कुछ प्रश्नोंका उत्तर
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—
(१) पुरुषको ही गुरुकी शरणमें जाकर आत्मज्ञानका उपदेश लेना चाहिये, इसके लिये आप प्रमाण चाहते हैं। प्रमाण बहुत हैं, सबका संग्रह करनेसे पत्रका कलेवर बढ़ेगा; अत: दो-एक प्रमाण ही उपस्थित करते हैं। मु०उ०१।२।१२ के मन्त्रमें कहा गया है—
‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्।’
अर्थात् ‘उस नित्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये वह जिज्ञासु पुरुष गुरुकी ही शरण ले।’
तेरहवें मन्त्रमें कहा गया है कि गुरु उस शरणागत एवं शम-दमसम्पन्न शिष्यको ब्रह्मविद्याका उपदेश करे।
उक्त दोनों स्थलोंमें शिष्यके लिये पुँल्लिंग विशेषण आये हैं, स्त्रीलिंग विशेषण कहीं नहीं आया है। इससे पूर्वोक्त बातकी सिद्धि होती है। उपनिषदोंमें जितनी आख्यायिकाएँ आयी हैं, उनमें सब जगह पुरुष ही विभिन्न सद्गुरुकी शरण हुए बताये गये हैं, कहीं भी स्त्री शिष्यने तत्त्वज्ञानके लिये किसी गुरुकी शरण ली हो, यह नहीं आया है।
(२) गीतामें स्त्रियोंके लिये जो परम गतिकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह भगवान्की शरणमें जानेसे होती है। भगवान्ने (गीता ९।३२ में) श्रीमुखसे कहा है—
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
‘अर्जुन! मेरी शरण लेकर जो पापयोनि जीव हैं, वे तथा स्त्री, वैश्य एवं शूद्र भी परम गतिको प्राप्त होते हैं।’
भगवान् सबके अन्तरात्मा हैं, प्रियतम हैं, पति हैं तथा सद्गुरु हैं; अत: उनकी शरण लेनेसे स्त्रीके सतीत्वपर कोई आँच नहीं आती। परंतु जो पर-पुरुष यति, गृहस्थ अथवा विरक्त हैं, उनकी शरण लेनेसे स्त्रीके सती धर्मकी मर्यादाको ठेस पहुँचती है। अत: स्त्री भगवान्की उपासना तो कर सकती है, परंतु किसी पर-पुरुषको गुरु नहीं बना सकती। इसीलिये मैत्रेयीने अपने पति याज्ञवल्क्यजीसे ही तत्त्वज्ञानका उपदेश लिया, उन्होंने किसी दूसरे साधुको गुरु नहीं बनाया था।
(३) पत्नीको पतिसेवासे ही सब कुछ मिल जाता है, इस कथनके लिये प्रमाणोंकी कमी नहीं है। मनुस्मृतिमें कहा गया है कि ‘वैवाहिक विधि ही स्त्रियोंके लिये वैदिक संस्कार है। पतिकी सेवा ही उनके लिये गुरुकुलवास है तथा घरका काम-काज ही उनके लिये अग्निहोत्र है।’
वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक: स्मृत:।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया॥
(२। ६७)
स्त्रियोंके लिये अलग व्रत, यज्ञ और उपवासकी विधि नहीं है। वह जो पतिसेवा करती है, उसीसे स्वर्गलोकमें पूजित होती है—
नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम्।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते॥
(मनु० ५। १५५)
विष्णुपुराणमें वेदव्यासने महर्षियोंसे कहा है—नारी अपने पतिके हितमें संलग्न रहकर यदि मन, वाणी तथा कर्मसे उनकी सेवा करे तो अधिक क्लेश सहन किये बिना ही पतिरूप परमेश्वरका सालोक्य (उनके परम धाममें निवास) प्राप्त कर लेती है—
योषिच्छुश्रूषणाद् भर्तु: कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजा:॥
नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
(६। २। २८-२९)
(४) भगवान्ने गीता ९। ३२ में स्त्रीके लिये जिस ‘परा गति’ की प्राप्ति बतायी है, उसका साधन भी उन्होंने स्वयं कह दिया है—‘अपनी शरणागति’। यदि नारी अपने ‘पतिको’ भगवान्का प्रतीक मानकर भगवद्भावसे उसकी सेवा करे तो निश्चय ही उस परम गतिको पा सकती है। उपर्युक्त शास्त्रवचन इस कथनके समर्थक हैं।
