मन, बुद्धि आदिके स्वरूप

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—

(१) अन्त:करणमें जो मनन या संकल्प-विकल्प करनेकी वृत्ति है, उसीका नाम मन है। मन संशयात्मक होता है; उस संशय या संकल्प-विकल्पपर विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचानेवाली जो वृत्ति है, उसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि विचारपूर्वक निर्णय देती है। आत्मा इन दोनों वृत्तियोंका साक्षी अथवा द्रष्टा है। वह मन और बुद्धि दोनोंके कार्योंको तटस्थ रहकर देखता है। उसीके सहज प्रकाशसे मन, बुद्धि अपने कार्यमें समर्थ होते हैं। आत्मा मनका भी मन और बुद्धिकी भी बुद्धि है। यदि मन और बुद्धिको आत्माका आश्रय न प्राप्त हो तो वे सत्ताशून्यकी भाँति हो जाते हैं, फिर वे कुछ नहीं कर सकते। यही इन तीनोंका अन्तर है।

(२) मन जिस कार्यके लिये आज्ञा देता है, उसमें उसका कुछ राग या द्वेष अवश्य रहता है। वह प्राय: ऐसी प्रेरणाएँ देता है, जिनसे उसकी इच्छा पूर्ण हो। विषयसेवन या भोगसंग्रहकी प्रेरणा मनके द्वारा ही प्राप्त होती है। वह रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—भोगोंके प्रति आसक्त होता है; अत: उनकी ओर वह हमें आकृष्ट करना चाहता है। जीवको वह अपने पीछे चलाना चाहता है। किसी शत्रुसे बदला लेनेकी भावना भी मनमें होती है, अत: वैसे कार्य भी उसीकी प्रेरणासे होते हैं। उसमें द्वेष छिपा रहता है। राग और द्वेष ही क्रमश: काम और क्रोधके रूपमें परिणत होते हैं। इन्द्रिय, मन और बुद्धि—ये ही तीनों राग-द्वेष या काम-क्रोधके निवासस्थान हैं, अत: इनका प्रत्येक कार्य राग या द्वेषसे प्रेरित होता है। आत्मा इन सबसे ऊपर है, वह जबतक मन आदिके मोहजालमें फँसकर अपने स्वरूपको भूला हुआ है, तभीतक मनके इशारेपर चलता है। ‘मैं इन सबका स्वामी, शासक और इनसे सर्वथा विलक्षण हूँ। मैं सर्वत्र व्यापक एवं नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप हूँ।’—यह ज्ञान होते ही वह इन मन आदिका शासक हो जाता है; फिर तो ये ही आत्माके अनुशासनमें चलते हैं। विशुद्ध आत्मासे प्रेरित होकर जो कार्य होगा, उसमें राग-द्वेषकी गन्ध भी नहीं होगी। सबके प्रति मैत्री, दया, परोपकार, सेवा, भगवद्भजन, सत्संग तथा सत्कर्म आदिके भाव मनमें तभी जगते हैं, जब विशुद्ध आत्माकी प्रेरणा होती है। मन, इन्द्रिय आदि जब आत्माके अधीन होते हैं, तब इनके द्वारा कोई अशुभ कर्म नहीं होता। थोड़ेमें इतना ही समझ लें कि सद्धर्म एवं सद्भावपूर्ण कार्योंके लिये प्रेरणा आत्मासे मिलती है और राग-द्वेषपूर्ण कार्योंकी प्रेरणा मनकी ओरसे प्राप्त होती है।

जो कर्म राग-द्वेषरहित और वशमें किये हुए मन-इन्द्रियोंसे होते हैं, उनसे प्रसाद—चित्तकी निर्मलता-प्रसन्नता या भगवान‍्की कृपा प्राप्त होती है और उससे समस्त दु:खोंका नाश हो जाता है। भगवान् कहते हैं—

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।

(गीता २।६४-६५)

(३) विशुद्ध आत्माका नाम ही परमात्मा है; दोनोंमें कोई भेद नहीं है। इस आत्मा या परमात्माका कभी पतन नहीं होता। जैसे घटाकाश या महाकाशमें कोई अन्तर नहीं, वैसे ही शरीरान्तर्यामी आत्मा और परमात्मामें भी कोई अन्तर नहीं। मन, प्राण और सूक्ष्म इन्द्रियोंका समुदाय ‘सूक्ष्मशरीर’ कहलाता है। यह स्थूलशरीरके भीतर रहता है। इसीकी प्रेरणाके अनुसार स्थूलशरीरद्वारा क्रियाएँ होती हैं। इस सूक्ष्मशरीरके साथ तादात्म्य हुए आत्माको ‘जीव’ कहते हैं। इसी सूक्ष्मशरीरमें राग-द्वेषमूलक प्रवृत्ति होती है; अत: उसीका पतन होता है। वही नरकमें और वही स्वर्गमें भी जाता है। उसीका जन्म और उसीकी मृत्यु होती है। इस प्रकार आत्मा जबतक इस सूक्ष्मशरीरको अपना स्वरूप मानता है, तभीतक उसके सुख-दु:खसे वह सुखी-दु:खी होता है और विविध योनियोंमें भटकता रहता है—

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥

(गीता १३। २१)

‘प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक समस्त पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है।’ उस सूक्ष्मशरीरके ही पतनका आरोप लोग अज्ञानवश आत्मापर करते हैं। क्या घड़ेमें रखी हुई कीचड़का लेप आकाशमें भी लग सकता है? इसी प्रकार सूक्ष्मशरीरके दोष आत्माको छू भी नहीं सकते। अत: सूक्ष्मशरीर या उसका अभिमानी जीव पतित होता है, आत्मा या परमात्मा नहीं।

(४) आत्मा या परमात्मा अनादि और अनन्त है। जन्म लेता है सूक्ष्मशरीर और वही मरता भी है। अज्ञानवश लोग आत्मापर उसका आरोप करते हैं। मनुष्य जन्म लेता है, इससे आत्माका जन्म लेना कैसे सिद्ध हुआ? एक विशेष प्रकारके शरीरको मनुष्य कहते हैं। आत्माका शरीरसे क्या सम्बन्ध? सूक्ष्मशरीरके द्वारा जो शुभाशुभ कर्म सम्पादित होते हैं, उन्हींके फलस्वरूप उसको मनुष्य आदि जीवोंके स्थूलशरीर प्राप्त होते हैं। शेष भगवत्कृपा।