संन्यासी और स्त्री
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र पढ़कर आश्चर्य हुआ, साथ ही खेद भी। दूसरोंको धर्मका उपदेश देनेवाले लोग भी यदि स्वयं ही स्वधर्मका पालन न करें तो वे अपना और दूसरेका क्या उद्धार कर सकते हैं? यदि कोई मनुष्य वीतराग संन्यासीका बाना धारण करके भी स्त्रियोंसे शरीरका स्पर्श कराता है, तो वह न केवल स्वधर्मसे भ्रष्ट होता है, अपने संसर्गमें आनेवाले अन्य स्त्री-पुरुषोंको भी पापका भागी बनाता है। वे स्त्रियाँ भी अपनेको नरकमें ले जा रही हैं, जो संन्यासीके अंगका स्पर्श करके उसे तो धर्मभ्रष्ट करती ही हैं, स्वयं भी परम पवित्र सतीधर्मसे गिरकर दूसरोंके लिये बुरा आदर्श उपस्थित करती हैं। शास्त्रोंने संन्यासीको सदा अकेले रहनेकी सलाह दी है—‘एकश्चरेन्महीमेतां निस्संग: संयतेन्द्रिय:।’ (श्रीमद्भागवत ११।१८।२०) अर्थात् ‘संन्यासी अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर, संगरहित हो अकेला ही इस पृथ्वीपर विचरे।’ ‘एकाराम:’ (याज्ञ० स्मृति ३।५८) ‘अकेलेमें ही सुखका अनुभव करनेवाला हो।’ दक्षस्मृतिमें लिखा है—
एको भिक्षुर्यथोक्तश्च द्वावेव मिथुनं स्मृतम्।
त्रयो ग्राम: समाख्यात ऊर्ध्वं तु नगरायते॥
‘संन्यासी यदि अकेला रहे तो वास्तवमें संन्यासी है, दो होनेपर वह मिथुनयुक्त समझा जाता है, तीन संन्यासी एकत्र हो जायँ तब तो पूरा गाँव ही बस गया और इससे अधिक इकट्ठे हों तो वह उनके लिये एक बड़ा-सा नगर समझना चाहिये।’
संन्यासीके लिये यह स्पष्ट आदेश है कि वह स्त्रीसे दूर रहे। जीती-जागती स्त्रीकी तो बात ही क्या है, काठकी बनी हुई युवती स्त्रीकी प्रतिमाका भी पैरसे भी स्पर्श न करे। जैसे हाथी काठकी हथिनीके अंगका स्पर्श करके बँध जाता है, वैसे ही वह संन्यासी भी बन्धनमें पड़ सकता है—
पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।
स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अंगसंगत:॥
(श्रीमद्भा० ११।८।१३)
नारदपारिव्राजकोपनिषद् में संन्यास-धर्मकी बड़े विस्तारसे व्याख्या की गयी है। उसमें लिखा है—
माद्यति प्रमदां दृष्ट्वा सुरां पीत्वा च माद्यति।
तस्माद् दृष्टिविषां नारीं दूरत: परिवर्जयेत्॥
सम्भाषणं सह स्त्रीभिरालापं प्रेक्षणं तथा।
नृत्यं गानं सहासं च परिवादांश्च वर्जयेत्॥
(६।३१।३२)
‘मनुष्य मदिराको तो पीनेपर मतवाला होता ही है, तरुणी स्त्रीको देखकर ही उन्मत्त हो उठता है। इसलिये दर्शनमात्रसे विषका-सा प्रभाव डालनेवाली नारीको संन्यासी दूरसे ही त्याग दे। स्त्रियोंके साथ एकान्तमें बातचीत करना, उनके साथ दूसरोंके सामने भी बात करना, उनकी ओर देखना, नाचना, गाना, हास-परिहास करना तथा परायी निन्दा करना—संन्यासी इन सबका त्याग कर दे।’
नारदजीने यहाँतक कहा है—
न संभाषेत् स्त्रियं कांचित् पूर्वदृष्टां च न स्मरेत्।
कथां च वर्जयेत्तासां न पश्येल्लिखितामपि॥
एतच्चतुष्टयं मोहात् स्त्रीणामाचरतो यते:।
चित्तं विक्रियतेऽवश्यं तद्विकारात् प्रणश्यति॥
(४।३-४)
‘संन्यासी किसी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी स्त्रीका स्मरणतक न करे। स्त्रियोंकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे। सम्भाषण, स्मरण, चर्चा तथा चित्र-दर्शन—स्त्री-सम्बन्धी इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उस संन्यासीके चित्तमें अवश्य विकार उत्पन्न होता है और उस विकारसे वह धर्मभ्रष्ट होनेके कारण नष्ट हो जाता है।’
