पतिकी भूल

प्रिय बहन! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके पतिदेव यों सदाचारी हैं, उच्च सरकारी पदपर काम कर रहे हैं, सब जगह उनकी प्रशंसा है, पर उनमें दो-एक बुरी आदतें हैं, जिनका आपने उल्लेख किया है। इसके लिये आपको अत्यन्त नम्रता और प्रेमसे काम लेना चाहिये। न तो लड़ना-झगड़ना चाहिये न आत्महत्याकी बात ही सोचनी चाहिये। बच्चेको देखकर आत्महत्याके विचार शिथिल पड़ जाते हैं, यह तो ठीक ही है। किसी भी हेतुसे आत्महत्याका विचार करना पाप है। आपको वे यह कह देते हैं कि ‘तुम्हारी-हमारी जीवनमें कभी नहीं बनेगी’, जिससे आपको दु:ख होता है, जो स्वाभाविक है। परंतु दु:खसे लाभ नहीं होगा। आप उनका सदैव मंगल चाहती हैं, उन्हें ईश्वरवत् मानती हैं—आपकी यह मान्यता तो हिंदू-नारीका गौरव है। इसके लिये आप बधाईकी पात्र हैं; परंतु उन्हें भी आपको सुख पहुँचानेकी ही चेष्टा करनी चाहिये। वे ऐसी चेष्टा नहीं करते, यह भूल करते हैं। पर उनकी भूल देखकर आप भी भूल करें और अपने धर्मको छोड़ दें, यह आवश्यक नहीं है। पत्नी अपने धर्ममें दृढ़ रहकर बिगड़े-से-बिगड़े पतिको ठीक रास्तेपर ला सकती है। यह सत्य है कि आजकल पतियोंने प्राय: अपना धर्म छोड़ दिया है और वे पत्नियोंपर या तो मनमाना अत्याचार करते हैं या वासनावश उनके गुलाम हुए रहते हैं। ये दोनों ही बातें ठीक नहीं हैं। जिस घरमें दु:खी स्त्रियाँ रोती हैं, वह घर नष्ट हो जाता है और जिस घरमें शास्त्रानुसार नियमाधीन व्यवहार न होकर अनर्गल विलास होता है वह घर भी बिगड़ जाता है, प्रेम और संयम—दोनोंकी आवश्यकता है। आप भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये कि आपके पतिदेवकी बुद्धि सुधरे तथा अपनी ओरसे उनके साथ अत्यन्त प्रेमका सहिष्णुतापूर्ण व्यवहार कीजिये। हिंदू-स्त्री मूर्तिमती तपस्या है, इसीमें उसका गौरव है और उसको अपनी अनादिकालीन परम्पराके अनुसार इस गौरवकी सदा रक्षा करनी चाहिये। शेष भगवत्कृपा।