सती-चमत्कार
प्रिय बहन! सस्नेह हरिस्मरण। आपका पत्र मिले बहुत दिन हो गये। उत्तर लिखनेमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपके प्रश्नोंका उत्तर संक्षेपमें इस प्रकार है—
(१) प्राचीन कालमें आर्य-नारियाँ सती होती थीं, हँसती-हँसती पतिके शवको गोदमें रखकर अपने शरीरको भस्म कर डालती थीं—इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थोंमें बहुत मिलता है और यह सर्वथा सत्य जान पड़ता है।
(२) सती-प्रथाबंदीका कानून बना था, ऐसा कहा जाता है कि उस समय समाजकी निन्दाके भयसे स्त्रियाँ महान् मानसिक और शारीरिक कष्ट सहकर बिना मनके जलती थीं। वरं यहाँतक होने लगा था कि स्वार्थवश घरके लोग, जिसका पति मर जाता था, उस स्त्रीको उसकी इच्छाके विरुद्ध—जबरदस्ती पतिकी लाशके साथ बाँधकर जला देते थे। ये दोनों ही बातें न्यूनाधिक अंशमें सत्य हो सकती हैं और यदि ऐसा होता था तो वह निश्चय ही निर्दयता और पापाचरण था तथा दयालु पुरुषोंके प्रयत्नसे उसका बंद होना भी ठीक ही था। इतना होनेपर भी सच्ची सतियोंको पतिका अनुगमन करनेसे कौन रोक सकता है। कानूनकी वहाँतक पहुँच ही नहीं। इस गये-गुजरे जमानेमें भी बीच-बीचमें ऐसी सतियोंकी चमत्कारपूर्ण घटनाएँ देखने-सुननेको मिलती हैं।
(३) आजकल सती होनेकी घटनाओंमें अपने-आप शरीरसे अग्नि प्रकट होने आदि चमत्कारकी जो बातें सुनी-पढ़ी जाती हैं, उनके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता कि वे कहाँतक सत्य हैं। बहुत सम्भव है कि उनमें बहुत-सी बातें बढ़ाकर भी लिखी या कही जाती हों।
(४) हाँ, मेरा ऐसा विश्वास है कि सतीके कंधे या हृदयसे अथवा शरीरके किसी भी अंगसे अपने-आप भी अग्नि प्रकट हो सकती है। इसमें कई युक्तियाँ भी हैं। उनमेंसे कुछ आपकी जानकारीके लिये लिखता हूँ—
अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। हमारे शरीरमें भी है। रगड़ लगनेपर वह प्रकट होती है। हाथ-से-हाथ मलिये, वह गरम हो जायगा। अरणि-मन्थनसे (लकड़ियोंको परस्पर रगड़नेसे) अग्नि प्रकट होना तो बहुत लोगोंने देखा होगा। जंगलोंमें पेड़ोंके आपसमें रगड़ लगनेसे अग्नि पैदा हो जाया करती है। चकमक पत्थर आपसमें चोट खानेपर आग उगलते हैं—यह सभी जानते हैं। इसी प्रकार किन्हीं विशेष संयोगोंमें शरीरसे भी अग्नि प्रकट हो सकती है। सतीदेवीने पिता दक्षके यज्ञमें अपने स्वामी भगवान् शंकरका अपमान देखा, तब उन्हें इतना संताप हुआ कि उनके शरीरसे योगानल प्रकट हो गया और वे उसीसे जल गयीं।