(५)पतिव्रता स्त्री पातिव्रत्यके प्रभावसे ही दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेती है, इसके शास्त्रमें पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं—महाभारत वनपर्वमें पतिव्रताका उपाख्यान देखिये, जिसने एक तपस्वीके अभिमानको चूर्ण कर दिया था। तपस्वीने क्रोधपूर्वक एक पक्षीकी ओर देखा और वह जलकर भस्म हो गया। इसपर तपस्वीको अपनी तप:शक्तिका गर्व हो आया। वह एक गृहस्थके घरपर भिक्षाके लिये गया और आवाज दी। उस घरमें पतिव्रता ब्राह्मणी अपने पतिकी सेवामें लगी थी, उसने तपस्वीको ठहरनेके लिये कहा। जब वह देर करके भिक्षा लेकर द्वारपर आयी, तब तपस्वीने उसे भी क्रोधपूर्वक देखा। ब्राह्मणीने शान्तभावसे उत्तर दिया—‘बाबा! मैं वह पक्षी नहीं, जो तुम्हारे क्रोधसे जल जाऊँगी। भिक्षा लो और धर्मव्याधके पास जाकर कर्तव्यकी शिक्षा ग्रहण करो।’ ब्राह्मणके विनयपूर्वक पूछनेपर पतिव्रताने बताया—‘मुझे यह दिव्य ज्ञान पतिसेवाके प्रभावसे प्राप्त हुआ है।’ पद्मपुराणमें भी इस पावन इतिहासका वर्णन है। अरुन्धती और अनुसूयाजीकी पातिव्रत-शक्तिकी महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध है। अनुसूयाजीने अपनी पतिसेवाके प्रभावसे ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भी क्षणभरमें नवजात शिशु बना दिया था। वाल्मीकिरामायणमें अनुसूया-सीता-संवादमें पातिव्रत्यकी महामहिमाका वर्णन देखने और पढ़नेयोग्य है। आप उसे भी देख सकते हैं।
(६) पति ही स्त्रीका गुरु है—‘पतिरेको गुरु: स्त्रीणाम्’—यह वचन सर्वत्र प्रसिद्ध है। तीसरे प्रश्नके उत्तरमें जो मनुस्मृति २। ६७ का श्लोक उद्धृत किया गया है, उससे भी इसकी पुष्टि होती है। मीराँजी पतिकी मृत्युके बाद वृन्दावनमें जाकर भगवान्के शरणागत हुईं। पतिने तो उनके लिये भगवान्की आराधनाके निमित्त एक मन्दिर बनवा दिया था, जो आज भी चित्तौड़-दुर्गमें विद्यमान है। पतिके जीवनकालमें मीराँजी घर रहकर ही भगवान्की आराधना करती थीं। पतिकी मृत्युके बाद जब देवरने उन्हें बहुत सताया, तब वे घर छोड़कर वृन्दावनमें गयी थीं। सती स्त्री पतिकी आज्ञा लेकर परम पुरुष भगवान्की आराधना कर सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। शास्त्रमें कहीं भी स्त्रियोंके लिये पर-पुरुषको गुरु बनानेका दृष्टान्त नहीं मिलता। आपने लिखा है, बहुत-सी भक्त स्त्रियोंने सद्गुरुकी शरण ली है; परंतु उदाहरण एकका भी आपने नहीं दिया। शास्त्रीय उदाहरण प्रस्तुत करें कि किस सती स्त्रीने किस पर-पुरुषको गुरु बनाया है। भगवान्को गुरु बनाना तो ठीक ही है।
आपने लिखा है, स्त्रियोंके लिये भी भगवान्की शरणमें जानेके लिये गुरुकी आवश्यकता वैसी ही है, जैसी पुरुषोंके लिये। किंतु मेरी तुच्छ सम्मति यह है कि स्त्रियोंको दूरसे साधु-महात्माओंके सत्संग-व्याख्यान, उपदेश आदि तो सुनने चाहिये और भगवद्भाव होनेपर स्वयं मनसे भगवान्की शरण ग्रहण करनी चाहिये। गुरुकी शरण उनके लिये आवश्यक नहीं है। बहुत बार ‘गुरु’ के नामपर आजकल ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं, जो स्त्रियोंको भगवान्से विमुखकर अपनी नीच सेवामें लगा लेते हैं। ऐसे धोखेसे बचनेके लिये यह आवश्यक है कि स्त्री भगवान्को ही गुरु बनाये। मानव-गुरु पर-पुरुष होनेके कारण स्त्रीके लिये अस्पृश्य तथा अग्राह्य है और आजकलके दूषित युगमें तो विशेष सावधानीकी आवश्यकता है। शेष भगवत्कृपा।