पतिका अत्याचार

मान्या बहन! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपकी दु:ख-कहानी पढ़कर बड़ा खेद हुआ। वस्तुत: वह पुरुष बड़ा ही भाग्यहीन और पापजीवन है, जो अपनी निर्दोष पत्नीपर अत्याचार करता है। गाली देना और मारना तो बहुत बड़े अपराध हैं। अपराध तो असत्कार करना भी है। एक धर्मप्राण राजाको केवल इसी पापके कारण नरकका हाहाकार सुनना पड़ा था। उन्होंने अपने जीवनमें एक बार पत्नीका तिरस्कार किया था। जैसे पतिको प्रसन्न करना पत्नीका कर्तव्य है, वैसे ही पत्नीको निर्दोष सुख पहुँचाना पतिका धर्म है। पति इस धर्मसे च्युत होता है तो वह घोर नरकका भागी होता है। जिस घरमें दु:खके भारसे पीड़ित होकर स्त्री रोया करती है, वह घर नष्ट हो जाता है—यह मनु महाराजकी घोषणा है। अतएव मुझे तो आपके पतिदेवसे यह कहना है कि वे अपने-आपको सँभालें। केवल ग्रन्थोंके अध्ययनसे कुछ नहीं होता, वास्तविक लाभ तो आचरणसे होता है। वे यदि इसी प्रकार क्रोधके वश होकर आपके प्रति अत्याचार करते रहेंगे तो उसका परिणाम उनके लिये लोक-परलोकमें बड़ा ही दु:खदायी होगा। साथ ही आपसे भी निवेदन है कि आप अपने स्वामीको उनकी होनेवाली इस दुर्दशासे बचानेका शुभ प्रयत्न करें। आप उनके लिये प्रेमयुक्त शुभ भावना करें। उनका स्वभाव बदलकर सात्त्विक हो जाय,इसके लिये विश्वासपूर्वक भगवान‍्से प्रार्थना करें। अपनी तपस्यासे भगवान‍्को संतुष्ट करके स्वामीके अपराधको उनसे क्षमा करायें। भगवन्नाम-स्मरण और भगवत्प्रार्थना ही आपके सुख-शान्तिके लिये अमोघ उपाय हैं। शेष भगवत्कृपा।