पवित्र प्रेमका जीवन त्याग है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने एक विधवा बहनके प्रति अपने शुद्ध प्रेमका उल्लेख करते हुए बताया कि आपके आचरण पवित्र हैं और प्रेममें कोई अपवित्रता नहीं है, सो ठीक है। यदि ऐसी बात है तो बहुत श्रेष्ठ है; परंतु आपको अपना अन्तस्तल फिर गहरी नजरसे देखना चाहिये। प्रेमके नामपर कहीं मोह तो नहीं है। ऐसे अवसरोंपर प्राय: मोह ही प्रेमका चोगा पहनकर आया करता है और उसके परिणामस्वरूप मनुष्यका पतन हो जाता है।

याद रखना चाहिये—प्रेम शरीरसे नहीं होता और प्रेममें अपना तनिक-सा भी स्वार्थ नहीं रहता। प्रेमी चाहता है प्रेमास्पदका एकान्त कल्याण—उसको परमानन्दमें देखना। प्रेमास्पदको इस प्रकार सुख पहुँचानेमें यदि प्रेमीको भयानक यन्त्रणाका भोग करना पड़े, तो वह उसे भी बड़े चावसे भोगता है। जो मनुष्य प्रेमके नामपर आत्मतृप्ति यानी अपने मन-इन्द्रियोंका सुख चाहता है, वह प्रेमी नहीं है, कामी है; क्योंकि उसका लक्ष्य प्रेम नहीं है, उसका लक्ष्य है लौकिक सुखादिका भोग।

आप अपनेको देखिये—यदि जरा भी मोह हो तो तुरंत उसको त्याग दीजिये। कई बार यह होता है कि मनमें कोई स्पष्ट वासना नहीं दीखती, न काम ही प्रतीत होता है; पर जिस प्रेममें शारीरिक आसक्ति होती है—उससे मिलने-देखनेको जी छटपटाता है, वहाँ छिपी कामना रहती ही है। ऐसे प्रेमका त्याग करनेमें ही दोनोंका कल्याण है। शारीरिक सुख या मानसिक आमोद-प्रमोदकी इच्छा निश्चय ही मोहकी प्रेरणासे होती है। वह देवी विधवा है, युवती है, उसका कल्याण है श्रीहरिके चिन्तनमें या परमात्मस्वरूप पतिके चिन्तनमें तथा संयम-त्याग-तितिक्षासे युक्त पूर्णरूपेण सादा जीवन बिताते हुए भगवान‍्का भजन करनेमें। किसी भी अन्य पुरुषके प्रति (विशुद्ध दीखनेवाला) आकर्षण भी उसके लिये भयकी वस्तु है। शरीरको सुखकी प्राप्ति हो; आमोद-प्रमोदसे उसका मन मुदित रहे—इस प्रकारकी चाह तो उसके और आपके दोनोंके ही लिये पतनकी ओर ले जानेवाली है। वह जब अनन्य भावसे अपने पतिका ही चिन्तन करेगी, पतिके वियोगमें व्रतपरायण, वैराग्यकी मूर्तिमान् प्रतिमा और तपस्यामें रत होकर रहेगी, तभी यथार्थ प्रेमदेवता परितुष्ट होंगे। वह आपके आकर्षणमें रहे और आप इसको सहन ही नहीं करें, प्रत्युत प्रोत्साहन देते रहें—इससे तो यही सिद्ध होता है कि आपके मनमें यथार्थ प्रेमदेवताके स्थानपर चुपकेसे कोई काम-पिशाच आ बैठा है! सच्चा प्रेमी—किसी पतिपरायणा स्त्रीका उसके अपने पतिके अतिरिक्त अन्य पुरुषके प्रति होनेवाला आकर्षण सहन ही कैसे कर सकता है। यह तो उसका पतन है और उस पतनको आप प्रेमी बनकर भी देख रहे हैं और उसे विशुद्ध प्रेम मान रहे हैं। पवित्र प्रेमका जीवन है—त्याग। आप जिससे प्रेम करते हैं, उसके लिये आपको त्याग करना होगा। आसक्तिको विशुद्ध प्रेममें कहाँ स्थान है। आपके द्वारा आसक्तिका व्यवहार न पाकर वह बहन यदि निराश होकर भगवान‍्के भजनमें लग जाती है तो यह उसके लिये परमकल्याणकी बात है। आप उसके साथ पवित्र प्रेम कीजिये उसे परम शान्तिमय पवित्र भगवद्धाममें पहुँचानेके लिये, जगत‍्के पदार्थोंसे प्राप्त होनेवाले क्षुद्र क्षणिक दु:खमूल शारीरिक और मानसिक सुखके लिये नहीं। इसके लिये यदि आपको उससे सर्वथा अलग होना पड़े तो वह भी आपके सच्चे प्रेमका एक अंग होगा। छिपी वासना बड़े सुन्दर-सुन्दर स्वाँग लाया करती है, उससे सदैव सावधान रहना चाहिये।

जगत‍्के लोग जो बदनामी करते हैं, उसमें भी कुछ सत्यता है। वे आपके मनको ही नहीं, बाहरी व्यवहारको भी पवित्र और परम आदर्श देखना चाहते हैं। आप जब उस बहनके साथ शारीरिक आसक्तिके व्यवहारसे अलग हो जायँगे, तब यह बदनामी अपने-आप दूर हो जायगी और तब आपका प्रेम विशुद्ध—यथार्थ विशुद्ध हो जायगा, जो आपके और उसके, दोनोंके लिये कल्याणकारी होगा।