वेश्या-सेवन तथा मांस-भक्षण पाप ही हैं
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके प्रश्नोंका उत्तर निम्नलिखित है—
(१) आपने लिखा कि ‘वेश्याकी जीविका परपुरुषका सेवन है, उसका यह सहज पेशा है तथा जो आदमी वेश्याके पास जाता है, वह उसे पैसा देता है। फिर यह पाप क्यों माना जाता है?’ आपका यह प्रश्न बड़ा विचित्र है। फिर तो चोर-डकैत कहेंगे कि ‘चोरी-डकैती हमारी जीविका है, इसमें पाप कैसा?’ और पैसा देकर किसीकी हत्या करानेवाला कहेगा कि ‘मैंने पैसे दिये हैं, इससे वह पाप क्यों?’ वास्तवमें वेश्याका परपुरुष-सेवन तथा किसी पुरुषका वेश्या-सेवन तो पाप ही है। जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे तो पाप करते ही हैं और जो इसमें सहायता करते हैं तथा इसका समर्थन करते हैं, वे भी पाप ही करते हैं।
(२) आप लिखते हैं कि ‘प्राचीन कालमें अच्छे-अच्छे लोग मांस खाते थे, इसलिये अब मांस खानेमें क्यों आपत्ति होनी चाहिये?’ इसका उत्तर यह है कि प्रथम तो यह कहा भी नहीं जा सकता कि प्राचीन कालमें अच्छे लोग मांस खाते थे; क्योंकि अच्छे लोगोंने तो मांसकी जगह-जगह बड़ी निन्दा की है। फिर यदि प्राचीन कालमें कोई मांस खाता भी हो तो उसकी देखा-देखी अब भी मांस खाना चाहिये, यह सोचना बुद्धिसंगत नहीं है। मांस खाना पाप है; क्योंकि मांस बिना जीव-हिंसाके मिलता नहीं। ऐसी दशामें इस पापको करनेवाला चाहे प्राचीन कालका मनुष्य हो, चाहे अर्वाचीनका, वह पाप ही करता है। मांस खाना राक्षसोंका काम है। इसलिये मांसका सर्वथा त्याग ही करना चाहिये। प्राचीन लोगोंने बड़े-बड़े त्याग किये थे, उनका अनुकरण करनेकी बात तो नहीं की जाती; पर किसीने मांस खाया था, व्यभिचार किया था तो उसकी नकल करनी चाहिये—यह वास्तवमें अपने पापवासनासे पूर्ण चित्तका धोखा है, इस धोखेसे अवश्य बचना चाहिये।
(३) आप लिखते हैं कि ‘मैं भजन करना चाहता हूँ, पर भजन नहीं बनता।’ आप भजन करना चाहते हैं—यह तो बहुत ही अच्छी बात है। भगवान्की बड़ी कृपा है आपपर और कोई महान् पुण्य आपका सहायक है—चाहे वह आपका हो या आपके पूर्वपुरुषोंका—जिसके कारण आपके मनमें भजनकी चाह होती है। चाह होती है तो कुछ-न-कुछ भजन भी होता ही होगा; यह चाह भी तो भजन ही है। परंतु भजन नहीं बनता—इसका कारण तो प्रत्यक्ष है। आप वेश्या-सेवनको बुरा नहीं मानते और मांस खानेका भी समर्थन करते हैं और आपके लिखनेके अनुसार ये दोनों दोष आपमें हैं भी। मनुष्यमें दोष हो सकते हैं। अवश्य ही यदि वह उन्हें दोष मानता है तो उनसे छूटनेकी चेष्टा भी करता है, पर आप तो इन्हें दोष ही नहीं मानते! तब भगवान्का भजन कैसे बनेगा। भजन तो वेश्या और मांसका बन रहा है। इसीसे आप ‘परपुरुष-सेवन वेश्याकी जीविका है और प्राचीन कालमें अच्छे लोग मांस खाते थे’—यह तर्क रखकर मुझसे भी इनका समर्थन चाहते हैं! भाई साहब! इस पापके पथका परित्याग कर दीजिये। आप वेश्या और मांसका कभी सेवन नहीं करेंगे, यह दृढ़ प्रतिज्ञा कीजिये और प्रतिज्ञा कीजिये इन्हें सर्वथा पाप समझकर, केवल मेरे कहनेसे ही नहीं। मेरे कहनेसे त्याग देंगे, तो भी आपको लाभ तो होगा ही और मैं भी आपका उपकार मानूँगा; पर आपके द्वारा इनका यथार्थ त्याग तो तभी होगा, जब आपकी बुद्धि इन्हें पाप मान लेगी। शेष भगवत्कृपा।