शरीरका उत्ताप ज्वरके समय साधारण स्थितिसे कई गुना अधिक हो जाता है और उससे मनुष्य मरतक जाता है। यह गरमी शरीरके अंदरसे ही आती है। कुछ समय पहले ‘चेराग’ नामक पारसियोंके पत्रमें इस विषयपर लिखा गया था कि मनुष्यके शरीरमें छोटी-बड़ी बहुत गाँठें (Glands) हैं, जो सारे शरीरमें फैली हुई हैं। इन गाँठोंमें कुछ पसीनेकी हैं, जिनसे पसीना झरा करता है; कुछ आँसुओंकी हैं, जिनसे आँसू बहते हैं। कुछ गाँठें ऐसी भी हैं, जिनसे कोई भी रस नहीं झरता दिखायी देता। उन्हें Ductless Gland(रसवाही नलिकारहित ग्रन्थि) कहते हैं। इन गाँठोंके साथ शरीरके कद और आकृतिका सम्बन्ध रहता है। इतना ही नहीं, मनुष्यके चरित्रका भी इनसे सम्बन्ध होता है। जैसे इन गाँठोंसे मनुष्यके चरित्रका निर्माण होता है, वैसे ही मनुष्यके चरित्रका इन गाँठोंपर प्रभाव पड़ता है। सारांश यह कि इन गाँठोंका विचित्र विकास, असाधारण परिवर्तन और विनाश आदिका आधार मनुष्यके अपने जीवनपर निर्भर करता है। फिर जैसी गाँठें होती हैं, उनसे वैसी ही क्रिया भी होती है।
एक सच्ची सती, जिसका तन, मन और हृदय सर्वथा पवित्र है, जो अपने पतिके प्रेमके आधारपर ही जीती है, जिसने अपने हृदयमें पतिके सिवा किसीको स्थान ही नहीं दिया, जिसका जीवन पतिके लिये सदा आत्मत्याग करनेमें ही बीता और जो पतिका क्षणभरका भी वियोग सहन करनेमें यथार्थमें असमर्थ है, उसके इन चरित्रगत कार्योंका उसके शरीरकी ग्रन्थियोंपर कैसा प्रभाव होता है और उसके अंदरके तमाम अवयव कैसी असाधारण स्थितिमें पहुँच जाते हैं—इसका हमलोग कुछ भी अनुमान नहीं लगा सकते। ऐसी अवस्थामें पति-वियोगकी स्थितिमें उसके आन्तरिक अवयवोंमें ऐसी विशेष क्रिया हो,जिससे अग्नि प्रकट हो जाय तो इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है?
मनुष्यके शरीरमें गलेके आगे एक ग्रन्थि है, जिसे अंग्रेजीमें ‘थाइरॉइड ग्लैंड’ (Thyroid Gland) कहते हैं। यह गाँठ शरीरमें प्रेम और कामना उत्पन्न करती है, शरीरमें गरमी बढ़ाती है और इसमेंसे निकलनेवाले रसका प्रवाह यदि बढ़ जाता है तो मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। इस गाँठसे निकलनेवाले रसको ‘थाइराँक्सिन’ (Thyroxin) कहते हैं।
इस गाँठ और इससे बहनेवाले रसके सम्बन्धमें डॉ० लुई बरमन एम०डी० महोदय अपने The Glands Regulating Personality नामक ग्रन्थमें लिखते हैं—
“Since the presence of thyroxin in the tissues determines the rate at which they burn themselves, it is obvious that if there were no mechanism for retrading its action and, at need varying it, they really would set fire to themselves. That is to say, if the tissues held a maximum of the thyroid internal secretion, that had to take more and more as it was fed out to them by the thyroid through the blood, the pressure of energy production would attain the state of a boiler without a safety valve P.51.”
