मानव-शरीरका लाभ

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला, धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि अब तो आपको सब ओरसे मनको हटाकर उसे केवल भगवान‍्में ही लगाना चाहिये। आपकी आयु साठ वर्षसे ऊपर हो चुकी है। आजकलके जमानेमें पचास वर्षसे अधिक जीना तो घलुएका जीना है। भगवान‍्की बड़ी कृपा है, जो उन्होंने इस दुर्लभ मानव-शरीरमें इतने दिनोंतक रहनेका सुअवसर दिया। इस अवसरका पूरा लाभ उठाना चाहिये। इतनी बड़ी आयु पाकर भी मनुष्य यदि भगवान‍्के निष्काम और प्रेमयुक्त भजनसे अपने जन्म-जीवनको सार्थक न कर ले तो उससे बढ़कर भाग्यहीन और मूर्ख इस जगत‍्में दूसरा कौन हो सकता है।

यह सत्य है कि मन बहुत चंचल और दुर्धर्ष है; परंतु इस मनको भी वशमें किया जा सकता है। गौ नये खूँटेपर बँधनेमें पहले-पहले घबराती है; पर यदि कोई उसे बाँधे रखे और अच्छा खाने-पीनेको दे तो वह शीघ्र ही पुरानी जगहको भूलकर नयी जगहमें वैसे ही रम जाती है, जैसे पुरानी जगहमें रम रही थी। इसी प्रकार मन भी अभ्यास और वैराग्यसे वशमें किया जा सकता है। मन स्वभाववश जहाँ भी जाय, वहींसे हटाकर उसे भगवान‍्के चिन्तनमें लगानेका बार-बार प्रयत्न करे—यही ‘अभ्यास’ है। संसारके जितने भी नेह-नाते हैं, सभी क्षणभंगुर हैं, इस शरीरके साथ समाप्त हो जानेवाले हैं। (स्वार्थमें बाधा आनेपर पहले भी टूट जाते हैं।) ये सभी मोहमें डालनेवाले हैं। इसी प्रकार संसारके सभी विषय-भोग क्षणभंगुर, अनित्य और दु:खरूप हैं। वे जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिके ही बन्धनमें डालते हैं। यह सोचकर उनकी ओरसे मुँह मोड़ लेना ही ‘वैराग्य’ है। सचमुच भगवान‍्के बिना जगत् सर्वथा दु:खालय है और भगवान‍्का नित्य संयोग परम सुखमय है। बार-बार मनको परमानन्दमय प्रभुके मधुर भजनमें लगाये और प्रभुसे रहित विषरूप विषयोंसे हटाये। यदि श्रद्धापूर्वक, बिना उकताये यह अभ्यास-वैराग्यका क्रम चलता रहेगा तो मन विषयोंसे हटकर सहज ही भगवान‍्में लग जायगा। भगवान‍्के भजनका स्वाद आनेपर तो यह फिर वहाँसे हटाये भी नहीं हटेगा।

ऐसा न हो सके—मन काबूमें न आता हो तो फिर सब साधनोंका आशा-भरोसा छोड़कर एकमात्र कृपासिन्धु भगवान‍्को आर्त होकर पुकारना चाहिये, भगवान‍्के चरणोंका आश्रय लेना चाहिये। भगवान् परम दयालु हैं, जीवमात्रके अकारण सुहृद् हैं। उनका नित्य-निर्भय आश्रय सदा सबके लिये खुला है। पापी-तापी, भला-बुरा—कोई भी, जो एकमात्र उनको ही अपना आश्रय मानकर विश्वासपूर्वक उन्हें पुकारता है—अपनी असमर्थताके लिये रो-रोकर उन्हें पुकारता है—भगवान् उसे अपना आश्रय देते हैं। जो उनकी ओर एक पग चलता है, भगवान् उसकी ओर अपनी चालसे चलकर तुरंत पहुँच जाते हैं। आप उनको पुकारिये। यह अमोघ उपाय है। आप भगवान् के—उनके नामके शरण हो जाइये। फिर आप भगवान‍्की परम सुखद गोदमें होंगे और वे अपना वरद कोमल कर-कमल आपके मस्तकपर फेरते होंगे। आप निहाल हो जायँगे। शेष भगवत्कृपा।