श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहों

प्रिय महोदय! आपका पत्र मिला। दोष किसमें नहीं होते। मनुष्यको अपना दोष देखना चाहिये। इसीमें उसका लाभ है। आपने लिखा कि ‘मैं बहुत बोलता हूँ और इसीसे कई बार अवांछनीय घटनाएँ भी हो जाती हैं।......तथापि मेरा बोलना कम नहीं होता।’ यह आपके अधिक बोलनेके अभ्यासका परिणाम है। पहलेसे वाणीमें संयम रहता तो ऐसा न होता। आपके बोलनेके फलस्वरूप कई बार अवांछनीय घटनाएँ हो जाती हैं, जिनसे बड़ा संताप होता है तथापि आपका बोलना कम नहीं होता—यह बड़े दु:खकी बात है। इसके लिये आपको दृढ़ताके साथ अभ्यास बदलना होगा। इसके दो उपाय हैं—(१) नित्य कुछ समयके लिये नियमितरूपसे मौनावलम्बन, (२) भगवान‍्के नामका नियमित संख्यामें प्रतिदिन जप। जितनी देर मौन रहेगा और जितना समय भगवान‍्के नाम-जपमें देना पड़ेगा, उतने समय तो आपको बाध्य होकर बोलना बंद करना ही पड़ेगा। मेरी समझसे आप प्रतिदिन प्रात:काल और रात्रिको घरमें रहनेके समय एक-एक घंटे मौन रहकर उस समय भगवद‍्गीता और रामायणका पारायण करें और प्रतिदिन जब कभी समय मिले—‘हरे राम’ के सोलह नामवाले मन्त्रकी चौदह मालाओंका जप करें। जप करते समय कोई बात नहीं करनी चाहिये। यह जप आप चाहे लगातार एक बारमें करें या सुविधानुसार ५,५ और ४ मालाके हिसाबसे तीन बारमें कर लें, परंतु जप करते समय बोलें नहीं। इससे आपको बहुत लाभ होगा। पहले-पहले तो सम्भव है—नया अभ्यास होनेसे तथा बोलनेकी बड़ी आदत होनेसे चित्त कुछ ऊबेगा, परंतु आपने यदि दृढ़ताके साथ छ: महीने भी इन दोनों नियमोंका पालन कर लिया तो आप अपनी आदतको बहुत कुछ बदली हुई पायेंगे। साथ ही भगवन्नाम-जपके तथा स्वाध्यायके प्रभावसे आपकी चित्त-वृत्तिमें भी आश्चर्यजनक अनपेक्षित सुधार हो सकता है। आप मन-ही-मन ऐसा निश्चय करते रहिये कि भगवान‍्की कृपासे मेरे अंदर सद‍्गुणोंका तथा सद्विचारोंका बड़े वेगसे संचार हो रहा है और दुर्गुण-दुर्विचारोंका नाश हो रहा है।

यों तो सभी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं और सदा मनको खींच-खींचकर विषयोंकी ओर ले जाती हैं, अतएव सभीको वशमें करना चाहिये, परंतु ज्ञानेन्द्रियोंमें कान और कर्मेन्द्रियोंमें जीभ तो स्वतन्त्र छोड़ देनेपर बहुत ही अनर्थ करती हैं। आँखें उन्हीं विषयोंका रस ले सकती हैं, जिनको वे स्वयं देखती हों; नासिका उन्हीं चीजोंकी सुगन्ध-दुर्गन्ध प्राप्त करती है, जिनका उसके साथ सम्पर्क होता हो; रसना उसी विषयका स्वाद चखती है, जो उसपर आ गया हो और त्वक् उसी मुलायम या कड़े पदार्थको पहचानती है, जिसका उसे स्पर्श प्राप्त हुआ हो; परंतु ये कान (कर्णेन्द्रिय) ऐसे हैं कि दूसरोंकी देखी, सुनी, सूँघी, स्पर्श की हुई तथा समझी-जानी हुई बातोंको दूसरोंकी जबानसे सुन-सुनकर उनको मनतक पहुँचाते हैं और फलत: मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न करनेमें कारण बनते हैं। इसी प्रकार यह जीभ सारी इन्द्रियोंके अनुभवोंको, दूसरोंको, दूसरोंके प्रवादों-विवादों तथा मिथ्या प्रलापोंको—परनिन्दा, परापवाद, चुगली आदिको अपनाकर कितनी झूठी, कड़ुवी, तीखी, विषैली, चुभती, सुलगती, जलती, कटती बातें कहती है कि जिनकी गणना नहीं हो सकती। न जाने यह कितने रसभरे हृदयोंको सुखा देती है, कितने प्रशान्त चित्तोंमें अशान्तिकी आग भड़का देती है, कितने सुखियोंको रुला देती है, कितने सदाशयोंमें वैरकी ज्वाला उत्पन्न कर देती है, कितनोंको मर्माहत, शोक-संतप्त और पीड़ित कर देती है और कितनोंके जीवनको दु:ख-क्लेशोंका घर बना देती है! इसीसे तुलसीदासजी महाराजने प्रतिज्ञा की—

‘श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं,

रसना और न गैहों।’

‘कानोंसे भगवच्चर्चाको छोड़कर दूसरी बात सुनूँगा नहीं और जीभसे दूसरी गाथा गाऊँगा नहीं—और कुछ बोलूँगा ही नहीं।’

इसलिये हम सभीको इन दोनों इन्द्रियोंको विशेष सावधानीसे संयमित करना चाहिये। जहाँतक बने—कानोंसे परचर्चा, परनिन्दा, परापवाद, आत्मप्रशंसा नहीं सुनकर भगवद‍्गुणानुवाद, भगवान‍्की लीला-कथा, सत्-चर्चा आदि सुननी चाहिये और जीभको तो खासतौरपर वशमें करना चाहिये। कानकी अपेक्षा जीभपर अपना अधिकार भी अधिक है। जीभसे व्यर्थकी बात बोलनी ही नहीं चाहिये। या तो आवश्यक कामकी उतनी ही बात बोलनी चाहिये, जिसके बोले बिना काम न चलता हो, या रामकी बात—भगवच्चर्चा करनी चाहिये। निरन्तर भगवान‍्के नामका जप करनेकी आदत डालनी चाहिये। ऐसी धारणा करनी चाहिये कि जीभके द्वारा भगवान‍्के नामरूपी धनका संग्रह हो रहा है, जितनी देर दूसरी बात होगी, उतनी देर नाम नहीं लिया जायगा और उतनी देर यह परम धनकी कमाई बंद हो जायगी। जैसे लोभी मनुष्यको पैसेका नुकसान सहन नहीं होता, बड़ा दु:ख होता है—वैसे ही नामधनका नुकसान सहन नहीं होना चाहिये। विशेष दूसरे पत्रमें। शेष भगवत्कृपा।