केवल भगवान् पर भरोसा कीजिये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। मेरी तो यही राय है कि आप दूसरोंकी ओर ताकना छोड़कर, दूसरोंकी कृपासे आपका कार्य हो जायगा—इस आशाको त्यागकर, सर्वशक्तिमान्, आपके सहज सुहृद् भगवान् पर भरोसा करके, अपना साधारण काम करते रहिये। भगवान‍्की इच्छा होगी तो उसीमेंसे आपका कार्य सफल हो जायगा। अपने-आप कोई-न-कोई ऐसी योजना बन जायगी, जो आपके अभावोंको मिटा देगी। मैंने देखा है—बड़े-बड़े कार्य करनेपर भी और ‘बस, बड़ी सफलता हो गयी’—ऐसा एक बार सामने दीख पड़नेपर भी परिणाममें असफलता होती है, उलटा परिणाम होता है और छोटे-से कार्यसे भी विलक्षण रीतिसे उद्देश्य सफल हो जाता है। कुछ ही दिनों पहलेकी बात है—एक परिवार बहुत चिन्तित था। उसके लिये उसके किसी सम्बन्धीने बड़ा व्यापार करवाया, खूब प्रयत्न किया; परंतु उसमें सफलता नहीं मिली। इसलिये वह काम बंद कर दिया गया। वह परिवार अपने पुराने छोटे-से व्यापारमें लगा रहा। उसने भगवान‍्को पुकारा और उसी छोटे-से व्यापारमेंसे ही कोई ऐसी योजना बन गयी कि थोड़े ही दिनोंमें वह परिवार अभावमुक्त होकर पर्याप्त साधन-सम्पन्न हो गया। डाली-पत्तोंको सींचनेसे क्या होगा? जड़में पानी देना चाहिये, जिससे सारे डाली-पत्ते आप ही पनपेंगे और वृक्ष पुष्पित-फलित हो जायगा।

एक बात और है—मनुष्य किसीके पास भी किसी चाहसे यदि जाता है तो वह प्राय: सम्मान नहीं पाता। संसारकी सहानुभूति चाहनेसे या माँगनेसे नहीं मिलती; उसकी ओरसे लापरवाह होनेपर—मुँह मोड़ लेनेपर मिला करती है। इसलिये द्वार-द्वार ठोकर न खाकर एक भगवान‍्का आश्रय लीजिये और उन्हींको पुकारकर अपने मनकी बात सुनाइये। दूसरे किसके सामने हृदय खोलेंगे? कौन आपकी दु:ख-कहानी सहानुभूतिके साथ सुनेगा? किसके पास इतना समय और ऐसा हृदय है, जो आपके लिये कुछ करेगा? एक भगवान् ही ऐसे हैं, जो पीड़ितों, दु:खियों, अभावग्रस्तों—और जिनको कोई भी नहीं जानता-मानता, कोई भी अपने पास बैठाकर दु:खकी कहानी सुनना नहीं चाहता—उनकी सारी दु:खगाथा सहानुभूतिसे सुनते हैं, उन्हें अपनाते हैं, उनकी सहायता करते हैं और उनके अभावोंको नाश करते हैं।

और यदि भगवान् ही चाहते हैं कि आपके अभाव बने रहें या आपकी मानी हुई सम्पत्ति, सुख-सुविधा, मान-इज्जत, संसारके प्रिय, आत्मीय और ममताकी वस्तुएँ आपके पास न रहें तो फिर किसीकी खुशामद करनेसे वह कैसे और कहाँसे दे देगा या बचा देगा? आप सच मानिये—संसारकी प्रत्येक वस्तु भगवान‍्की है। आपका शरीर और आप भी भगवान‍्के हैं। जब भगवान् ही अपनी उस वस्तुको यहाँ नहीं रहने देना चाहते, वे ही जब आपकी भाषामें ‘दया नहीं करते’, उसको यहाँसे उठा लेना चाहते हैं, तब आप माया-मोह करके उसे क्यों पकड़े रखना चाहते हैं। आपको तो वह वस्तु केवल सेवाके लिये सौंपी गयी है, मालिक तो वे ही हैं। यदि वे अपनी चीजको ले लेना चाहते हैं तो इसमें आपको क्षोभ या विषाद क्यों होना चाहिये? उनकी चीज उनके इच्छानुसार चाहे जैसे, चाहे जहाँ रहे, इसीमें आपको प्रसन्नता होनी चाहिये।

अतएव आप अपने मनकी इच्छा खुले दिलसे भगवान‍्के सामने रख दीजिये और उनसे कहिये कि वे जिस तरहसे, जिसमें आपका कल्याण समझें, वही करें। ऐसा न चाहकर यदि आप अपने मनकी ही बात चाहते हों तो भी अनन्य विश्वासपूर्वक केवल उन्हींको पुकारिये। वे या तो आपके मनकी बात कर देंगे या आपके मनसे उस बातको ही निकाल देंगे। दोनों ही हालतोंमें आपको वे अपना तो लेंगे ही। इसीका फल होगा—अचल सुख-शान्तिकी प्राप्ति। शेष भगवत्कृपा।