श्रीराधा-कृष्ण एक ही तत्त्व हैं
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि श्रीराधा तथा श्रीकृष्ण वस्तुत: एक ही तत्त्वके दो नाम-रूप हैं। इनका नित्य अभिन्न सम्बन्ध है। अत: इनके विवाह होने, न होनेका प्रश्न ही नहीं उठता। विवाह तो लौकिक जीवोंमें होता है। तथापि ब्रह्मवैवर्तपुराणमें इनके विवाहकी बात भी आती है। इनकी लीला नित्य है और नित्य ही ये अपने एक ही तत्त्वके दो स्वरूपोंमें लीला-विहार करते रहते हैं। समस्त दिव्य धामोंमें प्रमुख सच्चित्-परमानन्दमय गोलोकधाम है, वही समस्त ब्रह्माण्डका आत्मा है। उसीसे अनन्त ब्रह्माण्ड नित्य अनुप्राणित होते रहते हैं। वह नित्य सच्चिदानन्दमय परमधाम सबसे विलक्षण और सर्वोपरि होनेपर भी सर्वत्र व्याप्त और सबमें स्थित है। इतनेपर भी उसकी पादविभूति—एक अंशमें ही समस्त प्राकृत लोकोंकी परिसमाप्ति हो जाती है। इनसे सर्वथा अस्पृष्ट जो त्रिपाद्विभूति है, वह अनैसर्गिक, अप्राकृत, सच्चिदानन्दमय परमधाम है। वही साकेत, वैकुण्ठ, कैलास आदि परमधामोंके रूपमें भक्तोंके अनुभवमें आता है। उस परमोज्ज्वल, परम मधुर, परम कल्याणमय, परम सुन्दर, सर्वातिशायी नित्य गोलोकधाममें ही वृन्दावन, मथुरा, गोकुल, नन्दग्राम, बरसाना, गिरिराज आदि दिव्य शाश्वत प्रदेश तथा विरजा और यमुना आदि दिव्य नदियाँ हैं। हमारा यह मर्त्यधाम पार्थिव है, ठोस है; यहाँ एकमें दूसरा नहीं रह सकता। जहाँ काशी है, वहाँ प्रयाग नहीं है—दोनों पृथक्-पृथक् हैं; परंतु दिव्य सच्चित्-परमानन्दमय धाम इस प्रकारका जड तथा ठोस नहीं है। वह कैसा है, इसे वाणीसे नहीं समझा जा सकता। परंतु इतना जान लेना चाहिये कि भगवान्की भाँति ही वह सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वाधार, दिव्य, प्रकाशमय, तेजोमय एवं नित्य सत्य भावमय है। उसीमें समस्त दिव्य लोकोंका सत्य स्फुरण है। वे साकेत, वैकुण्ठ, कैलास आदि भेदोंसे सत्य-सत्य ही अनेक होते हुए भी सत्य-सत्य एक ही हैं। उसी परतम गोलोकधामकी अधीश्वरी श्रीराधारानी हैं, जो श्रीकृष्णसे नित्य अभिन्न होनेपर भी श्रीकृष्णको नित्य परमानन्द प्रदान करनेवाली उनकी ह्लादिनी शक्ति हैं। श्रीकृष्णके स्वरूपका आधार वे हैं और श्रीकृष्ण उनके स्वरूपके आधार हैं। वे नित्य प्रिया-प्रियतम हैं। कभी एक क्षणके लिये भी उनका वियोग नहीं होता। पर यह प्रिया-प्रियतमभाव कैसा है, इसे समझनेके लिये कोई भी लौकिक दृष्टान्त समीचीन और उपयुक्त नहीं है। जैसे भगवान् सर्वविलक्षण, निरुपाधि और अतुलनीय तथा अचिन्त्य हैं, वैसे ही यह प्रिया-प्रियतमभाव भी अतुलनीय और अचिन्त्य है।
