श्रीराधाकृष्णका स्वरूप

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि श्रीकृष्ण आदिपुरुष हैं, सनातन हैं और पुरुषोत्तम हैं। वे ही परात्पर परमात्मा हैं। श्रीराधा उनकी अभिन्न स्वरूपा-शक्ति हैं। श्रीराधाके साथ उनका नित्य संयोग है। वे दोनों नित्य एक हैं, व्रजमें भी श्रीकृष्ण अपने सम्पूर्ण रूप और ऐश्वर्यके साथ अवतीर्ण हुए थे। अत: उनकी वे ही स्वरूपभूता राधा, वही गोपियोंका समुदाय, वे ही ग्वालबाल, गौएँ आदि प्रकट हुई थीं। अत: उनके विवाहका उल्लेख न भी किया जाय तो कोई हानि नहीं है। जैसे गंगा समुद्रकी ओर ही प्रवाहित होती है, वैसे श्रीराधाका प्रेम केवल श्रीश्यामसुन्दरमें ही परिलक्षित होता है। प्रेमकी यह अनन्यता और विशुद्धता ही वास्तविक विवाह और सतीत्व है। अत: श्रीकृष्णके हृदयमन्दिरकी अधिदेवता तथा उनके प्रेम साम्राज्यकी सम्राज्ञी एकमात्र श्रीराधिका ही हैं। तथापि ब्रह्मवैवर्तपुराणमें यह स्पष्ट उल्लेख है कि स्वयं ब्रह्माजीने श्रीराधा और श्रीकृष्णका विवाह भी वृन्दावनके कुंजमें सम्पन्न करवाया था। लोकदृष्टिमें यह विवाह नहीं आया था; क्योंकि उस समय अवस्थाकी दृष्टिसे दोनों विवाहके योग्य नहीं थे, वरं श्रीकृष्णका तो अभी उपनयन भी नहीं हुआ था। अत: श्रीराधाको श्रीकृष्णकी रखनी या रखेली कहना अपनी अज्ञताका परिचय देना है। श्रीकृष्णकी अवस्था उस समय रखनी रखनेयोग्य नहीं थी। आप इन व्यर्थके भ्रममें न पड़कर भक्तिपूर्वक श्रीराधाकृष्णका चरण-चिन्तन करें। इसीसे कल्याण होगा। शेष भगवत्कृपा।