मरणमें भी कल्याण
प्रिय पण्डितजी महाराज! सादर प्रणाम। आपका दु:खभरा पत्र प्राप्त हुआ। छोटे भाईके रेलसे उतरते समय हाथ-पैर कट जाने और उसी चोटसे परलोकवास हो जानेकी दारुण घटना पढ़कर बड़ा खेद हुआ। उस तरुण सदाचारी एवं भगवद्भक्त बन्धुके साथ यह सहसा घटित वियोग आपको अत्यन्त शोक-संतप्त कर दे—यह स्वाभाविक ही है। मेरे हृदयमें आपके इस कष्टकी बातसे मार्मिक वेदना है; किंतु मनुष्यका वश ही क्या है। विधिका विधान अटल है। वह प्रभुकी इच्छाका ही प्रतीक है। प्रभु मंगलमय हैं। उनकी प्रत्येक इच्छा प्राणिमात्रके लिये मंगलमयी है। फिर आपके बन्धु तो भगवान्के भक्त थे। उनका एक लक्ष नाम-जपका नियम था, उनपर तो प्रभुकी अपार कृपा रही होगी ही।
प्रत्येक जीवको नियत समयतकके लिये शरीर मिलता है; यह प्रारब्धका फल अथवा प्रभुकी दी हुई धरोहर है। प्रारब्धके दिन पूरे होनेपर किसीका शरीर नहीं रह सकता। मालिक अपनी धरोहरको चाहे जब वापस ले सकता है; हमें कोई अधिकार नहीं कि उसे अधिक समय रखनेकी इच्छा करें। अभिमन्यु सोलह वर्षका तरुण था और उत्तरा भी तरुणी थी तथा बच्चा गर्भमें था। समस्त कुरुकुलका वह होनहार बालक भगवान्का भानजा था, फिर भी शरीरको आयुसे अधिक न रख सका। महाभारत-युद्धमें अनाथ-असहायकी भाँति वह मारा गया। क्या प्रभुने उसका अकल्याण किया; किसका किसमें भला है, इसे प्रभु जानते हैं और वे अपने ढंगसे सबका भला करते हैं। आपके भाईको प्रभुने अपनी सेवामें बुलाया। अन्यथा मरते समय प्रभुकी याद कैसे आती? आशा है, आप धैर्य धारण करेंगे। शेष भगवत्कृपा।