इसी प्रकार स्त्रीकी शारीरिक और मानसिक स्थितिपर विचार करते हुए धर्मशास्त्रोंने उसे सदा अपने गुरुजनोंके अधीन रहनेकी सलाह दी है, वह कभी स्वतन्त्रतापूर्वक कोई काम न करे—
बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता।
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित् कार्यं गृहेष्वपि॥
(मनु० ५।१४७)
स्त्री बचपनमें पिताके, युवावस्थामें पतिके और वृद्धावस्थामें यदि पति न रहे तो पुत्रोंके अधीन रहे; स्वतन्त्र न रहे—
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने।
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्॥
(मनु० ५।१४८)
पति ही उसे इहलोक और परलोकमें सुख देनेवाला है—
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषित:।
(मनु० ५।१५३)
स्त्रीको अपने पतिकी देवबुद्धिसे सेवा करनी चाहिये।
उपचर्य: स्त्रिया साध्व्या सततं देववत् पति:॥
(मनु० ५।१५४)
स्त्रियोंके लिये पतिसे अलग स्वतन्त्ररूपसे कोई यज्ञ, व्रत और उपवास करनेकी विधि नहीं है; वह पतिकी जो सेवा करती है, उसीसे स्वर्गलोकमें सम्मानित होती है—
नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषितम्।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते॥
(मनु० ५।१५५)
पति ही स्त्रियोंका गुरु है, इस विषयमें शास्त्रोंमें बहुत-से प्रमाण मिलते हैं; वे सभी यथार्थ एवं मान्य हैं। प्रात:स्मरणीया भगवती सीताजीने भी पतिको गुरु कहा है—‘यो मे भर्ता स मे गुरु:।’ ‘विदितं तु ममाप्येतद् यथा नार्या: पतिर्गुरु:।’ पतिकुलमें रहना ही स्त्रियोंके लिये गुरुकुलमें वास है—‘पतिसेवा गुरौ वास:।’ मनुजीने तो यहाँतक कह दिया है कि पति, पिता, भाई अथवा पुत्रसे पृथक् अकेली विचरनेवाली स्त्री दोनों कुलोंको कलंकित कर देती है—‘गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले।’
आजकल स्त्रियोंको आत्मकल्याण करनेके नामपर उनके धर्मसे गिराकर भ्रष्ट किया जाता है। शास्त्र कहता है—स्त्रियाँ तो तन-मन-वचनसे पतिकी सेवा करनेसे ही उनकी हितकारिणी होकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं, जो पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं। इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि ‘स्त्रियाँ साधु हैं।’
योषिच्छुश्रूषणाद् भर्तु: कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजा:॥
नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषित:॥
(विष्णुपुराण ६।२।२८-२९)
कहीं भी शास्त्रमें ऐसा विधान नहीं है कि स्त्री पातिव्रत्य धर्म छोड़कर किसी संन्यासीकी चरणसेवा करके आत्मज्ञानका उपदेश ले।
तजउँ न नारद कर उपदेसू।
आपु कहहिं सत बार महेसू॥
—पार्वतीजीके इस कथनका यह अर्थ नहीं कि पतिकी आज्ञाकी अवहेलना करके स्वयं बनाये हुए किसी दम्भी गुरुकी आज्ञासे नारी स्वधर्म छोड़ दे और संन्यासीके साथ विचरती रहे। उपर्युक्त चौपाईमें सतीशिरोमणि सतीके अविचल पति-प्रेमका उदाहरण है। नारदने यही तो कहा था कि ‘भगवान् महेश्वरको पतिरूपमें पानेके लिये पार्वती तपस्या करे।’ इससे ‘पति’ की उच्चता और दुर्लभता सिद्ध होती है। जैसे कोई भक्त कहे कि हम भगवान्के कहनेसे भी उनकी भक्ति नहीं छोड़ेंगे तो इस कथनसे उसकी अतिशय भक्ति ही सूचित होती है, न कि भगवत्-द्रोह। इसी प्रकार सतीने कहा—मैं महेश्वरके कहनेसे भी उनके प्रति प्रेम तथा उनकी प्राप्तिके लिये साधन नहीं छोड़ूँगी। सप्तर्षिगण भी तो माता पार्वतीके गुरु बनकर ही आये थे और उनके महेश्वरमें जो प्रेम था, उसे छोड़नेका सदुपदेश दे रहे थे; परंतु पार्वतीने उनको दूरसे ही नमस्कार किया, पतिप्रेमके विरुद्ध कोई उपदेश ग्रहण नहीं किया। ‘बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥’ का अडिग निश्चय सुनकर वे महर्षिगण चुप हो गये। उन्होंने फिर सतीको उपदेश देनेका साहस नहीं किया; वे उलटे उस पतिव्रताकी स्तुति करके चले गये। भगवद्भक्तिमें स्त्री-पुरुष सभीका अधिकार है, पर उसमें पतिसेवा छोड़नी नहीं पड़ती; पतिमें ही भगवद्भाव करके सेवा की जाती है।
