जीवन्मुक्तके द्वारा वस्तुत:कर्म नहीं होते
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला, धन्यवाद। आपने पूछा कि ‘जीवन्मुक्त पुरुषके द्वारा कर्म होते हैं या नहीं? यदि होते हैं तो किस प्रकार होते हैं?’ और इसके उत्तरमें विस्तारपूर्वक लिखनेका अनुरोध किया, यह आपकी कृपा है। परंतु पत्रमें बहुत विस्तारके लिये पर्याप्त समय चाहिये; अत: प्रश्नका उत्तर ठीक-ठीक समझमें आ जाय, इस दृष्टिको सामने रखते हुए मैं संक्षेपमें ही लिखनेका प्रयत्न करता हूँ।
जीवन्मुक्त पुरुषके द्वारा वास्तवमें कर्म नहीं होते; क्योंकि ज्ञानाग्निके द्वारा उसके समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है। श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥
(४। ३७)
‘अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्मसात् कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्मसात् कर देती है।’ उपनिषदोंमें भी देखनेमें आता है—
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
(मुण्डक० २। २। ८)
‘उस परावर परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर जड-चेतनकी एकात्मतारूप हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है—जड देहादिमें होनेवाले आत्माभिमानका नाश हो जाता है, समस्त संशयोंका उच्छेद हो जाता है और सम्पूर्ण कर्म (बीजसहित) नष्ट हो जाते हैं।’
वस्तुत: ‘कर्म’ संज्ञा वहीं सिद्ध होती है, जहाँ कोई ‘कर्ता’ होता है। जीवन्मुक्तमें कर्तापनका अहंकार रहता नहीं, इसलिये उसके द्वारा कर्म नहीं होते।
ऐसी बात होनेपर भी अन्त:करण तथा इन्द्रियोंके द्वारा यथायोग्य कर्म होते रहते हैं और राग-द्वेष, कामना-वासना तथा ममता-अहंकारसे रहित होनेके कारण वे कर्म सहज ही परम उज्ज्वल, आदर्शरूप तथा सबके लिये हितकारी भी होते हैं। जीवन्मुक्त पुरुषका न तो उन कर्मोंसे कोई सम्बन्ध होता है; क्योंकि उसका अन्त:करणसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और न उन कर्मोंके होनेमें कोई बाधा आती है; क्योंकि समष्टि चेतनकी सत्तासे बिना कर्तृत्वाभिमानके पूर्वाभ्यास तथा प्रारब्धानुसार वे होते रहते हैं।
हाँ, जीवन्मुक्त—भगवत्प्राप्त पुरुषके अन्त:करणमें काम-क्रोधादि विकार या दोष नहीं रहते; क्योंकि परमात्माकी प्राप्तिसे पूर्व ही अन्त:करणकी शुद्धि हो जाती है और उस अहंकाररहित शुद्ध अन्त:करणमें काम-क्रोधादि विकारोंके उत्पन्न होनेका कोई कारण नहीं रह जाता। आपने कुछ लोगोंके उदाहरण देकर जो काम-क्रोधादिका होना बतलाया है, इस सम्बन्धमें मुझे पता नहीं, वे लोग जीवन्मुक्त थे या नहीं; मान्यता तो सिद्धान्तकी होनी चाहिये, न कि किसी पुरुषविशेषके आचरणकी। शेष भगवत्कृपा।