प्रायश्चित्त
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि पापका वास्तविक प्रायश्चित्त है—घोर पश्चात्ताप और पुन: वैसा पाप न करनेकी दृढ़ प्रतिज्ञा। इस प्रकार पश्चात्ताप और पापकी पुनरावृत्ति न करनेकी प्रतिज्ञाके अनन्तर जो पापनाशके लिये भगवान्से प्रार्थना करता है, उसके पापोंका नाश हो सकता है। आपके मित्रने तो घोर पाप किया है। हमारे देशका महान् दुर्भाग्य है, जो नवयुवकोंकी इस प्रकारके पापोंमें प्रवृत्ति हो रही है। उन्हें सच्चे पश्चात्ताप एवं पुन: पाप न करनेकी दृढ़ प्रतिज्ञाके साथ ही भगवान्से कातर प्रार्थना करनी चाहिये एवं भगवान्के किसी नामका कम-से-कम दस लाख जप करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।