व्यर्थ संदेह मत कीजिये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपका यह लिखना कि आप अपने एक सहपाठीके द्वारा, जो पहले आपके साथ शत्रुता रखता था, यह सुनकर कि आपकी पत्नी दुश्चरित्रा हैं, दु:खी हैं, स्वाभाविक है। ऐसी बातें दु:खदायिनी तो होती ही हैं। परंतु जब आपकी पत्नी हर तरहसे अपनी सच्चरित्रताका आपको विश्वास दिलाती हैं, आपको कोई प्रमाण भी नहीं मिलता तथा आपकी आत्मा इसको स्वीकार भी नहीं करती, तब आप सहपाठीकी बातोंपर विश्वास करके क्यों स्वयं दु:खी होते हैं और क्यों बेचारी पत्नीको दु:खी करते हैं। आप ऐसा क्यों नहीं मान लेते कि आपके साथ पुरानी शत्रुता रखनेवाले उन सहपाठी महोदयने ही आपलोगोंके जीवनको दु:खी बनानेके लिये यह प्रपंच रचकर आपके मनमें भ्रम पैदा करनेका प्रयास किया है? सती-साध्वी पत्नीपर किसीके कहनेभरसे मिथ्या संदेह करके उसे दु:खी करना बड़ा पाप है और इससे बड़े-बड़े दुष्परिणाम होते हैं। अतएव आप संदेह छोड़कर सुखपूर्वक रहिये।