स्वभाव-सुधार

प्रिय बहन! सप्रेम हरिस्मरण। मनुष्यको जितना अपना स्वभाव सुधारनेकी चिन्ता होनी चाहिये और जितना वह अपना सुधार करनेमें स्वतन्त्र और समर्थ है, उतनी न तो दूसरेके स्वभावकी चिन्ता करनी चाहिये और न वह दूसरेके सुधारमें उतना स्वतन्त्र और समर्थ ही है। अपने पतिदेवके क्रोध तथा हठका नाश आप अपनी तपस्या और सेवासे ही कर सकती हैं।

हरितालिका तृतीयाका व्रत वे नहीं करने देते तो कोई हानि नहीं है। उनकी आज्ञाका महत्त्व व्रतसे कम नहीं है। इससे दु:खी न होइये।

मासिक धर्मकी स्थितिमें स्पर्श करना अवश्य सब प्रकारसे हानिकारक और आरोग्यका नाशक है। प्रार्थना, प्रेम तथा सेवासे समझाकर इस बातके लिये उनसे अनुमति प्राप्त करनी चाहिये कि उस समय चार दिन स्पर्श न किया जाय। शेष भगवत्कृपा।