ॐ श्रीपरमात्मने नम:
अथ पञ्चमोऽध्याय:
पाँचवाँ अध्याय
(श्लोक-१)
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥
अर्जुन बोले—हे कृष्ण! आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अत: इन दोनों साधनोंमें जो एक निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये।
व्याख्या—चौथे अध्यायके अन्तमें भगवान् ने अर्जुनको युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु यहाँ अर्जुनके प्रश्नसे पता लगता है कि उनके भीतर युद्ध करने अथवा न करनेकी और विजय प्राप्त करने अथवा न करनेकी अपेक्षा भी ‘मेरा कल्याण कैसे हो’—इसकी विशेष चिन्ता है। उनके अन्त:करणमें युद्धकी तथा विजय प्राप्त करनेकी अपेक्षा भी कल्याणका अधिक महत्त्व है। अत: प्रस्तुत श्लोकसे पहले भी अर्जुन दो बार अपने कल्याणकी बात पूछ चुके हैं (गीता २।७, ३।२)।
(श्लोक-२)
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते॥
श्रीभगवान् बोले—संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास (सांख्ययोग)-से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
व्याख्या—भगवान् कहते हैं कि यद्यपि सांख्ययोग और कर्मयोग—दोनोंसे ही मनुष्यका कल्याण हो जाता है, तथापि कर्मयोगके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन करना ही श्रेष्ठ है। कर्मयोग सांख्ययोगकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ तथा सुगम है।
(श्लोक-३)
ज्ञेय: स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
हे महाबाहो! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकांक्षा करता है, वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
व्याख्या—जिसने बाहरसे संन्यास-आश्रम ग्रहण कर लिया है, वह वास्तवमें संन्यासी नहीं है। संन्यासी वास्तवमें वह है, जिसने भीतरसे राग-द्वेषका त्याग कर दिया है। राग-द्वेषके रहते हुए मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता। परन्तु जिसने राग-द्वेषका त्याग कर दिया है, वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
जिसके भीतर राग-द्वेष नहीं है, वह कर्मयोगी शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी सदा संन्यासी ही है। उसे अपने कल्याणके लिये बाहरसे संन्यास-आश्रम ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है।
ज्ञानयोगमें अपने स्वरूपको जाननेकी मुख्यता रहनेसे ज्ञानयोगीमें उदासीनता रहती है। परन्तु कर्मयोगीमें दूसरेके हितकी मुख्यता रहती है। इसलिये अहंवृत्तिका त्याग कर्मयोगमें सुगम है, ज्ञानयोगमें नहीं।
(श्लोक-४)
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग (फलवाले) कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फल (परमात्माको) प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या—भगवान् के मतमें ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों ही लौकिक साधन हैं (गीता ३।३) और दोनोंका परिणाम भी एक ही है। दोनों ही साधनोंकी पूर्णता होनेपर साधक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार कर लेता है। अत: दोनों ही मोक्षप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं।
(श्लोक-५)
यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति॥
सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अत: जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है।
व्याख्या—फल एक होनेसे ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों साधन समकक्ष हैं।
(श्लोक-६)
सन्न्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुुमयोगत:।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥
परन्तु हे महाबाहो! कर्मयोगके बिना सांख्ययोग सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—कर्मयोगमें साधक सभी कर्म निष्कामभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है, इसलिये उसका राग सुगमतापूर्वक मिट जाता है। कर्मयोगके द्वारा अपना राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करनेसे शीघ्र सिद्धि होती है। भगवान् ने भी इसी कारण कर्मयोगीके ‘सर्वभूतहिते रता:’ भावको ज्ञानयोगके अन्तर्गत लिया है अर्थात् इस भावको ज्ञानयोगीके लिये भी आवश्यक बताया है (गीता ५।२५, १२।४)। यदि ज्ञानयोगीमें यह भाव नहीं होगा तो उसमें ज्ञानका अभिमान अधिक होगा।
(श्लोक-७)
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं, जिसका अन्त:करण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
व्याख्या—शरीर, इन्द्रियाँ और अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर कर्मयोगीको प्राणिमात्रके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है। एकदेशीयता मिटनेपर जब कर्मयोगीमें कर्तापन नहीं रहता, तब उसके द्वारा होनेवाले सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।
(श्लोक-८)
