कुसंगका त्याग करें

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके पतनमें मेरी समझसे तो कुसंग ही प्रधान कारण है। सिनेमाके शौकीनोंके साथ आपने मेल बढ़ाया, सिनेमा देखनेका आपको चस्का लगा। उसीके परिणामस्वरूप आपमें ये दोष आ गये हैं। सिनेमासम्बन्धी पत्रोंको पढ़ना और उनमें अभिनेत्रियोंके चित्रोंका बार-बार देखना भी पतनमें बड़ा कारण है। महाभारतमें कहा गया है—

वस्त्रमापस्तिलान् भूमिं गन्धो वासयते यथा।

पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणा:॥

असतां दर्शनात् स्पर्शात् संजल्पाच्च सहासनात् ।

धर्माचारा: प्रहीयन्ते सिद्ध्यन्ति च न मानवा:॥

(वनपर्व१।२३,३८)

‘जैसे पुष्पोंकी गन्ध अपने सम्पर्कमें आनेपर वस्त्र, जल, तिल (तैल) और भूमिको उसी प्रकारकी गन्धसे भर देती है, वैसे ही मनुष्यमें संसर्गजनित गुण (या दोष) आ जाते हैं।’

‘बुरे मनुष्योंके दर्शनसे, स्पर्शसे, उनके साथ बातचीत करनेसे तथा एक आसनपर बैठनेसे धार्मिक आचरण नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य किसी अच्छे कर्ममें सफल नहीं हो पाते।’

भगवान‍्की बड़ी कृपा समझिये, जो आपको अपने पतनका ध्यान हो आया। अब आप नीचे लिखी प्रतिज्ञा कीजिये—

(१) कभी सिनेमा नहीं देखेंगे।

(२) सिनेमासम्बन्धी पत्र, गंदे उपन्यास, नाटक या अन्य गंदी पुस्तकें नहीं पढ़ेंगे।

(३) स्त्रियोंके चित्र नहीं देखेंगे। स्त्रियोंके अंगोंका वर्णन न करेंगे, न सुनेंगे।

(४) नित्य प्रात:काल और सायंकाल संध्याके उपरान्त गायत्रीकी कम-से-कम एक माला (१०८ मन्त्र) का जप अवश्य करेंगे और सूर्यभगवान‍्से सच्चरित्रता प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करेंगे।

(५) प्रतिदिन गीताके एक अध्यायका अर्थसहित पाठ करेंगे।

(६) शौकीनी तथा विलासिताका त्याग करेंगे।

(७) जिनके संगसे आपमें ये दोष आये हैं, उनका संग त्याग देंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि उनसे वैर-विरोध करें या उनका अपमान-तिरस्कार करें; बल्कि उनका मनसे हित चाहते हुए ही उनके संगका त्याग करें।

(८) नित्य भगवान‍्की प्रार्थना करें।

(९) खर्चका हिसाब रखें। पिताजीसे खर्चके लिये आपको जो मिलता है, उसमेंसे कुछ बचायें और उसे किसी गरीबकी भलाईके लिये खर्च करें।

(१०) पिताजीके आदेशानुसार कारोबार देखनेमें समय लगायें और मन लगाकर काम करें।

(११) कभी निकम्मे न रहें। शेष भगवत्कृपा।