पापको घटाइये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने ब्राह्मण-जातिमें जन्म लिया है और आप व्याकरण-मध्यमाके तीन खण्डोंमें उत्तीर्ण और चतुर्थमें अनुत्तीर्ण हैं; फिर भी आपने यह बहुत बुरा काम किया है। किसी भी व्यक्तिकी मलिन वासनाको जगानेमें सहायता करना—वह भी अपने इन्द्रियसुखके लिये—मनुष्यकी बड़ी नीचाशयता है। उस विधवा बहिनको आप सगी बहिन मानकर उसकी सहायता करते, उसे इन्द्रियदमनके शुभमार्गमें प्रेरित करते तो वह आपका धर्म था; पर आपने बड़ी भूल की। तन-मन-धनका अर्पण तो भगवान‍्के प्रति होना चाहिये। यह अर्पण नहीं, वासनाकी गुलामी है, मोहवश अपनेको पतनके गर्तमें गिराना है। घर-परिवारके लोग इस बातसे अप्रसन्न हैं और आपको समझाते हैं तथा आपके न माननेपर विरोध करते हैं—यह उनका विरोध उचित ही है। आपका अपनी माँ-बहिन-भाई किसीसे प्रेम नहीं है—यह स्वाभाविक है। विषयवासनामें फँसे हुए मनुष्यमें प्रेम कहाँ रहता है, वह तो अंधा है। आपकी पत्नी अच्छी है, उससे ढाई सालकी एक बच्ची है; पर वह पत्नी आपको पैसेभर भी पसंद नहीं है, यह आपका दुर्भाग्य है। जो कुछ हो, अब जब कि आपने उस विधवा बहिनके साथ भी विवाह कर लिया है, तब उसको निबाहना भी आपका कर्तव्य हो गया है। किसीके जीवनको बिगाड़कर उसे छोड़ देना भी पाप है। अवश्य ही अभी तो आप उसे छोड़ भी नहीं सकते, वासनाकी बाढ़में बह जो रहे हैं। तथापि आपने जो यह लिखा कि ‘मैं लोभ-लालचमें फँसकर इस बुराईमें फँस गया, पर अब तो वह आशा भी समाप्त हो रही है’—इससे यह अनुमान होता है कि आपने उस विधवासे कुछ और भी लाभ उठानेकी आशा की होगी और अब वह नहीं पूरी होती दीखती, तब ऐसी बातें आपके मनमें आने लगी हैं। यह बड़ी नीची मनोवृत्ति है। मेरी रायमें आप अब दोनों स्त्रियोंको रखिये। दोनोंका समान भावसे पालन कीजिये और यथासाध्य दोनोंमें प्रेम बना रहे, ऐसी चेष्टा करते रहिये। पापका स्वरूप जितना छोटा हो, उतना ही अच्छा है। साथ ही कातर भावसे भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये। यदि उस विधवा बहिनके तथा आपके मनमें अब भी पवित्र भाव आ जाय और आपलोग शारीरिक सम्बन्धका त्याग कर दें तो पाप अब भी घट जायगा। भगवान‍्की विश्वासपूर्वक की हुई प्रार्थनासे ऐसी बात होनी असम्भव नहीं है। शेष भगवत्कृपा।