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन् नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥
(श्लोक-९)
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन् नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, (मल-मूत्रका) त्याग करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ तथा आँख खोलता हुआ और मूँदता हुआ भी ‘सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं’—ऐसा समझकर ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा माने।
व्याख्या—अपरा प्रकृतिके अहम् के साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण अविवेकी मनुष्य अपनेको कर्ता मान लेता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। परन्तु जब वह विवेकपूर्वक अहम् से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब उसे ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’—इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपका अनुभव हो जाता है।
हमारा वास्तविक स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। उस स्वरूपमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व न कभी था, न है, न होगा और न हो ही सकता है। अत: शरीरके द्वारा शास्त्रविहित क्रियाएँ होते हुए भी साधककी दृष्टि अपने स्वरूपकी ओर रहनी चाहिये, जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)।
(श्लोक-१०)
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य:।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।
व्याख्या—कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान् के अर्पण करता है। तीनोंका परिणाम एक ही होता है। तीनों योगोंमें ‘अपने लिये कुछ न करना’ आवश्यक है।
(श्लोक-११)
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ, शरीर, मन और बुद्धिके द्वारा अन्त:करणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।
व्याख्या—ममताका सर्वथा नाश होना ही अन्त:करणकी शुद्धि है। कर्मयोगी साधक शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना तथा अपने लिये न मानते हुए, प्रत्युत संसारका तथा संसारके लिये मानते हुए ही कर्म करते हैं। इस प्रकार कर्म करते-करते जब ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अन्त:करण पवित्र हो जाता है। पवित्र होनेपर अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति हो जाती है।
(श्लोक-१२)
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥
कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।
व्याख्या—कर्म बाँधनेवाले नहीं होते, प्रत्युत कर्मफलकी इच्छा बाँधनेवाली होती है। कर्म न तो बाँधते हैं, न मुक्त ही करते हैं। कर्मोंमें सकामभाव ही बाँधनेवाला और निष्कामभाव मुक्त करनेवाला होता है।
(श्लोक-१३)
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले (शरीररूपी) पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका (विवेकपूर्वक) मनसे त्याग करके नि:सन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।
व्याख्या—प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेसे जीव प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है—‘अवश:’ (गीता ३।५) और प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता बन जाता है। परन्तु जब जीव प्रकृतिके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटा देता है, तब वह स्वाधीन हो जाता है—‘वशी’। स्वाधीन होनेपर वह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता। प्रकृतिमें क्रियता और स्वरूपमें अक्रियता स्वत:सिद्ध है। चेतन तत्त्व (स्वरूप) न तो कर्म करता है और न कर्म करनेकी प्रेरणा ही करता है।
(श्लोक-१४)
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥
परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
व्याख्या—स्वरूपकी तरह परमात्मा भी किसीको कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं करते। मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है। कर्तापन, कर्म और कर्मफलके साथ संयोग जीवका काम है, परमात्माका नहीं। अत: इनका त्याग करनेका दायित्व भी जीवपर ही है। जीव ही अज्ञानवश प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर कर्मोंका कर्ता बनता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दु:खी होता है।
(श्लोक-१५)
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:॥
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पाप-कर्मको और न शुभ-कर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
व्याख्या—सर्वव्यापी चेतन-तत्त्व किसीके भी पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्मका कर्ता और भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अज्ञानवश जीव ही कर्ता-भोक्ता बन जाता है।
