परमार्थके लिये धर्मपर चलना उत्तम है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके प्रश्नोंका उत्तर नीचे लिखा जा रहा है—

(१) सच्चा संन्यासी ऐश्वर्य, सुख-भोग और कीर्तिकी कामना नहीं कर सकता। संन्यासीका अर्थ ही है—सब कुछका सब प्रकारसे त्याग करनेवाला। जिसके मनमें सुख-भोग और कीर्तिकी कामना है, वह सर्वत्यागी यानी संन्यासी ही नहीं है। संन्यासी साधक यदि ऐसी कामना करता है तो उसका पतन होता है। योगी सिद्धियोंके द्वारा सुख-भोग प्राप्त कर सकता है, परंतु वह परमात्माकी प्राप्तिके मार्गमें विघ्न ही है। परमात्माको प्राप्त योगीमें सुख-भोगकी इच्छा नहीं होती। भगवत्प्राप्त भक्त या योगी भगवान‍्के इच्छानुसार तो सब कुछ कर सकते हैं। पर उनका कुछ भी करना न करना ही है।

(२) परमार्थके लिये धर्मपथपर चलना और परमार्थके लिये ही योगसाधन करना सर्वोत्तम है।

(३) एक ही व्यक्ति समस्त जगत‍्का सुधार कर सकता है यदि भगवान् उसे तदनुकूल शक्ति और मति दे दें।

(४) भगवान् रामकी भाँति पापियोंको मारनेका अधिकार भगवान् रामको ही है। वे साक्षात् परमात्मा हैं। उनकी देखा-देखी किसीको मारनेकी बात सोचना भी पाप ही है। हमें तो यही भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये और यही भावना करनी चाहिये कि भगवान् सबको सद‍्बुद्धि दें, सभी धर्मके पवित्र मार्गपर चलें, सभी सबका हित करें, सभी सुखी हों, सभी कल्याणको प्राप्त हों और सभी भगवान‍्की कृपा प्राप्त करें। इसीमें अपना तथा सबका कल्याण है। शेष भगवत्कृपा।