पुरुषका पाप
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके विचार पापपूर्ण हैं। आपको तुरंत अपनी चाल बदलनी चाहिये। निर्दोष स्त्रियोंपर होनेवाले इस प्रकारके अत्याचारोंने ही स्त्रियोंके मनोंमें पुरुषोंके प्रति घृणा उत्पन्न की है। पत्नीका यह धर्म कदापि नहीं है कि वह आपके पापमें सहायता करे—शराब पीये, व्यभिचार करे और आपकी व्यभिचार-प्रवृत्तिमें सहायक हो। आपका मानो कोई धर्म ही नहीं है। याद रखिये—स्त्री पुरुषकी गुलाम नहीं है, दासी नहीं है; वह अर्धांगिनी है, सखी है। उसका भी अधिकार है। उसके भी मन हैं, उसकी भी अपनी इच्छाएँ हैं, उसका भी अपना गौरव है। वह पत्थरकी शिला नहीं है। सुख-दु:खका अनुभव उसे भी होता है। आपका धर्म है—उसे सुख पहुँचाना, उसे मित्र मानकर उसको अपने बराबर समझना, उसकी इच्छाको मान देना; और उसको पापमें प्रवृत्त करनेकी बात तो कभी सोचनी ही नहीं चाहिये। स्त्री-पुरुष एक-दूसरेके पूरक हैं। आपका जो बर्ताव अपनी पत्नीके प्रति है और जिसे आप पत्नीके पातिव्रत्य धर्मके नामपर न्याययुक्त सिद्ध करना चाहते हैं, वह आपकी और भी हृदयहीनता है। इससे आप बड़ा धोखा खायेंगे। उसके साथ सद्व्यवहार करके उसके हृदयका मूक आशीर्वाद लीजिये। जहाँ स्त्री दु:खिनी होकर रोती है, वह घर नष्ट हो जाता है और जो पुरुष हृदयहीन होकर पत्नीको दु:ख देता है, उसे अगले जन्मोंमें विधवा स्त्री होकर विविध दु:ख भोगने पड़ते हैं। सावधान हो जाइये। शेष भगवत्कृपा।