ज्ञानका कभी अभाव नहीं होता। अत: ‘अज्ञान’ शब्द ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत अधूरे ज्ञानका वाचक है। बौद्धिक ज्ञान अधूरा ज्ञान है। अधूरे ज्ञानसे ही ज्ञानका अभिमान उत्पन्न होता है। पूर्ण ज्ञान होनेसे अभिमान मिट जाता है। अत: बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देना बहुत बड़ा अज्ञान है। बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि नहीं जाती—यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानको ढकना है।
(श्लोक-१६)
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन:।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञानके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है।
व्याख्या—अपने विवेकको महत्त्व देनेसे अज्ञानका नाश हो जाता है। अज्ञानका नाश होनेपर वह विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है।
अज्ञानका नाश विवेकको महत्त्व देनेसे होता है, अभ्याससे नहीं। अभ्यास करनेसे जड़ताके साथ सम्बन्ध बना रहता है; क्योंकि जड़ता (शरीरादि)-की सहायता लिये बिना अभ्यास होता ही नहीं। तत्त्वज्ञानका अनुभव जड़ताके द्वारा नहीं होता, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होता है।
(श्लोक-१७)
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्-तन्निष्ठास्तत्परायणा:।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:॥
जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्त्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति)-को प्राप्त होते हैं।
व्याख्या—जहाँ मन-बुद्धि लगते हैं, वहाँ स्वयं भी लग जाता है—यह जीवका स्वभाव है। अत: मन-बुद्धि परमात्मामें लगनेपर स्वयं भी परमात्मामें लग जाता है (गीता १२।८)। स्वयं परमात्मामें लगनेपर अहम् (चिज्जड़ग्रन्थि) मिट जाता है। अहम् मिटनेपर सभी विकार मिट जाते हैं; क्योंकि सभी विकार, पाप, ताप अहम् पर ही टिके हुए हैं। अहम् मिटनेपर साधक साधनमें और साधन साध्यमें विलीन हो जाता है। फिर एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई सत्ता नहीं रहती। यही अपुनरावृत्तिको प्राप्त होना है। कारण कि जो परमात्मतत्त्व सब देश, काल आदिमें परिपूर्ण है, उसे प्राप्त होनेपर पुनरावृत्तिका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।
(श्लोक-१८)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥
ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।
व्याख्या—बेसमझ लोगोंके द्वारा यह श्लोक प्राय: सम-व्यवहारके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु इस श्लोकमें ‘समवर्तिन:’ न कहकर ‘समदर्शिन:’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार। यदि स्थूलदृष्टिसे भी देखें तो ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी और कुत्तेके प्रति सम-व्यवहार असम्भव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है, न कि चाण्डालका; दूध गायका ही पीया जाता है, न कि कुतियाका; सवारी हाथीपर ही की जा सकती है, न कि कुत्तेपर। जैसे शरीरके प्रत्येक अंगके व्यवहारमें विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दु:खमें समता होती है अर्थात् शरीरके किसी भी अंगका सुख हमारा सुख होता है और दु:ख हमारा दु:ख। हमें किसी भी अंगकी पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे ही प्राणियोंसे विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सुख-दु:खमें समभाव होना चाहिये।
(श्लोक-१९)
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥
जिनका अन्त:करण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है अर्थात् वे जीवन्मुक्त हो गये हैं; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।
व्याख्या—परमात्मतत्त्वमें स्थित हुए महापुरुषकी पहचान है—बुद्धिमें समता आना अर्थात् बुद्धिमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार न होना। जिसकी बुद्धि समतामें स्थित हो गयी है, उसे जीवन्मुक्त समझना चाहिये।
(श्लोक-२०)
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थित:॥
जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला मूढ़तारहित (ज्ञानी) तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।
व्याख्या—जीवन्मुक्त महापुरुषको प्रियता और अप्रियताका ज्ञान तो होता है, पर उसके कहलानेवाले अन्त:करणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार नहीं होते। ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत विकार होना दोषी है।
ब्रह्मको जाननेसे अहम् (व्यक्तित्व) मिट जाता है। अहम् मिटनेसे ब्रह्मको जाननेवाला नहीं रहता, प्रत्युत एक ब्रह्म-ही-ब्रह्म रह जाता है।
(श्लोक-२१)
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥
