नारीका गुरु पति ही है

प्रिय बहन! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने लिखा कि जब किसी भी पुरुषको गुरु बनाना और उनकी शरण लेना स्त्रीके लिये पाप है, तब भगवान‍्को गुरु बनाना और उनकी शरण होना भी तो पाप ही होगा; क्योंकि भगवान् भी तो पर-पुरुष हैं। इसके उत्तरमें निवेदन है कि पतिव्रता स्त्रीके लिये तो शास्त्रोंकी यही आज्ञा है कि वह केवल पतिको ही गुरु माने और पतिमें ही परमेश्वर-बुद्धि करके उसकी सेवा करे। स्त्रीका गुरु एकमात्र पति ही है। बृहन्नारदीयपुराणमें कहा गया है—

भर्ता नाथो गतिर्भर्ता दैवतं गुरुरेव च।

(उत्तरभाग १४।४०)

‘स्त्रीके लिये पति ही स्वामी है, पति ही गति है, पति ही देवता और गुरु भी है।’

स्कन्दपुराण, काशीखण्ड तथा ब्रह्मपुराणमें उल्लेख है—

भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च।

तस्मात् सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्॥

(स्क० का० ४।४८)

‘स्त्रीके लिये पति ही देवता, पति ही गुरु और पति ही धर्म, तीर्थ तथा व्रत है। इसलिये सब कुछ त्यागकर वह एक पतिकी ही भलीभाँति सेवा-पूजा करे।’

गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु:।

पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु:॥

(ब्रह्म० ८०।४७)

‘ब्राह्मणोंके लिये अग्नि गुरु है, वर्णोंमें ब्राह्मण गुरु है, स्त्रियोंका पति गुरु है और अभ्यागत सबका गुरु है।’

भगवती सीताजीने कहा है—

पतिर्हि देवता नार्या: पतिर्बन्धु: पतिर्गुरु:।

प्राणैरपि प्रियं तस्माद् भर्तु: कार्यं विशेषत:॥

(वा० रा० ७। ४८। १७)

‘स्त्रीके लिये तो पति ही देवता, पति ही बन्धु तथा पति ही गुरु है। अतएव प्राण देकर भी नारीको विशेषरूपसे पतिका प्रिय कार्य करना चाहिये।’

पद्मपुराणमें पतिव्रता-शिरोमणि देवी सुकलाके इतिहासमें भगवान् विष्णुके राजा वेनके प्रति वचन हैं—

भर्ता नाथो गुरुर्भर्ता देवता दैवतै: सह।

भर्ता तीर्थं च पुण्यं च नारीणां नृपनन्दन॥

(भूमि० ४१।७५)

राजन्! पति ही स्त्रीका स्वामी, पति ही गुरु, पति ही देवताओंसहित उसका इष्ट देवता एवं पति ही तीर्थ तथा पुण्य है।’

इसलिये स्त्रीको पतिरूपमें ही परमेश्वरकी सेवा करनी चाहिये। तथापि स्त्री यदि भगवान‍्की पूजा-अर्चना करे तो उसमें कोई दोषकी बात नहीं है; क्योंकि भगवान् सबके अन्तरात्मा हैं, प्रियतम हैं, स्वामी हैं, सद‍्गुरु हैं तथा सर्वस्व हैं। अतएव परमात्माकी सेवासे सतीत्वमें कोई बाधा नहीं आती; वे पर-पुरुष नहीं हैं, वे तो अपने आत्मा ही हैं। हाँ, परमात्मा बननेवाले मनुष्योंसे अवश्य सावधान रहना चाहिये; क्योंकि वे निश्चय ही पर-पुरुष हैं और उनकी सेवासे सतीत्वकी मर्यादापर आघात लगना सम्भव है। अपने लिये तो भगवान‍्ने स्वयं ही कहा है—

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥

(गीता ९। ३२)

‘अर्जुन! जो प्राणी पाप-योनिवाले हों, वे भी तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्रादि भी मेरे शरण हो जायँ तो वे परम गतिको प्राप्त होते हैं।’

इसलिये भगवान‍्की उपासनामें कोई पाप नहीं है, वरं भगवान‍्की उपासना ही परम धर्म है। स्त्रीको पतिकी उपासना भी भगवान‍्की उपासनाके रूपमें ही करनी चाहिये—भोग प्राप्त करानेवाले किसी मनुष्य-विशेषके रूपमें नहीं। यही नारी-धर्म है। इस नारी-धर्ममें श्रद्धा-विश्वास तथा सत्यताके साथ लगी हुई स्त्रीको इसीसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। शेष भगवत्कृपा।