सकाम भक्ति और सकाम कर्म

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। मैंने पहले लिखा था, तदनुसार, सत्य तो यही है कि मनुष्य भ्रमवश जबतक विषयोंमें सुख मानता है, जबतक विषय-सुखकी खोजमें लगा है, तबतक उसे न तो शान्ति मिल सकती है और न वह यही कह सकता है कि मुझसे पाप नहीं बन सकते। एक मनुष्य धनकी प्राप्तिके लिये भगवान् श्रीशंकरजीकी उपासना-भक्ति करता है; पर जब कुछ समयतक उपासना करनेपर उसका कोई अनुकूल फल उसे नहीं मिलता, तब वह शंकरजीकी उस उपासनासे ऊबकर दूसरे किसी देवताकी उपासना करना चाहता है। अनुकूल फल न मिलनेपर वह इसी प्रकार बार-बार उपासना बदला करता है। कोई कह देता है कि तुम अबकी बार भगवान् श्रीलक्ष्मीनारायणकी उपासना करो; वह करता है, पर उसका मन तो सदा धनके अनुसंधानमें लगा है। वह भगवान् श्रीलक्ष्मीनारायणकी या अन्य किसी देवताकी उपासना तो उस धनकी प्राप्तिके लिये करता है। अतएव धन-कामनामें लगा हुआ भगवान‍्की उपासना कैसे करेगा। तुलसी-माला चढ़ाते, आरती करते या दण्डवत्-प्रणाम करते—जब देखो तभी उसके मनमें धनका चिन्तन होता रहेगा; क्योंकि वही उसका साध्य या उपास्य है। भगवान् और भगवान‍्की पूजा तो गौण वस्तु है, उपायस्वरूप है और यह आवश्यक नहीं कि किसी कार्यकी सिद्धिके लिये मनुष्य फल मिलनेमें विलम्ब होनेपर भी किसी एक ही उपायसे चिपटा रहे। वह तो जिस उपायसे शीघ्र-से-शीघ्र अपना कार्य सफल हो, उसी उपायसे काम लेगा। एकसे न हुआ दूसरा सही, दूसरेसे भी सिद्धि न हुई तो तीसरा, चौथा और इसी प्रकार असंख्य। फिर यह भी कोई आवश्यक बात नहीं है कि उपाय एक ही प्रकारका हो; उपासना-आराधनासे न काम हो तो दूसरा उपाय सोचा जाय। कामनाके वशमें होकर मनुष्य यहाँतक नीचे उतर आता है कि चोरी या झूठसे धन आता दीखता है तो चोरी-झूठको भी उपाय बना लेता है। उसे मतलब है धनसे, फिर चाहे वह उपासना-भक्तिसे आये, किसी व्यापार-व्यवसायसे आये या चोरी-असत्यसे आये। इसीसे भगवान‍्ने गीतामें कामनाको ही पापमें एकमात्र हेतु बतलाया है। यह कामना ही क्रोध बन जाती है। यही जीवका परम शत्रु है। अतएव जबतक विषयमें सुखकी सम्भावना दीखती है और जबतक विषयका अनुसंधान एवं विषय-कामना है, तबतक पापसे मनुष्यका बच सकना अत्यन्त ही कठिन है। विषय-कामना भी रहे और पाप न हो, यह सम्भव नहीं है।

आपका यह लिखना सत्य है कि कामनासे भी भगवान‍्की भक्ति करना बहुत श्रेष्ठ है। पर विषय-कामना मनुष्यको भक्तिनिष्ठ होने देती नहीं। सकाम भक्तिमें भी अनन्यताकी—एकमात्र प्रभुसे ही वस्तु-प्राप्तिकी चाह होना आवश्यक है। जैसे कोई स्त्री गहने-कपड़े तो चाहती है, पर चाहती है एकमात्र पतिसे ही। पतिके अतिरिक्त दूसरे पुरुषको या दूसरे किसी उपायको वह जानती ही नहीं। यद्यपि केवल पति-सुखके लिये ही बिना किसी अन्य कामनाके पतिकी सेवा करनेवालीसे उसका स्तर नीचा है, फिर भी जैसे वह है तो पतिव्रता ही, उसी प्रकार अन्याश्रय और अन्योपायसे सर्वथा रहित होकर जो ध्रुवकी भाँति केवल भगवान‍्को ही जानता है और उन्हींसे अभीष्ट सिद्धि चाहता है, वह है भगवान‍्का भक्त ही और उसकी समस्त कामनाओंका नाश करके भगवान् उसे अपनी परमकृपाका दान करते हैं। इसीलिये गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने कहा है—

जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं

जियँ जाँचिअ जानकिजानहि रे।

जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ,

जो जारति जोर जहानहि रे॥

‘जगत‍्में किसीसे भी कुछ माँगना-जाँचना नहीं चाहिये; परंतु यदि माँगना ही हो तो मन-ही-मन श्रीजानकी-जीवन भगवान् राघवेन्द्रसे माँगना चाहिये, जिनसे माँगनेपर वह याचकता(कामना) ही जलकर भस्म हो जाती है, जो सारे जगत‍्को जबरदस्ती जला रही है।’

परंतु ऐसी अनन्य सकामता सुलभ नहीं है, इसमें बहुत बड़ी श्रद्धा और महान् विश्वासकी आवश्यकता है। विषय-कामनासे चित्त इतना मलिन हुआ रहता है, उसमें अश्रद्धा और अविश्वासका इतना विष भरा रहता है कि विषय-प्राप्तिमें जरा-सी देर या प्रतिकूलता दीखते ही वह क्षुब्ध हो उठता है और सारी भक्तिको भूलकर बड़े-से-बड़े पापको उपायरूपमें स्वीकार करनेके लिये प्रस्तुत हो जाता है। सकामतामें यह दोष प्राय: आ जाता है।

यदि इस दोषसे मनुष्य बचा रहे तो सकाम भक्ति बहुत लाभदायक और अन्तमें भगवान‍्को प्राप्त करानेवाली सिद्ध होती है। भगवान‍्ने गीतामें सकाम भक्तोंको भी सुकृती और उदार कहा है और अन्तमें उनको अपनी प्राप्ति बतलायी है—‘मद्भक्ता यान्ति मामपि॥’ (गीता ७।२३)अतएव अनन्य निष्ठापूर्वक भगवान‍्की सकाम भक्ति भी निस्संदेह अन्तमें भगवत्प्राप्तिरूप परमकल्याण प्राप्त करानेवाली होती है।

सात्त्विक देवताओंकी सकाम आराधना भी इस दृष्टिसे लाभदायक है। मनुष्य जैसा कार्य करता है, जिस प्रकारके कार्योंमें उसका मन लगा रहता है, उसी प्रकारका उसका स्वभाव बनता है। एक मनुष्य धनके लिये चोरी-ठगी करता है, दूसरा मनुष्य धनके लिये धनी मनुष्योंकी सेवा करता है, तीसरा व्यापार करता है, चौथा सात्त्विक आराधना आदि शास्त्रीय कर्मोंका अनुष्ठान करता है। कर्मका फल तो कर्मके अनुसार प्राप्त होता ही है; परंतु वह मनुष्य लगातार बहुत दिनोंतक श्रद्धा-सत्कारपूर्वक जिस कार्यमें लगा रहता है, वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है। सात्त्विक आराधनादि कर्मोंसे सात्त्विक स्वभाव बनता है, अन्त:करणकी क्रमश: शुद्धि होती है और अन्तमें जीवन सत्त्वमुखी बनकर अन्त:करणको भगवान‍्की ओर प्रवृत्त कर देता है। अत: सात्त्विक सकाम अनुष्ठान भी परम्परासे क्रमश: लाभ पहुँचाते हुए भगवान‍्की ओर ले जाते हैं; इसलिये ये न तो पाप हैं और न इनका निषेध ही है। अवश्य ही, विशुद्ध निष्काम भक्ति या भगवत्प्रेमकी तुलनामें सकाम भक्तोंका स्तर बहुत नीचा है और इनका लक्ष्य भगवान् न होकर भोग होनेके कारण इनके मार्गभ्रष्ट होकर पापपंकमें फँस जानेका भय भी है ही। शेष भगवत्कृपा।