इस प्राकृत जगत्में जो इन सबका अवतरण हुआ था, कहा गया है कि वह इनके दिव्य राज्यमें इनकी एक स्वप्नलीला थी। विचित्र-लीला-सम्पादिनी भगवान्की योगमाया सदा लीला-वैचित्र्यके आयोजनमें ही लगी रहती हैं। प्रिया-प्रियतम निकुंजमें शयन कर रहे हैं। इसी समय प्रिया श्रीराधारानीके सामने योगमाया एक दृश्य उपस्थित करती हैं। श्रीजीको स्वप्न होता है—‘मैं भारतके अन्तर्गत श्रीवृषभानुपुरीमें कीर्तिदा माताके अंकमें बालिकारूपसे प्रकट हुई हूँ, इत्यादि।’ स्वप्न मनका संकल्प है। श्रीजी सदा सत्य-संकल्प हैं, अत: उनके उस संकल्पके अनुसार भारतवर्षके व्रजमण्डलान्तर्गत वृषभानुपुरीमें उनके प्रादुर्भावकी लीला सम्पन्न हुई। इसी प्रकार योगमायाके संकेतसे श्रीकृष्णने भी संकल्पसे ही अवतरण किया। यहाँकी इस लीलामें श्रीकृष्ण ग्यारह वर्षकी आयुतक ही व्रजमें विराजे। श्रीजीकी आयु भी लगभग इतनी-सी ही थी। कहते हैं कि वे श्रीकृष्णसे पंद्रह दिन छोटी थीं। इसी बाल्यकालमें व्रजमें इन दोनोंके बीच प्रथम दर्शन, पूर्वराग, संयोग आदिकी समस्त रसलीलाएँ सम्पन्न हुईं। लोकदृष्टिमें इनकी सगाईकी चर्चा चल रही थी। किसी-किसी भक्तने इनके विवाहका भी वर्णन किया है। हमारे पास एक पुरानी हस्तलिखित पुस्तक है, जिसमें बड़ी सुन्दर विवाह-लीलाका सचित्र वर्णन है। ब्रह्मवैवर्तपुराणके अनुसार भी लोगोंकी दृष्टि बचाकर साक्षात् श्रीब्रह्माजीने वृन्दावनमें सखियोंके सामने इन शाश्वत प्रिया-प्रियतमका विवाह भी करवा दिया था। फिर श्रीकृष्ण मथुरा पधारे और तदनन्तर द्वारका गये। तत्त्वत: श्रीकृष्णस्वरूपिणी, नित्य कृष्णसंगिनी, श्रीकृष्णप्रिया श्रीराधारानी प्रेमयोगिनी विरहिणीका प्रेमानुरागमय जीवन बिताने लगीं। अवतार-लीला सम्पन्न होनेमें यहाँके परिमाणके अनुसार लगभग सवा सौ वर्ष लग गये। तत्पश्चात् परमधाम-गमनसे पूर्व ही भगवान् श्रीकृष्णने व्रजमें पधारकर समस्त गोप-गोपियोंको तथा व्रजमण्डलको गोलोकधाममें भेज दिया। इतना सब देख चुकनेपर श्रीराधाजीका स्वप्न भंग हुआ। उन्होंने देखा—‘मेरी आँख लग गयी, इतनेमें ही क्षणभरमें मैंने यह स्वप्न देख लिया। वस्तुत: तो मैं प्रियतम श्रीकृष्णके पास ही हूँ। न कहीं गयी न आयी। श्रीकृष्ण तथा अन्य सबने भी लीलानुरोधसे यही अनुभव किया। यह एक प्रसंगकी कथा है। कहनेका तात्पर्य इतना ही है कि श्रीराधा-कृष्ण नित्य, सनातन परस्पर अभिन्न प्रिया-प्रियतम हैं। इनका स्वरूप अनिर्वचनीय है—अचिन्त्य है। इनकी परम कृपासे ही उसका किसी-किसीको कहीं कुछ आभास मिलता है। उनके आदर्श प्रेम और महत्त्वको ऐसे ही कतिपय भाग्यवान् जन जानते हैं। आपकी कृपासे पत्रका उत्तर लिखनेके बहाने प्रिया-प्रियतमकी पवित्र स्मृति हुई, इसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। शेष भगवत्कृपा।