विदेशोंकी स्वतन्त्रताने उन्हें सिखाया कि सत्य-ईमानदारी आदिसे व्यावहारिक क्षेत्रमें लाभ होता है। जहाँ यह लाभ नहीं दीखता, वे लोग भी सद‍्गुणोंकी अपेक्षा नहीं करते। भारतकी पराधीनताने दरिद्रता दी और पाश्चात्य प्रभावने अर्थलोलुपता दी। दोनोंके मेलसे यहाँ छल, कपट, दम्भ आदिकी बहुलता हो गयी। अध्यात्मवाद यदि होता तो ये दुर्गुण आते ही नहीं। दुर्गुण तो आये ही हैं अर्थको प्रधान माननेसे। सद‍्गुण यदि कहीं व्यावहारिक कारणोंसे हैं भी तो उनकी नींव दुर्बल है। वे तो केवल भगवान‍्की मान्यताके आधारपर ही सुदृढ़ हो सकते हैं। किंतु वह आस्तिकता सच्ची होनी चाहिये। केवल मौखिक या दिखाऊ आस्तिकता तो दम्भ है।

४—श्री × × × × × × का चुनावमें विजयी होना केवल यह सिद्ध करता है कि लोग उनकी विचारधाराके हैं। वह विचारधारा ठीक है या गलत, यह इससे सिद्ध नहीं होता। रही भगवान‍्की बात, सो भगवान‍्के लिये तो सभी पुत्र समान हैं। मनुष्यकी कर्ममें स्वतन्त्रताका अर्थ क्या रहे, यदि भगवान् उसके कर्मोंको उलट-पुलट कर दिया करें। विजय, यश एवं सम्पन्नता यदि दम्भ या मक्‍कारीके फल हैं तो सभी दम्भी, मक्‍कार सफल या विजयी होने चाहिये। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि विजय, सम्मान, धन, सुख आदि मनुष्यको पूर्वजन्मके कर्मोंके फलसे (प्रारब्धसे) मिलते हैं। अपने वर्तमान पाप या पुण्यका फल तो उसे आगे भोगना पड़ेगा।

५—भगवान‍्ने द्रौपदीकी लाज तब बचायी, जब उसने कातरभावसे भगवान‍्को पुकारा। हमारे पास एक भी पत्र इस आशयका नहीं आया कि देश-विभाजनके समयके उपद्रवोंमें किसीने भगवान‍्को श्रद्धासे पुकारा हो और उसकी रक्षा न हुई हो। किंतु यह हमारा कितना मानसिक पतन है कि ऐसी दुरवस्थामें भी हमें भगवान‍्की याद नहीं आती।

६—एक संतकी भी अपने शरीरमें आसक्ति नहीं होती; तब भगवान‍्की भला मूर्तियों या मन्दिरोंमें आसक्ति कैसे हो सकती है, जो वे उनकी रक्षा करने दौड़ पड़ें। मूर्तिका महत्त्व तो आराधकके लिये है और यदि आराधक उसकी रक्षाके लिये प्राण देता है तो उसे भगवान‍्के लोककी प्राप्ति होती है। यदि वह भगवान‍्से ही मूर्तिकी रक्षाके लिये कातर पुकार करे तो वह भी सम्भव है; किंतु सच्चे भक्त तो कर्तव्यपर बलिदान होना ही पसंद करते हैं।

७—आप यह कैसे मानते हैं कि हिंदू-जातिका ह्रास पाप-पुण्यके विचारसे हुआ है? इतिहासमें जो जातियाँ लुप्त हो गयीं, क्या वे पाप-पुण्यके विचारके कारण लुप्त हुईं? सच तो यह है कि हिंदू-जातिने पुण्यको, धर्मको छोड़ दिया है, यही उसके ह्रासका कारण है। धर्म शक्ति देता है, दुर्बलता या कायरता नहीं दिया करता।

८—हमारे लोकनेता एवं हमारा नवशिक्षित समाज कैसा है, यह तो स्पष्ट है। सनातनधर्मकी रक्षा मनुष्यके किये होगी, यह तो सोचना ही अहंकार है। किंतु मनुष्यका कर्तव्य है—धर्मकी सेवा एवं रक्षाके लिये प्रयत्न करना; और जो भी विचारशील हैं, उन्हें अपने कर्तव्यका यथाशक्ति पालन करना चाहिये।

