मैत्रीभावना कीजिये

प्रिय महोदय! आपका पत्र मिला। आपने कई स्थान बदल लिये, अब आप अपने स्वर्गीय पिताजीके घरमें रहते हैं; पर जहाँ जाते हैं, वहीं आपके प्रति सबका दुर्भाव हो जाता है, सभी आपको तंग करते हैं और अकारण ही लोग शत्रु बन जाते हैं—यह अवश्य बड़े दु:खकी बात है। पर इसमें आपकी गरीबी कारण नहीं है। गरीब तो बहुत लोग हैं और वे सबके साथ रहते भी हैं; पर सब लोग उनके शत्रु नहीं बनते। आप ढूँढ़िये—कहीं आपसे ही तो कोई ऐसी भूल नहीं होती, जो कहीं भी आपको मित्र नहीं प्राप्त होने देती? मेरी समझसे, ऐसी कोई बात अवश्य होनी चाहिये। आप मनमें ऐसे विचारोंको लाइये और उनका पोषण कीजिये कि ‘आप जहाँ रहते हैं, वहाँ आपके बहुत-से मित्र हैं, हितैषी हैं, आपका हित चाहनेवाले हैं।’ आपका ऐसा निश्चय होगा तो आपके व्यवहार-बर्तावमें कुछ ऐसी विलक्षण वस्तु आ जायगी, जो आपके शत्रुओं और विरोधियोंकी संख्या घटाकर उत्तरोत्तर मित्रों और हितैषियोंकी संख्या बढ़ा देगी और ऐसे लोगोंकी संख्या बढ़ती रहेगी। ज्यों-ज्यों मित्र अधिक दिखायी देंगे, त्यों-ही-त्यों आपकी मैत्री भावनामें और भी दृढ़ता आयेगी और ज्यों ही आप अपनेको अधिकाधिक लोगोंका मित्र बना लेंगे, त्यों ही आपको भी सर्वत्र मित्र-ही-मित्र दिखायी देंगे और आपका चारों ओरसे हित होगा। आप ऐसी दृढ़ भावना करके देखिये।

बहुत बार हम-आप ही अपनी संदेहभरी वृत्तिसे सबको संदेहकी आँखोंसे देखकर उनके मनोंमें भी संदेहकी सृष्टि कर देते हैं और फलत: द्वेषका अंकुर उत्पन्न हो जाता है। यदि हम मैत्रीभावना करके अपने प्रति लोगोंका विश्वास उत्पन्न करा दें तो लोग भी हमारे लिये विश्वासपात्र और हमारे हितैषी बन जायँगे। शेष भगवत्कृपा।