मोहका स्वरूप
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला था। आपने अपनी पत्नी, घर, व्यापार-उपार्जन, घरमें जेठानी-देवरानी, सास-बहू, छोटे-बड़े भाई, धन, महँगाई आदिका वर्णन करके सबको प्रतिकूल बताया और अन्तमें लिखा कि ‘संसारसे हट गया हो मोह जिसका, उद्देश्य हो इसी शरीरद्वारा ईश्वर-प्राप्ति—मोक्ष....., उस मनुष्यका क्या कर्तव्य है?’ इसके उत्तरमें यही निवेदन है कि आपने जिन सारी प्रतिकूलताओंका वर्णन किया है, वे ही तो संसारका स्वरूप हैं। उससे मोह हट जाना ही उस मोहसे छूटकर इसी शरीरद्वारा ईश्वरको प्राप्त करनेका उपाय है। आप लिखते हैं—‘मोह हट गया।’ मोह हट गया तो फिर इतनी प्रतिकूलताके दर्शन कैसे होते हैं? संसारको सत्य मानकर उसमें अनुकूलताकी खोज करना तो मोहका ही कार्य है—वस्तुत: यही मोह है। मेरी समझसे आपका मोह हटा नहीं है, प्रतिकूलतासे डरकर आप उससे पिण्ड छुड़ाना चाहते हैं। अत: यह निश्चय मानिये कि जबतक आप संसारको इसी रूपमें सत्य मानेंगे और भोगोंमें सुख है—यह समझते रहेंगे, तबतक प्रतिकूलतासे पिण्ड छूटेगा ही नहीं। मोहभंग यथार्थ होना चाहिये। यह मोह ही सारी प्रतिकूलताओंका मूल है, इसीसे सारी आधि-व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं और जीवको दु:ख भोगनेके लिये बाध्य होना पड़ता है—
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
(मानस ७।१२१।१५)
इस मोहका नाश होता है श्रीभगवान्की रहस्यमयी लीला-कथाओंको सुनने-समझनेसे और भगवान्के सच्चे भावोंकी कथा प्राप्त होती है—संतोंकी अनुभवयुक्त वाणीसे। अतएव जितना और जैसे हो सके, संतोंके वचनोंका मनन कीजिये—सत्संग कीजिये। तब असली मोहका नाश होगा और फिर कर्तव्यका प्रश्न रह ही नहीं जायगा। मोह मिटा कि भगवान्में प्रेम हुआ। प्रेम होनेपर अपने-आप ही जीवन उसी मार्गमें लग जायगा और सब ओर अनुकूलता और सुखका दर्शन होने लगेगा—
बिनु सतसंग न हरि कथा
तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद
होइ न दृढ़ अनुराग॥
(मानस ७।६१)
शेष भगवत्कृपा।