९—लक्ष्मी और कीर्ति तो प्रारब्धजन्य पुण्यके फलस्वरूप बढ़ती हैं। इस जीवनमें जो दम्भ, छल, कपट आदि करते हैं, वे कोई भी हों और लोग उन्हें कुछ भी कहें या समझें, अपने कर्मोंके फलस्वरूप अनन्त दु:ख तो आगे चलकर उन्हें भोगने ही पड़ेंगे।

१०—धन और कीर्ति प्रारब्धसे मिलते हैं।

११-१२—धन-कीर्ति-स्वास्थ्यादि भगवान‍्की प्रार्थनासे भी मिल सकते हैं। प्रार्थनाके लिये न कोई प्रकार है, न स्थान और न समय। पूर्ण विश्वाससे, अनन्य भावसे जो सहज कातर प्रार्थना होती है, वह कभी व्यर्थ नहीं जाती। प्रार्थना हृदयसे उठती है, उसे पुस्तकके द्वारा सीखा नहीं जाता। बँधे शब्द प्रार्थना नहीं हैं—भगवान‍्के प्रति अपने हृदयके सच्चे भावोंका पूर्ण विश्वाससे निवेदन करना ही प्रार्थना है।

१३—संध्या अवश्य करनी चाहिये। संध्या न करनेसे पाप लगता ही है।

१४—गायत्री-मन्त्रके आदि-अन्तमें प्रणव लगानेमें गृहस्थके लिये भी कोई दोष नहीं है।

१५—मनकी एकाग्रता तो अभ्याससे होती है। धैर्य एवं नियमपूर्वक अभ्यास करते रहनेसे धीरे-धीरे मन एकाग्र होने लगेगा।

१६,१७,१८—अनेक बातें ऐसी होती हैं, जो हमें सह लेनी चाहिये। यदि हम उन्हें सह नहीं लेते तो वे सुधरती तो हैं नहीं, उलटा हमें दु:ख होता है। माता-पत्नी-पुत्र आदि हमें प्रारब्धसे ही प्राप्त हुए हैं। हमें सबके साथ रहकर काम चलाना है। जैसे हमारे स्वभावमें अनेक दुर्बलताएँ हैं, वैसे ही दूसरेके स्वभावमें भी हैं। आप बम्बईमें जहाँ रहते हैं, वहाँ दूसरोंसे कैसे निभा लेते हैं। घरमें भी यदि आप वही व्यवहार करें तो बड़ी शान्ति मिलेगी। माताजी किसी बातपर बिगड़ें तो क्षमा माँग ली, पत्नीसे भूल हुई तो हँसकर कह दिया—‘तुमसे तो यह भूल होती ही है; अच्छा कोई बात नहीं।’ इससे दो बातें होंगी—(१)पत्नी और माताजी आपसे स्नेह करने लगेंगी। माताजी स्वयं कहेंगी—‘बिजली जल गयी तो क्या हुआ?’ यदि आप उनके कहनेसे पहले कहें—‘माताजी! क्षमा करें। कल मेरे दोषसे बिजली देरतक जली।’ पत्नी स्वयं अपने दोषोंको दूर करनेका प्रयत्न करेगी। (२) मान लीजिये, ये बातें न भी हों तो आपके चित्तको क्षोभ नहीं होगा। भूलें तो अब भी होती ही हैं। हम किसीको समझाकर या डाँटकर, झगड़कर ऐसा नहीं बना सकते कि वह हमारी इच्छाके अनुकूल ही चले। फिर यह बात भी नहीं है कि हमारा सोचना सर्वथा भूलसे रहित ही होता है। हम स्वयं नम्र बनकर, झुककर, क्षमा करके, विचार करके सबको निभा ले सकते हैं—चित्तकी शान्तिका यही उपाय है।

माताजीकी वृद्धावस्थाका ध्यान रखना चाहिये। उन्हें कष्ट नहीं होना चाहिये। बच्चोंकी पढ़ाई जहाँ ठीक हो, उन्हें वहीं रखना चाहिये, किंतु पत्नीको तो माताजीके पास ही रखना ठीक है।

आत्महत्या बड़ा भारी पाप है। इससे किसी कष्टकी निवृत्ति नहीं होती। प्रारब्ध तो आगे भी भोगना ही पड़ेगा और आत्महत्याके पापके फलरूपमें वह और घोरतर हो जायगा। अत: यह बात तो मनसे भी निकाल देनी चाहिये। भगवान् परम दयालु हैं। उनकी कृपापर पूर्ण विश्वास करके उन दयामयसे प्रार्थना करना ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।