वर्ण जन्म-कर्म दोनोंसे है

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। ‘गीतातत्त्वविवेचनी’ के ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’ इस श्लोकके अर्थके सम्बन्धमें आपने शंका की, उसके सम्बन्धमें निम्नलिखित निवेदन है। गीतातत्त्वविवेचनीमें श्लोकका यह अर्थ किया गया है—

‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार वर्णोंका समूह गुण और कर्मोंके विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कार्यका कर्ता होनेपर भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको तू वास्तवमें अकर्ता ही जान।’

अब इस श्लोकका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा गया है—‘अनादिकालसे जीवोंके जो जन्म-जन्मान्तरोंमें किये हुए कर्म हैं, जिनका फलभोग नहीं हो गया है, उन्हींके अनुसार उनमें यथायोग्य सत्त्व, रज और तमोगुणकी न्यूनाधिकता होती है। भगवान् जब सृष्टि-रचनाके समय मनुष्योंका निर्माण करते हैं, तब उन-उन गुण और कर्मोंके अनुसार उन्हें ब्राह्मण आदि वर्णोंमें उत्पन्न करते हैं। अर्थात् जिनमें सत्त्वगुण अधिक होता है, उन्हें ब्राह्मण बनाते हैं; जिनमें सत्त्वमिश्रित रजोगुणकी अधिकता होती है, उन्हें क्षत्रिय, जिनमें तमोमिश्रित रजोगुण अधिक होता है, उन्हें वैश्य और जो रजोमिश्रित तम:प्रधान होते हैं, उन्हें शूद्र बनाते हैं। इस प्रकार रचे हुए वर्णोंके लिये उनके स्वभावके अनुसार पृथक्-पृथक् कर्मोंका विधान भी भगवान् स्वयं ही कर देते हैं। अर्थात् ब्राह्मण शम-दम आदि कर्मोंमें रत रहें, क्षत्रियमें शौर्य-तेज आदि हों, वैश्य कृषि-गोरक्षामें लगें और शूद्र सेवापरायण हों—यों कहा गया है (१८। ४१—४४)। इस प्रकार गुण-कर्मविभागपूर्वक भगवान‍्के द्वारा चतुर्वर्णकी रचना होती है। यही व्यवस्था जगत‍्में बराबर चलती है।’

कर्मसे जाति माननेवालोंको इन पंक्तियोंपर विचार करना चाहिये। गीतातत्त्वविवेचनीमें भी कर्मसे जाति मानी गयी है, परंतु किस प्रकार? पूर्वजन्ममें जो कुछ कर्म होता है, उसीके अनुसार अगले जन्ममें जाति प्राप्त होगी। इस प्रकार जातिमें जन्मकी ही प्रधानता सिद्ध होती है। कर्म तो भावी जन्ममें कारणमात्र है। यही बात उपनिषदोंमें कही गयी है। छान्दोग्योपनिषद् में जीवोंकी कर्मानुरूप गतिका वर्णन करते हुए स्पष्ट बतलाया गया है कि—

‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा।’(५।१०।७)

अर्थात् ‘उन जीवोंमेंसे जो इस लोकमें रमणीय आचरण-(पुण्यकर्म करने) वाले होते हैं, वे निश्चय ही उत्तम योनि—ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं और जो इस संसारमें कपूय (अधम) आचरण करनेवाले होते हैं, वे अधमयोनि—कुत्ते, सूअर अथवा चण्डालकी योनिको प्राप्त होते हैं।’

स्मरण रहे, यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और चण्डाल आदि सबको ‘योनि’ कहा गया है। इस जन्मके कर्मके अनुसार जाति माननेपर ब्राह्मण आदि कोई नियत योनि ही नहीं रह सकती। प्रत्येक मनुष्य भिन्न-भिन्न कर्मोंका आचरण कर प्रतिदिन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनता रहेगा!

इसीलिये ‘ब्राह्मणादि वर्णोंका विभाग जन्मसे मानना चाहिये या कर्मसे?’ इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है—

‘यद्यपि जन्म और कर्म दोनों ही वर्णके अंग होनेके कारण वर्णकी पूर्णता दोनोंसे ही होती है, फिर भी प्रधानता जन्मकी ही है। इसलिये जन्मसे ही ब्राह्मणादि वर्णोंका विभाग मानना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंमें प्रधानता जन्मकी ही है। यदि माता-पिता एक वर्णके हों और किसी प्रकारसे भी जन्ममें संकरता न आये तो सहज ही कर्ममें भी प्राय: संकरता नहीं आती। परंतु संगदोष, आहार-दोष और दूषित शिक्षा-दीक्षादि कारणोंसे कर्ममें कुछ व्यतिक्रम भी हो जाय तो जन्मसे वर्ण माननेपर वर्णरक्षा हो सकती है। तथापि कर्मशुद्धिकी कम आवश्यकता नहीं है। कर्मके सर्वथा नष्ट हो जानेपर वर्णकी रक्षा बहुत ही कठिन हो जाती है। अत: जीविका और विवाहादि व्यवहारके लिये जन्मकी प्रधानता तथा कल्याणकी प्राप्तिमें कर्मकी प्रधानता माननी चाहिये; क्योंकि जातिसे ब्राह्मण होनेपर भी यदि उसके कर्म ब्राह्मणोचित नहीं हैं तो उसका कल्याण नहीं हो सकता तथा सामान्य धर्मके अनुसार शम-दमादिका साधन करनेवाला और अच्छे आचरणवाला शूद्र भी यदि ब्राह्मणोचित यज्ञादि कर्म करता है और उससे अपनी जीविका चलाता है तो पापका भागी होता है।’

‘यदि मनुष्यके आचरण और कर्म देखकर उसके अनुसार उसकी जाति मान ली जाय तो क्या हानि है?’ इस प्रश्नके उत्तरमें लिखा गया है—

‘जीवोंको कर्मफल भुगतानेके लिये ईश्वर ही उनके पूर्व-कर्मानुसार उन्हें विभिन्न वर्णोंमें उत्पन्न करते हैं। ईश्वरके विधानको बदलनेमें मनुष्यका अधिकार नहीं है। आचरण देखकर वर्णकी कल्पना करना भी असम्भव ही है। एक ही माता-पितासे उत्पन्न बालकोंके आचरणोंमें बड़ी विभिन्नता देखी जाती है। एक ही मनुष्य दिनभरमें कभी ब्राह्मणका-सा तो कभी शूद्रका-सा कर्म करता है, ऐसी अवस्थामें वर्णका निश्चय कैसे होगा? (दिनभरमें कितनी बार वर्ण बदलेंगे!) फिर, ऐसा होनेपर नीचा कौन बनना चाहेगा? खान-पान और विवाहादिमें भी अड़चनें पैदा होंगी। फलत: वर्णविप्लव हो जायगा और वर्ण-व्यवस्थाकी स्थितिमें बड़ी भारी बाधा उपस्थित हो जायगी। अतएव केवल कर्मसे वर्ण नहीं मानना चाहिये।’

उपर्युक्त विवेचनसे यह स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि वर्णका मूल है—जन्म; कर्म उसके स्वरूपकी रक्षामें प्रधान कारण है और वह अत्यावश्यक है। वर्तमान वर्णकी प्राप्तिमें पूर्वजन्मका कर्म कारण बनता है। इस प्रकार वर्ण और जातिमें जन्म और कर्म दोनों ही आवश्यक हैं, परंतु प्रधानता जन्मकी है। शेष भगवत्कृपा।