बाह्यस्पर्श (प्राकृत वस्तुमात्रके सम्बन्ध)-में आसक्तिरहित अन्त:करणवाला साधक अन्त:करणमें जो (सात्त्विक) सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।
व्याख्या—जब सांसारिक प्राणी-पदार्थोंकी आसक्ति मिट जाती है, तब साधकको सात्त्विक सुख प्राप्त होता है। जब साधक सात्त्विक सुखका भी उपभोग नहीं करता और उसमें सन्तोष नहीं करता, तब उसे अखण्ड सुखका अनुभव होता है। सात्त्विक सुख तो प्राकृत होनेसे खण्डित होता रहता है, पर अखण्ड सुख कभी खण्डित नहीं होता, प्रत्युत निरन्तर एकरस रहता है। यह अखण्ड सुख मोक्षका सुख है।
(श्लोक-२२)
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दु:खके ही कारण हैं। अत: विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।
व्याख्या—संसारके सभी सुख दु:खकी अपेक्षासे हैं। कोई भी सुख निरन्तर नहीं रहता। यदि सांसारिक सुख निरन्तर रहता तो वह दु:खरूप ही हो जाता। कारण कि सांसारिक भोगोंमें निरन्तर सुख देनेकी शक्ति ही नहीं है। निरन्तर सुख देनेकी शक्ति केवल मोक्षके अखण्डरसमें ही है। संसारके प्रत्येक सुखभोगका परिणाम दु:ख होता है—यह नियम है।
सांसारिक सुख मिलने और बिछुड़नेवाला है, जबकि स्वयं निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। सांसारिक सुख स्वयंका साथी नहीं है। इसलिये विवेकी साधक सांसारिक भोगोंकी प्राप्तिमें सुखी और अप्राप्तिमें दु:खी नहीं होता।
सांसारिक सुखभोगसे थकावट आती है और पारमार्थिक सुखसे विश्राम मिलता है। सांसारिक सुख सापेक्ष और पारमार्थिक सुख निरपेक्ष है। जब मनुष्यको नींद आती है, तब वह बड़े-से-बड़े सांसारिक सुखका भी त्याग करके सो जाता है। सोनेसे उसकी थकावट मिटती है, विश्राम मिलता है और ताजगी आती है। यदि वह सोये नहीं तो पागल हो जाय! तात्पर्य है कि सांसारिक सुखका त्याग किये बिना मनुष्य रह सकता ही नहीं।
(श्लोक-२३)
शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:॥
इस मनुष्यशरीरमें जो कोई मनुष्य शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।
व्याख्या—विवेकी साधकको चाहिये कि वह काम-क्रोधादि विकारोंको आरम्भमें ही सहन कर ले, उनके अनुसार क्रिया न करे (गीता ३।३४)। काम-क्रोधादिकी वृत्ति उत्पन्न होते ही उसका त्याग कर दे, अन्यथा एक बार काम-क्रोधादिका वेग उत्पन्न होनेपर साधक तदनुसार क्रिया करनेमें बाध्य हो जाता है (गीता ३।३६)। काम-क्रोधादिके वशमें न होनेवाला साधक ही वास्तवमें योगी है। जो योगी होता है, वही वास्तवमें सुखी होता है।
(श्लोक-२४)
योऽन्त:सुखोऽन्तरारामस्-तथान्तर्ज्योतिरेव य:।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला (ब्रह्मरूप बना हुआ) सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।
(श्लोक-२५)
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाण-मृषय: क्षीणकल्मषा:।
छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:॥
जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।
(श्लोक-२६)
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये सब ओरसे (शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।
(श्लोक-२७)
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्-चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो:।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
(श्लोक-२८)
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्-मुनिर्मोक्षपरायण:।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स:॥
बाहरके पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें (स्थित करके) तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो केवल मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
व्याख्या—बाहरके पदार्थोंको बाहर ही छोड़नेका तात्पर्य है कि साधककी वृत्तिमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय अन्य कोई भी सत्ता न रहे। मुक्ति स्वत:सिद्ध है, पर मिलने और बिछुड़नेवाले प्राणी-पदार्थोंकी सत्ता, महत्ता और अपनापन होनेके कारण उसका अनुभव नहीं होता।
(श्लोक-२९)
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर भक्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—भगवान् केवल यज्ञों और तपोंके भोक्ता ही नहीं, प्रत्युत भक्तोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंके भोक्ता भी हैं (गीता ९।२७)। प्रेमके भोक्ता भी भगवान् ही हैं। कोई किसीको नमस्कार करता है तो उसके भोक्ता भी वही हैं । कोई किसी देवताका पूजन करता है तो उसके भोक्ता भी वही हैं (गीता ९।२३)।
भगवान् सम्पूर्ण शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं, सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं और हमारे परम सुहृद् हैं—ऐसा दृढ़तापूर्वक स्वीकार करनेसे साधककी संसारसे ममता हटकर भगवान् में आत्मीयता हो जाती है, जिसके होते ही परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्याय:॥५॥