सच्चे प्रेमका व्यवहार कीजिये!
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। मेरे पत्रके उत्तरमें आपका पत्र मिला। मेरी बातोंसे आपको साहस, धैर्य, शान्ति और उत्साह मिला—यह आनन्दकी बात है। आप प्रेमपूर्ण बर्ताव रखते हैं और रखेंगे, यह बड़ी अच्छी बात है। मैं चाहता हूँ—केवल बर्ताव ही नहीं, आप सचमुच हृदयसे प्रेम करें और पति-पत्नीवत् व्यवहार करें। बहुत अंशमें यही ठीक है कि उनसे भूल नहीं हुई होगी, पर यदि हो भी गयी है तो आप अपने विशुद्ध प्रेमसे ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दें, जिससे भविष्यमें ऐसी कोई भूल उनसे न हो। उनको प्रेमके हाथका सहारा देकर बचा लीजिये, धक्का कभी न दीजिये। यही उनके प्रति आपका सच्चा सद्व्यवहार होगा। इससे ईश्वर आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। किसीपर गिरनेका संदेह ही नहीं करना चाहिये, इसीमें लाभ है, पर यदि कदाचित् कोई कभी पैर फिसलकर गिर भी जाय तो उसे उठाना चाहिये, उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिये और उसको ऐसी स्थितिमें ला देना चाहिये कि जिससे पुन: उसके गिरनेकी सम्भावना ही न रहे। उनकी जगह आप होते तो क्या वे आपको त्याग देतीं, क्या यही उनका कर्तव्य होता? अतएव मनसे उनके त्यागकी कल्पनाको छोड़ दीजिये। इसीसे आपका तथा उनका, दोनोंका जीवन सुखी हो जायगा। गीता-रामायणका अध्ययन स्वयं कीजिये, उनसे भी कराइये। दिलकी आगको निस्स्वार्थ प्रेमसे बुझाकर शान्त कर लीजिये। शेष भगवत्कृपा।