संतान दु:खमें ही हेतु है
सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने संतान न होनेके कारण अत्यन्त दीनता प्रकट करते हुए जो लिखा कि ‘मैं इस दु:खसे सदा पीड़ित रहता हूँ, मेरी आत्माको क्षणभरके लिये भी शान्ति नहीं मिलती।’ वह ठीक ही है। जब मनुष्य प्रबल रूपसे किसी अभावका अनुभव करने लगता है, तब उसे अशान्ति तथा दु:ख होता ही है। पर यह दु:ख विचारसे टल सकता है। यह एक प्रकारका मोह है। संतानवाले सब सुखी हैं, ऐसी बात नहीं है। आजकल तो कुलको उज्ज्वल करनेवाली आज्ञाकारी संतानोंकी संख्या ही घटती जा रही है। सुखका हेतु मनका विचार है, कोई वस्तु नहीं है; आप मनमें यदि ऐसा निश्चय कर लें कि ‘भगवान्ने मेरा कल्याण इसीमें सोचा है कि मेरे संतान न हो।’ तो आपका दु:ख मिट सकता है। सच कहा जाय तो यही बात है कि संतान होनेपर मोहकी फाँसी और भी गहरी लग जाती है। फिर मानव-जीवनका प्रधान उद्देश्य जो भगवत्प्राप्ति है, उसके सफल होनेमें और भी बाधा पड़ जाती है। संसार-सागरके भँवरमें जीवन-नौका फँस जाती है। जिनको संतान नहीं हैं, वे बिना बखेड़े भगवान्की ओर लग सकते हैं। रही वंश चलनेकी बात, सो यह भी मोह ही है। हमने भूलसे इस ‘शरीर’ को अपना स्वरूप, इसके ‘नाम’ को अपना नाम और इस ‘घर’ को अपना घर मान लिया है, इसीसे इसमें मैं-मेरापन हो गया है और इसीसे ‘संतानके द्वारा मेरा वंश चलता रहे’, ऐसी कामना होती है। ऐसे असंख्य शरीर इससे पहले मिल चुके हैं, वहाँ उन शरीरोंमें जब थे, तब उनके लिये यही भाव था। अब उनकी स्मृति ही नहीं है। यही हाल इस शरीरका और शरीरके सम्बन्धी घर तथा वंशका भी होगा। असलमें यह शरीर ‘आप’ नहीं हैं। आप तो विशुद्ध आत्मा हैं, जो अज्ञानवश जीवत्वको प्राप्त होकर विभिन्न शरीर धारण करते रहते हैं। न जाने कितने शरीरोंमें आपकी कितनी संतानें हुई हैं और उनके कितने वंश विभिन्न योनियोंमें चल रहे हैं। एक जन्मके एक शरीरका वंश न चला तो इसमें कौन-सी हानि है। अतएव आपको इस प्रकार विचार करके संतानके लिये होनेवाले संतापसे मुक्त हो जाना चाहिये। यह दु:ख असलमें आपका अपना ही बुलाया हुआ है और आपके निकाल देनेसे ही निकल सकता है।
प्रथम तो प्रारब्धमें हुए बिना संतान होनी कठिन है। यदि हो और कुछ समय बाद मर जाय, तो न होनेकी अपेक्षा अधिक दु:ख होता है। कितने ही प्रकारके नये-नये अभाव संतान होनेपर उत्पन्न होते और बढ़ जाते हैं। कहीं कुपात्र पुत्र निकल गया तो वह रात-दिन जलाता रहता है। इन सब बातोंपर आप विचार कीजिये।
यदि संतान बिना रहा ही न जाय तो उसके लिये कुछ उपाय कीजिये। उपाय सफल ही हो जायगा, यह तो नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रारब्धके प्रबल प्रतिबन्धकको रोककर नवीन प्रारब्ध बनानेवाला कर्म भी वैसा ही हो, तब कहीं फल हुआ करता है, परंतु प्रयत्न किया जा सकता है। इसके लिये किसी सदाचारी विद्वान् ब्राह्मणके द्वारा हरिवंशपुराणका पाठ आप दोनों पति-पत्नीको सुनना चाहिये और संतानगोपालमन्त्रका स्वयं जप करना चाहिये। संतानगोपालमन्त्र यह है—
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:॥
विधि तथा श्रद्धापूर्वक जबतक संतान न हो, तबतक प्रतिदिन इसका एक सहस्र जाप करना आवश्यक है। इससे संतान न भी हुई, तो भगवान्का नाम तो आवेगा ही। यही एक बड़ा लाभ है। साथ ही, किसी सुयोग्य चिकित्सकसे निदान करवाकर, यदि रोग हो तो उसकी चिकित्सा भी करवानी चाहिये; क्योंकि यदि स्त्री या पुरुषके कोई ऐसा रोग होता है तो उसके कारण भी संतान नहीं होती; परंतु यह स्मरण रखना चाहिये कि संतानके लिये किया जानेवाला प्रयत्न वस्तुत: प्राय: दु:खका ही कारण होता है। शेष भगवत्कृपा।