स्वतन्त्र विवाह

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने कॉलेजमें शिक्षा प्राप्त करनेवाली एक सत्रह वर्षकी क्षत्रियकन्या और उन्नीस वर्षके ब्राह्मणयुवकमें प्रेम होने, उनके परस्पर विवाह करनेकी दृढ़ प्रतिज्ञा करने और कन्याके अभिभावकोंद्वारा इसके विरुद्ध मत प्रकट किये जानेकी बात लिखकर मेरी सम्मति पूछी, इसके लिये धन्यवाद। सच बात तो यह है कि इस प्रकारकी चीज वस्तुत: प्रेम है ही नहीं; यह तो मोहका आकर्षण है, जो हमारे आजकलके कॉलेजोंकी शिक्षा और संसर्गका कटु फल है। यह आर्यनीति नहीं है, एक प्रकारका यथेच्छाचार है, जो सर्वथा त्याज्य है। विवाहका सर्वोत्तम निर्णय माता-पिताके द्वारा ही होता है और यदि ये दोनों युवक-युवती धर्म तथा सदाचारकी रक्षा करना चाहें और यथार्थ प्रेमका भी आदर करें तो उन्हें अपने माता-पिताके इच्छानुसार विवाहका आग्रह छोड़ देना चाहिये और अपने पवित्र प्रेमको—भाई-बहनके पवित्र प्रेमकी भाँति आजीवन निबाहना चाहिये। इसीमें सब प्रकारसे मंगल और कल्याण है।

पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनमें परस्पर अभीतक केवल मन-वाणीका ही व्यवहार है या शारीरिक दोष भी आ चुका है; क्योंकि आज-कल ऐसी घटनाएँ बहुत होती हैं और हमको दूसरे कई युवक-युवतियोंके ऐसे पत्र भी मिले हैं, जिनमें स्पष्टरूपसे इस दोषको स्वीकार करके आगेके लिये राय माँगी गयी है। यदि यहाँ ऐसी बात हो चुकी हो अथवा वे दोनों किसी प्रकार भी अपना मत बदलनेको राजी न हों तो वैसी अवस्थामें कन्याके अभिभावक, स्वयं कन्या या अन्य कोई सज्जन, जिनका उनपर प्रभाव पड़ता हो, उन्हें समझाकर इस धर्मसंकटकी स्थितिमें उनकी अनुमति प्राप्त कर लें। यदि अनुमति न मिले और मत बदलनेयोग्य स्थिति भी सर्वथा न हो तो वे घरवालोंसे सम्बन्ध तोड़कर अपना विवाह इच्छानुसार कर लें। बालिग लड़कीको कानूनन कोई रोक नहीं सकता। अवश्य ही ऐसी क्रिया संस्कृति और धर्म तथा सदाचारकी दृष्टिसे उचित तो नहीं है, यह मेरा स्पष्ट मत है।

कन्याके अभिभावकोंसे भी मेरा नम्र निवेदन है कि वे परिस्थितिको भलीभाँति समझ लें। यदि कन्यामें कोई दोष घट चुका हो या कन्या किसी प्रकारसे भी अपना मत बदलनेको तैयार न हो तो उसे इच्छानुसार करनेके लिये स्वतन्त्रता दे देनी चाहिये। इस उम्रके युवक बच्चे तो हैं नहीं, जो अभिभावकोंकी डाँटसे मान जायँगे। घर तथा इज्जतका उन्हें विचार होता तो वे ऐसी बात उठाते ही नहीं। ऐसे प्रसंगोंमें यह निश्चय तो पहले ही कर लिया जाया करता है कि ‘चाहे कुछ भी हो, हम अपनी बातपर डटे ही रहेंगे। सारे बन्धनोंको तोड़कर ही तो प्रेमको निभाना है (यद्यपि वस्तुत: यह प्रेम नहीं है, है वासना ही)।’ अतएव मान-प्रतिष्ठाकी दृष्टिसे भी आप उन्हें नहीं रोक सकते। असवर्ण-विवाहकी अशास्त्रीयताका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि ऐसे युवक-युवतियाँ इन शास्त्रोंको भी प्रमाण नहीं मानते। ऐसी अवस्थामें कन्याके स्नेहवश अथवा उसका जीवन सुखी बनानेके लिये ही अपने मन तथा मतके एवं कुटुम्बकी रीति-नीतिके सर्वथा विरुद्ध होनेपर भी उसे विवाहकी अनुमति दे देना ही उचित प्रतीत होता है। इसे आपद्धर्म समझना चाहिये। इसके विपरीत करनेसे वे मानेंगे तो नहीं ही, किसी प्रकारकी दूसरी बड़ी बुराई भी उत्पन्न हो सकती है।

सच्ची बात तो यह है कि जवान लड़कियोंको कॉलेजोंमें पढ़ाना तथा लड़कोंसे अबाध मिलने-जुलने देना ही इस प्रकारकी बुराइयोंकी जड़ है। माता-पिता पीछे पछताते हैं (और ऐसे युवक-युवतियोंको भी मनमानी करनेपर भविष्यमें बहुत पछताना पड़ता है—इसके प्रमाण मेरे पास हैं); पर उच्च शिक्षाके नामपर लड़कियोंके जीवनका सर्वनाश करने और उन्हें विषय-वासनाकी जलती भट्ठीमें झोंक देनेसे बाज नहीं आते, यही मोह है। और फल तो बीजके अनुसार ही होगा।