ईश्वर-विश्वास
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपको ईश्वरपर पूर्ण विश्वास है और ईश्वरपर विश्वास रखते हुए ही आप दैनिक कार्यक्रम बनाते हैं, यह तो बहुत ही उत्तम है। जिनको ईश्वरमें पूर्ण विश्वास है, उनको भला मैं क्या लिखूँ। मेरा तो आपसे यही निवेदन है कि आप इस ‘पूर्ण’ विश्वासको ‘पूर्णतर’ बनाइये, जिससे अशान्ति और चिन्ताके लिये अवकाश ही न रहे। अशान्ति और चिन्ता इसीलिये होती है कि हम अपने मनकी कुछ चाहते हैं और सर्वज्ञ प्रभु हमारे हितके लिये उसकी पूर्ति नहीं करते। यदि हम अपनी चाह प्रभुकी मंगलमयी चाहमें मिला दें और प्रभुके प्रत्येक मंगलविधानमें अपना यथार्थ मंगल देखें तो फिर चिन्ता और अशान्ति रहेंगी ही नहीं। अशान्तिनाश और शान्तिकी प्राप्तिका बड़ा सहज उपाय भगवान्ने स्वयं बतलाया है—
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
(गीता ५। २९)
‘भगवान्को सब प्राणियोंका सुहृद् (अकारण भला करनेवाला) समझते ही शान्ति मिल जाती है।’ भगवान् हमारे सुहृद् हैं और सर्वज्ञ होनेके नाते यह भी जानते ही हैं कि हमारा भला किस बातमें है। फिर वे जो कुछ करेंगे, सब सहज ही हमारे भलेके लिये ही करेंगे। बस, ऐसा विश्वास होते ही शान्ति मिल जायगी।
अब रही मनके अनुकूल कार्य होने और अशान्त वातावरणसे बचनेकी चाह। इस सम्बन्धमें मेरा निवेदन यह है कि भगवान्में पूर्ण विश्वास होनेपर प्रतिकूल अशान्त वातावरणका अनुकूल शान्त वातावरणमें परिणत हो जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है; (यद्यपि ऐसी चाह है तो अबोधमयी ही और ऐसी चाहसे पूर्ण विश्वासकी भी कमी ही द्योतित होती है—इसीलिये तो हम भगवान्के मनकी होनेमें संतुष्ट न होकर अपने मनकी चाहते हैं, तथापि) परम शान्तस्वरूप नित्यानन्दमय प्रभुका विश्वास शान्तिका वातावरण भी कर ही देता है। आप अपने विश्वासमें और भी प्रगाढ़ता लाइये। आपका हृदय पिघल-पिघलकर प्रभुके ध्यानमें लग जाता है, यह तो बहुत ही उत्तम है। पर अपनेको भगवान्में पूर्ण विश्वासी मानते हुए भी आपका यह प्रश्न करना कि ‘क्या मैं आशा करूँ कि मुझे सफलता मिलेगी?’ कुछ अटपटा-सा लगा। भगवान्में विश्वास और जीवनकी सच्ची सफलता—दोनोंका एक ही अर्थ समझना चाहिये।
पुस्तक ‘भगवान् पर विश्वास’ पढ़िये। शेष भगवत्कृपा।