पत्नीका सुधार

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने पत्नीके सम्बन्धमें जो बातें लिखीं, वे सचमुच दु:खदायिनी हैं और उनको लेकर आपके मनमें क्षोभ होना स्वाभाविक है; परंतु भूल होना मनुष्यके जीवनमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। मन-इन्द्रियाँ वशमें हैं नहीं, कुसंग मिल जाता है, तो आदमी गिर जाता है। पुरुषोंसे भी तो भूलें होती हैं। अतएव आप न तो अपनी हत्याकी बात सोचें, न किसी दूसरेकी ही। इसी प्रकार घर छोड़ने, संन्यासी हो जानेकी कल्पना भी न करें। आप अपनी पत्नीको अपने पास रखें, उसके अपराधको क्षमा करें। भूलका सुधार दण्डसे उतना अच्छा नहीं होता, जितना प्रेमसे होता है। आप उसपर दया करें, प्रेम करें, उसके साथ उत्तम-से-उत्तम व्यवहार करें और उसके जीवनको पवित्र बना लें। भगवान् आपका और उसका मंगल करेंगे। इस विषयकी चर्चा छोड़ दें। पापका सच्चा प्रायश्चित्त है—पश्चात्ताप और भविष्यमें वैसा पाप न करनेका निश्चय। आप प्रेमपूर्ण व्यवहार करके उसको समझायेंगे तो पश्चात्ताप भी होगा और भविष्यमें पाप भी नहीं बनेगा। ऐसा होना बड़ी बात नहीं है। इसे असम्भव न समझें। घरमें रहें, सुखी रहें और सबको सुखी बनायें। शेष भगवत्कृपा।