सत्संगकी इच्छा
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपकी महापुरुषोंके समीप रहने और साधन-भजन करनेकी इच्छा तो बड़ी ही श्रेष्ठ इच्छा है। मानव-जीवनका यही तो सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है। परंतु घरमें आप पिताजीके अकेले पुत्र हैं। माता, विधवा चाची, पत्नी, कन्या हैं। उनकी सेवा और पालन करना आपका कर्तव्य है। घरमें आसक्ति तथा ममताका त्याग करना चाहिये; घरका और कर्तव्यका नहीं। घरको भगवान्का समझकर, भगवान्की सेवाके भावसे, भगवान्का स्मरण करते हुए कर्तव्य-कर्मका पालन कीजिये। घर छोड़नेकी उमंग तो होती है; पर घर जितना सुरक्षित है, उतना घर छोड़कर भटकना नहीं है। आजकल तो बाहर बड़ी दुर्दशा है और पतनके हजारों साधन हैं। दुर्गति मानो मुँह बाये खड़ी है। अतएव घर छोड़नेकी बात सोचना सर्वथा अनुचित है।
भगवान्का स्मरण करते हुए ही सारे कार्य कीजिये। अर्जुनको भगवान्ने आज्ञा दी—‘तुम निरन्तर मेरा स्मरण करते हुए ही युद्ध करो। मन-बुद्धि मुझे सौंप दो। तब निश्चय मेरी ही प्राप्ति होगी।’
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(गीता ८।७)
शेष भगवत्कृपा।