‘कल्याण’ और गीता
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला, धन्यवाद। आप ‘कल्याण’ को बराबर पढ़ते आ रहे हैं—यह बड़ी प्रसन्नताकी बात है। ‘कल्याण’ एक धार्मिक पत्र है। सनातनधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली प्रत्येक बातका प्रचार ‘कल्याण’ द्वारा होता है। इसका प्रधान विषय अध्यात्म ही है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, निष्काम कर्मयोग, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, सदाचार, सतीधर्म, नारीधर्म आदि सभी विषयोंपर ‘कल्याण’ द्वारा प्रकाश डाला जाता है। हिंदूशास्त्रोंमें वेद, उपनिषद्, पुराण, महाभारत, रामायण आदि ग्रन्थोंका बहुत उच्च स्थान है; इन्हीं ग्रन्थोंमें हमारी संस्कृतिका परम दिव्य उज्ज्वल स्वरूप चित्रित है। अत: इन्हींके आधारपर ‘कल्याण’ में अधिकांश विचार प्रकट किये जाते हैं। इन सबमें भी गीताका स्थान महान् है। गीताके अनुसार जीवन बनानेसे मनुष्यका प्रत्येक व्यवहार आध्यात्मिक उन्नतिका—भगवत्पूजनका साधन बन जाता है। गीताने मुख्यत: दो निष्ठाओंका वर्णन करके उन्हें भक्तिके साथ संयुक्तकर ‘मणि-कांचन-योग’ उपस्थित किया है। ‘कल्याण’ किसी व्यक्तिके मतकी ओर आकृष्ट न होकर अपनी समझके अनुसार भगवान्के मतका प्रकाश करता है। ‘कल्याण’ गीताको कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों निष्ठाओंका प्रतिपादक मानता है। ‘कल्याण’ ने अबतक इसी नीतिसे गीताको देखने और समझनेका प्रयास किया है। ‘कल्याण’ किसी व्यक्ति या व्यक्तिगत सिद्धान्तका प्रचारक न होकर निष्पक्ष शास्त्रीय सिद्धान्तका ही प्रचार करना अपना ध्येय मानता है। पर ‘कल्याण’ किसीपर किसी सिद्धान्तको लादना भी नहीं चाहता। जो अपने शुद्ध दृष्टिकोणसे गीतामें केवल ‘संन्यास’ का प्रतिपादन मानते हैं, वे वैसी बात मान सकते हैं और जो केवल ‘निष्काम कर्मयोग’ को ही गीताका मुख्य सिद्धान्त मानते हैं, वे भी अपने मतके लिये स्वतन्त्र हैं। ‘कल्याण’ अपनी बात कहता है, किसीका खण्डन नहीं करता। ‘कल्याण’ यह दावा भी नहीं करता कि गीताके सम्बन्धमें वह जो मानता है, वही ठीक है। गीता श्रीभगवान्की वाणी है, इसलिये वह सभीके लिये उपयोगी है। जो जैसा अधिकारी है, गीताका उसके लिये वैसा ही उपदेश है। रत्नोंका समुद्र है गीता—जिसकी जैसी डुबकी, उसको वैसा ही फल। शेष भगवत्कृपा।