पुराणोंकी नागजाति
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। नागजातिके सम्बन्धमें आपकी ही भाँति अन्य भी अनेकों लोग शंका किया करते हैं। आजका युग ही शंकाका है। मनुष्य इतना अविश्वासी और अभिमानी हो गया है कि वह किसी भी शास्त्रकी बातपर विश्वास नहीं करना चाहता और अभिमानवश अपनी अत्यन्त सीमित बुद्धिके तराजूपर तौल-तौलकर सभीको मिथ्या सिद्ध करना चाहता है। नागोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें पुराणोंमें जो वर्णन आया है, उसे ध्यानपूर्वक पढ़ लेनेके बाद शंकाके लिये कोई स्थान नहीं रह जाता। महर्षि कश्यप नागोंके पिता हैं और कद्रू उनकी आदिमाता हैं। विविध प्राणियोंकी सृष्टिके लिये ही विधाताने इनको उत्पन्न किया था और इसलिये इनके मनमें भी वैसे ही संकल्प उठते थे। कद्रूने अपने स्वामीसे नागोंको ही पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान माँगा था। उनके संकल्पके अनुसार सत्यसंकल्प प्रजापति कश्यपजीने स्वयं भी ऐसा ही संकल्प किया और उस संकल्पके अनुरूप ही संतान उत्पन्न हुई। सर्प, पक्षी आदि जीव भी परमात्माके ही उत्पन्न किये हुए हैं; परंतु परमात्मा न सर्प हैं, न पक्षी। वे सब कुछ हैं और सबसे विलक्षण हैं। परमात्माने जैसा-जैसा संकल्प किया, वैसी-वैसी ही सृष्टि हुई। उन्हींकी कामनासे जगत् बना। ‘सोऽकामयत’। उन्हींका संकल्प प्रजापतियोंमें प्रतिफलित हुआ। ऐसी स्थितिमें कद्रूसे नागोंका और विनतासे पक्षिराज गरुडका उत्पन्न होना असम्भव तो है ही नहीं, आश्चर्यकी बात भी नहीं है।
नागों और गरुडके माता-पिता परम तपस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, सर्व-भवन-समर्थ और सत्यसंकल्प थे। उनमें बड़ी शक्ति थी। ये ही गुण उनकी संतानमें आये। वे भी अपने इच्छानुरूप शरीर धारण कर सकते थे। उनकी बड़ी शक्ति थी। देवताओंकी अवतारभूता किष्किन्धाकी वानरजातिकी भाँति नाग भी मनुष्योचित व्यवहार करते थे। नागलोकके नागोंका जो वर्णन मिलता है, उससे पता लगता है कि नागलोग कुण्डल और किरीट पहनते थे, वीणा आदि वाद्य बजाते तथा मधुर गीत भी गाते थे। कम्बल एवं अश्वतर नामक नागोंको तो साक्षात् भगवती सरस्वतीने वरदान देकर संगीत-कुशल बनाया था। इन नागोंकी कन्याएँ देवांगनाओंके सदृश परम सुन्दरी होती थीं। उनके शरीर दिव्य रूपसम्पन्न तथा अजर होते थे। इतनेपर नाग सर्परूपमें ही रहते थे; परंतु वह सर्पकी खाल वस्तुत: उनके लिये कवचका काम देती थी। वे जब मन करते तभी उसे समेटकर देवता और मनुष्यके रूपमें बदल जाते थे। जल, स्थल, वायु और आकाशमें सर्वत्र उनकी अबाध गति थी। अर्जुनका ऐसी ही नागजातिकी कन्या उलूपीके साथ विवाह हुआ था। महर्षि जरत्कारुकी पत्नी जरत्कारु और राजा पुरुकुत्सकी पत्नी नर्मदा भी ऐसी नागकन्याएँ ही थीं। भगवान् श्रीकृष्णके कालियदमनके समय कालियकी पत्नियोंने मनुष्यरूपमें भगवान्की स्तुति की थी, यह श्रीमद्भागवतमें प्रसिद्ध है। यह नागजाति दिव्य शक्तिसम्पन्न थी। इन नागोंमें और देवताओंमें शक्तिकी दृष्टिसे कोई विशेष अन्तर नहीं है। केवल योनिका भेद है। दोनोंके पिता एक ही हैं। जो इस रहस्यको जानते हैं, वे कभी इसे न तो अप्राकृत मानते हैं और न असम्भव ही। जिन परमात्माके संकल्पसे प्रकृति निरन्तर आश्चर्यमयी लीला करती रहती है, उनकी इच्छासे क्या नहीं हो सकता।