कुसंगका त्याग तुरन्त कीजिये
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने जो बातें लिखी हैं, वे यदि सत्य हैं तो बड़ी भयानक हैं; आजकल छात्र-छात्रा कितना अनर्थ कर रहे हैं; छात्रोंकी यात्राओंमें क्या होता है—इसका पापपूर्ण चित्र आपने खींचा है। आप जो कुछ कर रहे हैं, वह आपके लिये बड़ा ही अशुभ है। उसका परिणाम बहुत ही बुरा होगा। आप जिन दुराचारी, व्यभिचारी छात्रोंको अपना अन्तरंग मित्र मानते हैं और जिन छात्राओंको अपनी संगिनी मानकर जीवनको कलंकित करते हैं, वे आपके शत्रु हैं और उनके साथ इस प्रकार पापके गढ़ेमें गिरकर उनके साथ आप भी शत्रुताका ही व्यवहार कर रहे हैं। आप सावधान हो जाइये। इस कुसंगको तुरन्त छोड़ दीजिये। आपके भाई आपसे बहुत ठीक कहते हैं। आप कॉलेजको छोड़ दीजिये। दूकानपर भाईके पास बैठिये। ऐसे पापके अड्डेमें रहनेसे तो हानि-ही-हानि है। जब आप ‘कल्याण’ को पढ़ते हैं, तब आपको अपने कुकृत्योंपर पश्चात्ताप होता है और आप उनसे छूटनेकी इच्छा करते हैं, पर साथियोंके मिलनेपर फिर वैसे ही कुकर्मोंमें लग जाते हैं—यह आपकी दुर्बलता है। पश्चात्ताप होना तो बहुत शुभ है; परंतु जबतक कुकर्म बनते हैं, तबतक असली पश्चात्ताप कहाँ है। वास्तविक पश्चात्ताप वही है, जो पुन: वैसा कुकर्म न करनेका दृढ़ निश्चय ही नहीं करा दे वरं उसे असम्भव कर दे। भगवान्से प्रार्थना कीजिये, मनको दृढ़ बनाइये,बार-बार सत्साहित्यका अध्ययन कीजिये। कुकर्मी साथियोंका परित्याग कीजिये। छात्राओंकी ओर तो देखना भी बड़ा पाप मानिये। उनसे कभी बोलनेकी भी इच्छा मत कीजिये। सिनेमा छोड़िये और भगवान्के कृपा-बलपर दृढ़प्रतिज्ञ होकर पापसे छूट जाइये। यह असम्भव नहीं है। भगवत्कृपा और उसके बलपर आपके सच्चे प्रयत्नसे यह पाप छूट जायगा। कुसंग किसी प्रकारका हो, उसका त्याग तुरंत आवश्यक है। शेष भगवत्कृपा।