पिताको राजी कीजिये या उनकी आज्ञा मानिये
सादर हरिस्मरण। पत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि सावित्रीके द्वारा सत्यवान्के वरण किये जानेके मूलमें पिताकी आज्ञा थी। सावित्री पिताकी आज्ञासे ही अपने योग्य वरको वरण करने गयी थी। स्वयंवरोंमें भी मूलत: पितृ-आज्ञा ही रहती थी। पिता जब स्वयं सुयोग्य वरका अन्वेषण नहीं कर सकता, तब वह कन्याको इसके लिये आज्ञा देता था। इसीसे कन्याके द्वारा किया हुआ वह वरण पिताको सहर्ष स्वीकार होता था। पर आपके प्रसंगमें ऐसी बात नहीं है। आपका वरण स्वेच्छाकृत है, जो हिंदू-दृष्टिसे अवैध है। अतएव इसमें धर्मत: सावित्रीका उदाहरण पूर्णरूपसे लागू नहीं होता। पर आपका मन दूसरेको स्वीकार करनेके लिये तैयार नहीं होता—यह एक बहुत कठिन प्रश्न है। वर्णके जन्मगत या कर्मगत होनेका विवादास्पद प्रश्न छोड़ दीजिये। मेरा मत तो इसमें आपके अनुकूल नहीं है। मैं तो विवाहादिके लिये जन्मकी ही प्रधानता मानता हूँ। अब इसके लिये सुन्दर उपाय तो दो ही हैं—या तो आप अपने पिताजीको समझाकर, उन्हें एक प्रकारका आपद्धर्म बतलाकर, अपनी करुण मानसिक स्थितिको उनके सामने रखकर—किसी उपायसे भी उन्हें आपके इच्छानुसार सम्बन्ध करनेके लिये तैयार कीजिये (यदि वे मेरी बात मानें तो मैं उन्हें परिस्थितिपर विचार करके आपके पक्षमें ही सम्मति दूँगा।) या आप अपनी बातको छोड़कर पिताजीके इच्छानुसार करनेके लिये तैयार हो जाइये।
आत्महत्या तो महापाप है, उसका तो विचार ही नहीं करना चाहिये। आत्महत्यासे आत्माकी अशान्ति तथा दु:ख-संकट बढ़ते हैं, किसी प्रकार भी घटते या मिटते नहीं। फिर वहाँ परतन्त्रता भी यहाँकी अपेक्षा अधिक हो सकती है। यहाँ पत्रव्यवहारकी सुविधा हो सकती है, पर वहाँ तो यह जाननेकी सुविधा भी किसीको नहीं होती कि कौन, किस लोकमें, कहाँ है। यह निश्चय है कि शरीरनाशसे आत्माका नाश नहीं होता—परलोक-पुनर्जन्म निश्चित हैं। उपर्युक्त दोनों बातें आप न कर सकें तो फिर भोग-विलासका मोह तथा आत्महत्याका विचार छोड़कर आपको दृढ़ताके साथ प्रसन्नतापूर्वक त्यागका असिधाराव्रत ग्रहण करना चाहिये। ऐसी स्थितिमें आप पिताजीसे स्पष्ट शब्दोंमें विनयपूर्वक निवेदन कर दीजिये कि ‘मैं प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि मैं दूसरेके साथ विवाह नहीं कर सकती; अत: मैं प्रसन्नताके साथ आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करूँगी।’ निश्चय करनेपर आपके लिये जीवनभर पवित्रताकी रक्षाके लिये कठोर संयमसे रहना अनिवार्य होगा। समय बहुत बुरा है, परिस्थिति पलटती है, मनुष्यके मनमें भाँति-भाँतिकी कमजोरियाँ भरी हैं, चारों ओर कुसंग है, पुरुषसमाज पतितप्राय है और आजका मनका भाव सदा बना रहनेमें भी संदेह है। ऐसी दशामें आजीवन ‘कुमारीव्रत’ ग्रहण करनेका निर्णय बहुत सोच-विचारकर करना चाहिये। नहीं तो—पीछे और भी अधिक भयानक दु:ख या पश्चात्ताप हो सकता है।