कुछ कामकी बातें

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तर संक्षेपमें इस प्रकार है—

(१) आपने अबतक भगवान् विष्णुको अपना इष्टदेव माना है, तब इस समय इस विषयमें शंका क्यों करते हैं? आप श्रीविष्णुको ही अपना इष्टदेव मानें। भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीशंकर सब भगवान् श्रीविष्णुसे अभिन्न हैं। विष्णुभगवान‍्की आराधनासे सबकी आराधना हो जाती है।

(२) आप भगवान् श्रीविष्णुके चित्रकी जिस प्रकार पूजा करते हैं, वह ठीक है। भगवान‍्को जड चित्र न मानकर चेतन आनन्दमय साक्षात् भगवान् मानना चाहिये और मन-ही-मन उनकी आज्ञा लेकर सारे कर्म करने चाहिये।

(३) प्रात:कालकी संध्या पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुँह करके करनी चाहिये। संध्या करते समय भगवान‍्की मूर्तिसे कुछ हटकर बैठ सकते हैं। असलमें भगवान‍्की ओर पीठ नहीं होनी चाहिये।

(४) पहले संध्या करके फिर भगवान‍्की पूजा करनी चाहिये।

(५) प्रात:काल संध्या करनेके बाद ही फल-दूध आदि लेने चाहिये। बीमारीकी स्थितिमें पहले भी ले सकते हैं।

(६) पेट सदा साफ रहेगा तो रोग नहीं होंगे। पेट साफ रखनेके लिये खान-पानमें संयम रखना आवश्यक है। मीठा न खाकर साग-सब्जी अधिक खानी चाहिये। रोटी चोकर मिले आटेकी होनी चाहिये। बीच-बीचमें एनिमासे पेट साफ कर लेना उत्तम है। बार-बार जुलाब लेना ठीक नहीं।

(७) प्रतिदिन, घरमें जो बड़े हों, उन सबको प्रणाम करना चाहिये। बड़े-बूढ़ोंको नित्य प्रणाम करनेसे आयु, विद्या, यश और बलकी वृद्धि होती है।

(८) स्त्रीके साथ मित्रवत् आचरण करना चाहिये। न उसका गुलाम बनना चाहिये और न उसे गुलाम बनाना चाहिये। उसे अर्धांगिनी मानना चाहिये और आदरके साथ उससे प्रेमका व्यवहार करना चाहिये।

(९) नित्य श्राद्ध न कर सकें तो माता-पिता आदिकी मरणतिथिपर तथा आश्विन कृष्णपक्षमें उनकी मरणतिथिके दिन तो श्राद्ध अवश्य करना चाहिये।

(१०) भगवन्नाम-जपमें कोई नियम नहीं है। बस, जप करना ही नियम है। श्रद्धा-प्रेम तथा निष्कामभाव हो तो सर्वोत्तम है। शेष भगवत्कृपा।