निराश न होकर भगवान् पर विश्वास कीजिये
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपने अपने स्वास्थ्यकी और अर्थसम्बन्धी जो परिस्थिति लिखी, वह अवश्य विचारणीय है। परंतु आपका यह सोचना कि ‘पत्नीसहित अपनेको समाप्त कर देना ही ठीक है’ बिलकुल उचित नहीं है। स्वाभाविक रूपसे मृत्यु आ जाय, तब तो कोई उपाय नहीं है; परंतु संसारके दु:खोंसे घबराकर आत्महत्याका विचार करना बड़ा अपराध है। आपको इतना निराश नहीं होना चाहिये तथा भगवान् पर विश्वास रखकर चिकित्सा करानी चाहिये। श्रद्धापूर्वक भगवान्से करुण प्रार्थना करनी चाहिये। दयामय भगवान् उचित समझेंगे तो आपकी स्थितिमें आश्चर्यजनक परिवर्तन कर देंगे। आप ईश्वरका चिन्तन और उनसे विनय करते हैं, यह बड़ी अच्छी बात है। विशेष श्रद्धा तथा विश्वासके साथ दोनों काम करते रहिये। ऐसा कोई काम नहीं, जो भगवान्की कृपासे न हो सके।
धैर्य रखिये और भगवान्को हृदयमें लाइये। जब मनुष्य विश्वास, धैर्य और ईश्वरकी शरणागतिके द्वारा अपनेमें पवित्र भगवदीय प्रकाशको जाग्रत् कर लेता है, तब उसका मार्ग बहुत सरल हो जाता है और समस्त निराशाएँ, समस्त दुर्भाव, जो उसे पद-पदपर भयभीत करते थे—पथभ्रष्ट करना चाहते थे, सहज ही नष्ट हो जाते हैं और उसकी मझधारमें झोंके खाती हुई-सी दीखनेवाली जीवन-नौका बड़े आनन्दके साथ पार पहुँच जाती है।
आप अपना पूरा नाम-पता कृपया तुरंत लिख भेजिये; पता मिलनेपर आपको व्यक्तिगत पत्रमें और भी एक ऐसा उपाय लिखा जायगा, जो ‘कल्याण’ में प्रकाशित नहीं किया जा सकता। आप घबराइये नहीं—‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न हरि नाम।’ आपकी पत्नी यदि ‘रामचरितमानस’ का नवाह्न-पारायण आपके रोग नाशादिके लिये—
‘दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥’
—यह सम्पुट लगाकर करती रहें तो बहुत उत्तम है। शेष भगवत्कृपा।