सहनशील बनिये
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपने अपनी स्थिति लिखी और संसारको छोड़कर अपने-आपको श्रीभगवान्के चरणोंमें अर्पण कर देनेकी इच्छा प्रकट की। इसके सम्बन्धमें निवेदन है कि भगवान्के चरणोंमें अपने-आपको अर्पण कर देना तो बहुत ही उत्तम है। मनुष्य यदि अपनेको सचमुच भगवान्के चरणोंमें अर्पण कर दे तब तो उसके लिये कुछ करना ही न रह जाय; पर भगवान्को आत्मसमर्पण करनेका अर्थ घर छोड़कर कहीं चले जाना नहीं है। संसारमें जो आसक्ति है, जिसके कारण प्रतिकूलका सामना करना पड़ता है—और प्रतिकूलतासे बचनेके लिये ही घर छोड़नेकी इच्छा होती है—उस आसक्तिका त्याग करना है। संसारके पदार्थोंसे आसक्ति निकल जानेपर पिताजीके द्वारा किये हुए तिरस्कारसे आपको दु:ख नहीं होगा। सम्मान अच्छा लगता है, इसीलिये अपमानमें दु:ख होता है। दुनियामें आपको किसी भी वस्तुसे मोह नहीं है, यह तो बहुत ही अच्छी बात है; पर जब मोह नहीं है, तब घरमें सब सौतेला-सा नजर क्यों आता है? या तो सब वस्तुओंसे वैराग्य होना चाहिये था या सभी पदार्थोंमें सदा-सर्वदा भगवान्को देखकर प्रेम और आनन्द होना चाहिये था। चित्तमें जो ऊबनेकी भावना आती है, वह मोहका ही एक परिणाममात्र है। जो कुछ भी हो, मेरी सम्मतिमें आप घरका परित्याग मत कीजियेगा। छोटी लड़की और उसकी माताकी देख-रेखकी जिम्मेवारी आपके ऊपर है, उसे शान्ति तथा धीरजके साथ पूरी करते रहिये। श्रीभगवान्के नामका जप तथा विश्वासपूर्वक श्रीभगवान्से प्रार्थना कीजिये। प्रार्थनासे आपको बल मिलेगा तथा भगवान्की कृपासे आपके मार्गकी अड़चनें दूर होंगी।
दूसरी माताका आपके प्रति प्रेम कम है, यह स्वाभाविक ही है। इससे बुरा न मानकर अपनी सेवा तथा सद्व्यवहारसे उनका हृदय बदलनेकी चेष्टा करनी चाहिये। आप निरन्तर सद्भावनापूर्वक उनके साथ नम्र एवं सम्मानपूर्ण व्यवहार करेंगे और कुछ सहनशील बन जायँगे तो सम्भव है, आज जो उनकी प्रतिकूलता है बहुत अंशोंमें दूर हो जाय। शेष भगवत्कृपा।