साध्वी धर्मपत्नीके साथ दुर्व्यवहार करना बड़ा अशुभ है
प्रिय बहन! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने अपने पतिके दुराचार-दुर्व्यवहार तथा अपने दु:ख और जीवनके भारस्वरूप होनेकी बात लिखी सो वास्तवमें बड़ी ही कष्टदायक है। पतिदेव अपने दुराचारका दोष आपके मत्थे मढ़ते हैं, यह उनकी जबर्दस्ती है। आपके बार-बार रोकने तथा यथासाध्य उनके अनुकूल रहनेपर भी वे पापमें प्रवृत्त होते हैं तो इसका सारा दोष उन्हींपर है। आपको इस मिथ्या पापके भयसे काँपनेकी आवश्यकता नहीं है। आप चुप रह जाती हैं, यह तो अच्छी बात है ही, पर नम्रतासे समझाना भी बुरा नहीं है। मेरी समझसे तो उनको सुधारनेके अमोघ उपाय हैं—(१) सच्चे मनसे उनकी सेवा करना, (२) भगवान्का भजन करना और (३) उनके सुधारके लिये भगवान्से प्रार्थना करना। आपकी तपस्या और प्रार्थनासे ही उनका सुधार सम्भव है। आपको उनकी ओर न देखकर अपने स्वरूपकी ओर देखना चाहिये।
पुरुषोंके सम्बन्धमें क्या कहा जाय। वे साध्वी धर्मपत्नीको दु:ख देकर जो पापाचरणमें प्रवृत्त होते हैं, यह उनके भविष्यके लिये बड़ा ही अशुभ लक्षण है। उन्हें सावधान होकर शीघ्र अपना सुधार करना चाहिये; नहीं तो, वे तो नरकोंके भागी होंगे ही, समाजसे सदाचारका नाश हो जायगा। इस बीसवीं सदीके उच्छृंखलतापूर्ण युगमें स्त्रियाँ पातिव्रत्यके नामपर कबतक पुरुषोंके अत्याचारको सहन करेंगी। शेष भगवत्कृपा।