प्रणवका जप शुद्ध होकर करना चाहिये
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला, धन्यवाद। आपने सब समय ‘ॐ’ (प्रणव) के जप तथा संध्याके सम्बन्धमें जो कुछ पूछा है, उसके उत्तरमें निवेदन है कि ‘प्रणव’ का जप शुद्ध स्थितिमें ही करना चाहिये; हर समय, हर अवस्थामें नहीं। कइयोंकी ऐसी भी मान्यता है कि अकेले प्रणवका जप गृहस्थको नहीं करना चाहिये। किसी भगवन्नामके साथ जोड़कर—जैसे ‘हरि: ॐ’ ‘ॐ नमो नारायणाय’—इस प्रकार करना चाहिये। जो कुछ भी हो, अशुद्ध-अवस्थामें तो इसका जप निषिद्ध है ही। एकाग्र मनसे छ: महीनेतक नियमपूर्वक प्रणवका नित्य बारह हजार जप करनेसे संन्यासीकी चित्तशुद्धि होकर उसे तत्त्वसाक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त होती है—यह कहा गया है। जपकी संख्यासे जहाँ फलका विधान होता है, वहाँ श्रद्धा-सत्कार और एकाग्र मनसे किये जानेवाले जपकी बात ही समझनी चाहिये।
भजन-स्मरणको संध्या नहीं माना जा सकता; द्विजको प्राणायाम, सूर्योपस्थान तथा गायत्री-जपसहित संध्या अवश्य करनी चाहिये। त्रिकाल नहीं तो, प्रात:-सायं—दो समय तो अवश्य करें। गायत्रीकी एक-एक माला दोनों समय जप करें, नहीं तो कम-से-कम २१-२१ मन्त्रका जप तो अवश्य कर लें। शेष भगवत्कृपा।