निष्काम और सकामका भेद
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद। मैं सकाम अनुष्ठानोंका ज्ञाता नहीं हूँ। इसलिये इस विषयमें आपकी कोई सेवा कर सकूँ, ऐसी स्थितिमें नहीं हूँ। क्षमा कीजिये।
मेरी समझसे तो आप जिस दु:खसे छुटकारा पानेके लिये सकाम अनुष्ठान करना चाहते हैं, वह दु:ख इससे मिटनेके बदले और भी बढ़ेगा। प्रथम तो सकाम अनुष्ठानमें विधि और श्रद्धाकी बड़ी आवश्यकता है; इनके बिना अनुष्ठान पूर्ण ही नहीं होता। आजके संयमहीन तथा अविश्वासी युगमें विधिका पालन और श्रद्धाका संरक्षण बहुत ही कठिन है। दूसरे, यदि अनुष्ठान कहीं पूर्ण हो भी जाय तो उससे किसीको अभीष्ट फल मिल ही जायगा—यह निश्चित नहीं है। आपके अभीष्ट फलमें बाधा देनेवाला प्रारब्ध कितना प्रबल है, यह कौन जानता है। कहते हैं कि विद्यारण्य स्वामीने गृहस्थ-जीवनमें तेईस गायत्री-पुरश्चरण धन-प्राप्तिके लिये किये; न उनकी श्रद्धा घटी और न धैर्य छूटा तथापि गायत्री देवीने उन्हें सफलता नहीं दी। तदनन्तर उन्हें वैराग्य हो गया और उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया। सर्वत्यागपूर्वक संन्यासग्रहण भी एक महान् पुण्य है—अत: यह उनका चौबीसवाँ अनुष्ठान हो गया। तब गायत्री देवीने प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा और बताया कि ‘तुम्हारे चौबीस महापातकोंका प्रतिबन्धक था। तेईस अनुष्ठानोंसे तेईस प्रतिबन्धक हटे। एक शेष था, वह संन्याससे दूर हुआ; तब मैं आयी।’ विद्यारण्य स्वामीने कहा—‘माता! अब तो मुझे धनकी न आवश्यकता है न कामना। आप लौट जायँ।’
इस उदाहरणसे यह सिद्ध होता है कि अमुक अनुष्ठानसे अमुक कार्य सफल हो ही जायगा, यह नहीं कहा जा सकता। प्रतिबन्धकके अनुसार ही कार्य होता है। अतएव अनुष्ठान करनेपर यदि कार्य सफल नहीं हुआ तो अश्रद्धा होगी, समय तथा अर्थ नष्ट करनेका पश्चात्ताप होगा, देवताके प्रति अवज्ञा होगी और इस नये पापसे दु:खदायी संचित कर्म और भी बढ़ेगा।
फिर असली बात तो यह है कि यदि किसी साधनसे संसारकी कोई वस्तु मिल भी गयी तो उससे क्या लाभ होगा। ममता बढ़ानेवाली वस्तु जितनी बढ़ेगी, उतना ही दु:ख और संताप तथा पापके साधन बढ़ेंगे। अन्तमें वह वस्तु तो छूट ही जायगी। तो उसे छोड़कर पानेवाला पहले मर जायगा अथवा वह वस्तु ही पहले नष्ट हो जायगी। संसारके पदार्थोंमें सुख मानना, उन्हें प्राप्त करने और अपना बनाने (उनपर प्रभुत्व स्थापित करने) में सुखका अनुभव करना, उनको बचाने तथा बढ़ानेके उपायोंको सोचना और प्रयत्न करना—यह एक महान् मोह है, जिसके कारण मनुष्य मानव-जीवनके वास्तविक उद्देश्य भगवत्प्राप्तिको भूलकर प्रमादमें लगा रहता है और अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही खो देता है।
मनुष्यका मनुष्यत्व तो एक ही बातमें है कि वह समस्त इहलौकिक और पारलौकिक मिथ्या भोग-सुखोंसे मुख मोड़कर अपने जीवनके प्रत्येक क्षणको बड़ी सावधानीके साथ श्रीभगवान्के स्मरण-चिन्तन, मनन और सेवनमें लगा दे। जगत्में प्रारब्धवश जो कुछ होना है, उसे निर्बाध होने दे। इसमें आत्माकी वास्तवमें कोई लाभ-हानि नहीं है। बल्कि दु:ख भोगनेपर जो पूर्वजन्मके अशुभ कर्मका बन्धन कटता है, यह लाभ ही होता है। इसलिये मैं तो सलाह दूँगा कि आप सकाम भावनाका त्याग करके भगवान्के निष्काम भजनमें मन लगाइये। देवताओंकी उपासना करनेमें आपत्ति नहीं है; परंतु उनसे भी यही माँगिये कि वे कृपापूर्वक भगवान्के चरणोंमें भक्ति होनेमें सहायक हों। अपितु समस्त अन्य शास्त्रीय कर्म करके भी सबका एक ही फल माँगिये—भगवच्चरणारविन्दमें अहैतुक प्रेम।
‘सबु करि मागहिं एक फलु
राम चरन रति होउ।’
जब आपके मनमें कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी चाह नहीं रहेगी और भगवान्के प्रति सहज प्रेम हो जायगा, तब श्रीभगवान् आपके मनको अपना निज घर मानकर उसमें सदाके लिये बस जायँगे—
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु
तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन
सो राउर निज गेहु॥
बस, इसीमें मानव-जीवनकी सफलता है। शेष भगवत्कृपा।