सृष्टि भगवान्का नाटक है
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि हमारे प्रभु लीलामय हैं, सहज आनन्दस्वरूप हैं। तरह-तरहके खेल खेलना, परम प्रसन्न रहना और अपने लीला-परिकरोंको भी प्रसन्न रखना उनका स्वभाव है। भगवान्की अनेकों लीलाओंमेंसे उनकी बनायी हुई यह सृष्टि भी एक सुन्दर लीला है। उन्होंने अनेक प्रकारके सुन्दर दृश्य बनाये, जन्म-मृत्युके पर्दे भी लगाये। जीवनरूपी अनेक अभिनेता पैदा किये और इन सबको एक-एक वेष या रूप देकर यहाँ अपने-अपने जिम्मेका अभिनय करनेके लिये भेजा है। स्वयं पर्देकी ओटमें रहकर वे सृष्टि-चक्रका—विश्वरंगमंचका संचालन करते हैं। जो इस रहस्यको समझकर यहाँ अनासक्तभावसे खेल खेलते हैं, वे पुरस्कार पाते हैं। जो प्रभुकी वस्तुओंमें उन्हें अपनी मानकर आसक्ति बढ़ाते हैं, वे दु:ख भोगते हैं। लीलाके सिवा सृष्टिका और कोई कारण नहीं जान पड़ता।
जो जीव यहाँ अभिनय करनेके लिये भेजे जाते हैं, वे यदि अपना अभिनय ठीक तौरसे पूरा करते हैं, तब तो वे प्रभुके कृपापात्र होते हैं; अन्यथा अपने अपराधोंके कारण दण्डित हो, दूसरे-दूसरे रूप या वेषमें बार-बार विश्वके रंगमंचपर खेलनेके लिये भेजे जाते हैं। यही उनका आवागमन है। जिन्होंने यह सारा खेल भगवान्का समझकर, उनकी आज्ञाका पालन करके, उन्हें ही प्रसन्न करनेके लिये इसमें अनासक्तभावसे भाग लिया है, वे फिर रंगमंचपर नहीं आते। यही उनकी ‘मुक्ति’ है। या वे कभी आते हैं तो भगवान्की इच्छासे उनकी लोकलीलामें सहायक होकर लीलासे ही आते हैं। यही ‘कारक पुरुषोंका अवतरण’ कहलाता है।
इस प्रकार विचार करके, इस नाटकके प्रति ममत्व और आसक्तिका त्यागकर, उस सूत्रधारके कला-चातुर्यपर मुग्ध हो, उसीका स्मरण-चिन्तन करना तथा उसीकी प्रसन्नताके लिये उसके आज्ञानुसार जगत्में उसकी पूजारूपमें ही कर्म करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।