“मनुष्यके शरीरमें मांसपेशियोंके जलती रहने (गरमी प्राप्त करने) का आधार शरीरके ‘थाइरॉइड’ नामक गाँठसे बहनेवाले रसके परिमाणपर अवलम्बित है। यह निश्चित है कि यदि उस रसकी क्रियाको रोकनेके लिये और आवश्यकता होनेपर विशेष कम करनेके लिये कोई साधन न हो तो मांसपेशियाँ बिलकुल जलकर भस्म हो जायँ। अतएव जिस मांसपेशीमें थाइरॉइडसे बहनेवाला प्रवाह सबसे अधिक परिमाणमें हो और रक्तके द्वारा उसे अधिक-से-अधिक मिलनेवाला प्रवाह जारी रहे तो उसमें पहुँचनेवाली शक्ति (गरमी) का दबाव सेफ्टी वाल्वसे रहित एक बायलरकी स्थितिपर पहुँच जाय।”
अर्थात् जैसे इस प्रकारकी स्थितिमें बायलर फट जाता है, वैसे ही मनुष्यका शरीर जलकर भस्म हो जा सकता है। परंतु मनुष्यमात्रमें ही इस बढ़ती हुई गरमीको सीमाबद्ध रखनेके लिये प्रकृतिने सुन्दर योजना बना रखी है, जिससे स्वास्थ्यकी स्थितिमें मांसपेशीको उतनी गरमी मिलती रहती है, जितनी उसके लिये आवश्यक होती है।
परंतु यदि किसी सतीके पति-वियोगके समय उसके मनकी स्थिति ऐसी असाधारण हो जाय कि जिससे थाइरॉइड-ग्रन्थिपर सीधा प्रभाव पड़े और वह उसकी गरमीको एकदम बढ़ाकर शरीरसे अग्नि पैदा कर दे तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। पतिगतप्राणा प्रेममूर्ति सतीके हृदयमें जब पति-वियोगकी अग्नि सुलगती है, तब उसका रूप कैसा होता है, इसको हमलोग ठीक-ठीक समझ ही नहीं सकते। ऐसी हालतमें गलेके पासकी थाइरॉइड गाँठमें रसका प्रवाह बढ़ जाना और उसके कारण कंधे आदिसे अग्निका फूट निकलना सर्वथा सम्भव और युक्तियुक्त है।
इस स्थितिको डॉ० बरमनने ‘हाइपरथाइरॉइडिज्म’ (Hyperthyroidism) कहा है। अन्य कई विद्वानोंने भी इस ग्रन्थिविज्ञानका समर्थन किया है।
हमारे शरीरमें एक अग्नि तो खास तौरपर रहती है, जिसे ‘जठरानल’ कहते हैं। भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—‘मैं ही वैश्वानर (अग्नि) होकर शरीरके अंदर चतुर्विध अन्नको पचाता हूँ।’ जो अग्नि अप्रकटरूपसे सदा वर्तमान है, वह यदि कारणविशेषसे प्रकट हो जाय तो इसमें क्या नयी बात है? अप्रकट अग्निका प्रकट होना तो हम अपने घरोंमें रोज ही देखते हैं। अतएव मेरी समझसे सतीके शरीरसे अग्निका उत्पन्न होना सर्वथा सम्भव है।
पति-वियोगके अवसरपर बिना किसी रोगके सती स्त्रीके मरणमें तो जरा भी आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। महान् शोक तथा महान् आनन्दकी दशामें हृदयकी गति रुककर मृत्यु होनेकी घटनाएँ तो बहुत होती हैं। मनका शरीरपर बड़ा भारी असर होता है। भक्तकवि जयदेवकी मिथ्या मृत्युका समाचार सुनते ही उनकी धर्मपत्नी पद्मावतीका प्राण-वियोग हो गया था, यह प्रसिद्ध है।
पर यह याद रखना चाहिये, सती होना सर्वथा स्वाभाविक वस्तु है। किसी बाहरी प्रेरणा या चेष्टासे ऐसा नहीं हुआ जाता। साथ ही पतिके साथ सहमरण करनेवाली सतीसे उस सतीदेवीका दर्जा किसी कदर कम नहीं है, बल्कि कई अंशोंमें उसका महत्त्व और भी अधिक है, जो पवित्र ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करती हुई जीवित रहकर पतिके घर तथा बच्चोंकी निष्काम सेवा करती है और अपने पवित्र आचरणोंसे परलोकमें पतिको अनन्त सुख पहुँचाती रहती है।