शास्त्रोंमें गुरुकी बड़ी महिमा है। पुरुषको ही गुरुकी शरण लेकर उनसे आत्मज्ञानका उपदेश लेना चाहिये। पत्नीको पतिसेवासे ही सब कुछ मिल जाता है। पतिव्रता शाण्डिलीने सूर्यदेवको स्तम्भित कर दिया था। अनावृष्टिके समय पतिव्रता अनसूयाने अपने सतीत्वसे जल प्रकट करके प्रजाकी रक्षा की थी। ब्रह्मा, विष्णु, शिव—तीनों उसके पुत्र बन गये थे। पतिव्रता सावित्रीने पतिको मृत्युके मुखसे बचा लिया था। पातिव्रत्यकी शक्तिके सामने सारी शक्तियाँ नतमस्तक होती हैं।
किसको उपदेश न देना और किसको देना चाहिये, इस विषयमें जो कुछ उन सज्जनने लिखा है तथा जो वचन उद्धृत किये गये हैं, उनसे यह नहीं सिद्ध होता कि स्त्रीको भी इस प्रकार उपदेश लेनेका अधिकार है; क्योंकि ‘नास्तिकाय कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने’ इत्यादि वचनोंमें जितने विशेषण आये हैं, सब पुरुषके हैं। उनमें स्त्रीलिंगका प्रयोग नहीं है, अत: वे वचन पुरुषोंपर ही लागू होते हैं।
वे लिखते हैं—‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव’ इत्यादिके साथ तैत्तिरीयोपनिषद् में ‘पतिदेवो भव’ का उपदेश नहीं है। इसलिये उनकी रायमें ‘पतिभक्ति’ का उपदेश शास्त्रीय नहीं है; ‘स्त्रीके लिये गुरुभक्तिका उपदेश शास्त्रीय है।’ बलिहारी है इस सूझकी!
उस उपनिषद् में स्पष्ट लिखा है—‘वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति—’ अर्थात् ‘वेदोंको पढ़ाकर अन्तमें आचार्य अपने शिष्यको उपदेश देते हैं।’ शास्त्रोंका यह स्पष्ट मत है कि वेद पढ़नेकी आज्ञा पुरुषोंको ही है। अत: उपनिषद्का वह आदेश ब्रह्मचारी बालकोंके लिये है, बालिकाओंके लिये नहीं। अत: ‘पतिदेवो भव’ उपदेश उक्त प्रसंगमें क्यों होता? ‘आचार्यदेवो भव’ उपदेश यदि स्त्रीके लिये होता तो ‘आचार्यदेवा भव’ लिखा जाता; ‘आचार्यदेवो भव’ यह पुँल्लिंग प्रयोग नहीं होता।
जहाँ स्त्री-धर्मका वर्णन है, वहाँ स्पष्ट लिखा है कि स्त्री अपने पतिकी देवताकी भाँति पूजा करे।
उपचर्य: स्त्रिया साध्व्या सततं देववत् पति:।
(मनु० ५। ५४)
‘ऋते ज्ञानान्न मुक्ति:’—बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं होता, यह सत्य है; परंतु पतिव्रता स्त्रीको वह ज्ञान पातिव्रत्यसे ही प्राप्त हो जाता है, इस जन्ममें नहीं तो दूसरे जन्ममें। महाभारतमें पतिव्रता और धर्मव्याध आदिके उपाख्यान प्रसिद्ध हैं। जो स्वधर्मके विपरीत स्त्रियोंसे अपनी सेवा कराते हैं, उनकी सेवासे मोक्षदायक ज्ञान प्राप्त होगा, ऐसी आशा तो किसीको नहीं रखनी चाहिये। सच्ची पतिव्रता थोड़े ही समयमें सिद्धि-लाभ करके त्रिकालज्ञान तथा ब्रह्मज्ञान भी प्राप्त कर लेती है। स्वयं भगवान् उसकी पतिभक्तिसे संतुष्ट होकर उसे तत्त्वज्ञान करा देते हैं और वह मोक्ष प्राप्त कर लेती है।
अतएव मेरी समझसे आपके बतलाये हुए उक्त संन्यासी महोदय भोली-भाली स्त्रियोंको बरगलाकर उनसे अनुचित लाभ उठा रहे हैं। इसका प्रतिवाद होना चाहिये। मेरी उन देवियोंसे प्रार्थना है कि वे उनके पास जाकर अपने धर्मपथसे च्युत न हों। शेष भगवत्कृपा।