ॐ श्रीपरमात्मने नम:
अथाष्टादशोऽध्याय:
अठारहवाँ अध्याय
(श्लोक-१)
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥
अर्जुन बोले—हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
व्याख्या—विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम ‘संन्यास’ (सांख्ययोग) है, और कर्म तथा फलकी आसक्ति छोड़नेका नाम ‘त्याग’ (कर्मयोग) है।
(श्लोक-२)
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु:।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा:॥
(श्लोक-३)
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
श्रीभगवान् बोले—कई विद्वान् काम्य कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
(श्लोक-४)
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तित:॥
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! तू संन्यास और त्याग—इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।
(श्लोक-५)
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
व्याख्या—मनीषीका अर्थ है—विचारशील। जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म यदि अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायँ तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोकमें महान् दु:ख देनेवाले हो जाते हैं।
(श्लोक-६)
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥
हे पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तपरूप) कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंकी इच्छाका त्याग करके करना चाहिये—यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
व्याख्या—कर्मासक्ति और फलासक्ति ही खास बन्धन है, जिससे छूटनेपर ही मनुष्य योगारूढ़ होता है (गीता६।४)। इसलिये इस श्लोकमें कर्मासक्ति और फलासक्ति—दोनोंके त्यागकी बात आयी है।
शुभ-कर्म भी निष्कामभाव होनेसे ही कल्याण करनेवाले होते हैं। यदि निष्कामभाव न हो तो शुभ-कर्म भी बन्धनकारक हो जाते हैं—‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।
(श्लोक-७)
नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्-तामस: परिकीर्तित:॥
नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
व्याख्या—शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है, वे सभी ‘विहित’ कर्म कहलाते हैं। उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यकहै, उसके लिये वह ‘नियत’ कर्म कहलाता है। विहितकी अपेक्षा भी नियत कर्ममें मनुष्यकी विशेष जिम्मेवारी होती है। जैसे, किसीको पहरेपर खड़ा कर दिया अथवा जल पिलानेके लिये प्याऊपर बैठा दिया तो यह उसके लिये नियत कर्म हो गया। नियत कर्मके त्यागका अधिक दोष लगता है। नियतका त्याग करनेसे ही विप्लव होता है। नियत कर्मका त्याग करनेके कारण ही आजकल समाजमें अव्यवस्था हो रही है। अत: रुपये कम मिलें या अधिक, सुख-आराम कम मिले या अधिक, अपने नियत कर्मका कभी त्याग नहीं करना चाहिये। नियतका मोहपूर्वक त्याग करना तामस है, जिसका फल अधोगतिकी प्राप्ति है—‘अधो गच्छन्ति तामसा:’ (गीता १४।१८)।
(श्लोक-८)
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
जो कुछ कर्म है, वह दु:खरूप ही है—ऐसा समझकर कोई शारीरिक परिश्रमके भयसे उसका त्याग कर दे तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।
व्याख्या—त्यागका फल शान्ति है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२) और रागका फल दु:ख है—‘रजसस्तु फलं दु:खम्’ (गीता१४।१६)। राजस मनुष्यको त्यागका फल ‘शान्ति’ तो नहीं मिलती, पर रागका फल ‘दु:ख’ तो मिलता ही है!
राजस मनुष्य त्याग करके भी उसके फल (शान्ति)-को नहीं पाता; क्योंकि उसने जो त्याग किया है, वह अपने सुख-आरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशु-पक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुख-आरामके लिये शुभ-कर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको उसका फल दण्डरूपसे अवश्य भोगना पड़ता है।
(श्लोक-९)
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत:॥
हे अर्जुन! ‘केवल कर्तव्यमात्र करना है’—ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
व्याख्या—राजस त्यागमें शारीरिक परिश्रमके भयसे और तामस त्यागमें मोहपूर्वक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग किया जाता है। परन्तु सात्त्विक त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जाता, प्रत्युत कर्मोंको कर्तव्यमात्र समझकर निष्कामभावसे तत्परतापूर्वक किया जाता है। राजस तथा तामस त्यागमें बाहरसे तो कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद दीखता है, पर भीतरसे सम्बन्ध जुड़ा रहता है। परन्तु सात्त्विक त्यागमें बाहरसे कर्म करनेपर भी भीतरसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
एक मार्मिक बात है कि कर्तव्यमात्र समझकर जो भी कर्म किया जाता है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। लौकिक साधन (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग)-में शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद मुख्य है, इसलिये साधकको प्रत्येक कर्म कर्तव्यमात्र समझकर करना चाहिये। स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे तो बन्धन होता है, पर सम्बन्ध न जोड़कर कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे मुक्ति होती है।
अलौकिक साधन (भक्तियोग)-में भगवान् से सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान, कथा, कीर्तन आदि कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपने प्रेमास्पदका कार्य (सेवा-पूजन) समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये प्रेमपूर्वक करने चाहिये। जैसे, दवा कर्तव्य समझकर ली जाती है, पर भोजन कर्तव्य समझकर नहीं किया जाता, प्रत्युत अपनी भूख मिटानेके लिये किया जाता है। ऐसे ही भक्तको भी जप, ध्यान आदि कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपनी स्वयंकी भूख (आवश्यकता) मिटाकर भगवान् के साथ नित्य-सम्बन्ध जाग्रत् करनेके लिये करने चाहिये। यदि वह जप, ध्यान आदि कर्तव्य समझकर करेगा तो भगवत्सम्बन्ध (प्रेम) जाग्रत् नहीं होगा।
(श्लोक-१०)
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:॥
जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।
व्याख्या—मनुष्यका स्वभाव है कि वह रागपूर्वक ग्रहण और द्वेषपूर्वक त्याग करता है। राग और द्वेष—दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध जुड़ता है। भगवान् कहते हैं कि वास्तवमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो शुभ कर्मका ग्रहण तो करता है, पर रागपूर्वक नहीं और अशुभ कर्मका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं।
(श्लोक-११)
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है—ऐसा कहा जाता है।
व्याख्या—‘कर्मफलत्याग’ का तात्पर्य है—कर्मफलकी इच्छाका त्याग। कारण कि कर्मफलका त्याग हो ही नहीं सकता; जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा? भोजन करनेपर तृप्तिका त्याग कैसे होगा? खेती करनेपर अन्नका त्याग कैसे होगा? अत: साधकको कर्मफलकी इच्छाका त्याग करना है। फलेच्छाका त्याग करनेसे साधक सुखी-दु:खी नहीं होगा। इसलिये गीतामें फलेच्छाके त्यागको ही फलका त्याग कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मफलकी इच्छाका त्याग होता है और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका।
बाहरका त्याग वास्तवमें त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतरका त्याग ही त्याग है। यदि कोई बाहरसे त्याग करके एकान्तमें, वनमें या हिमालयमें चला जाय तो भी संसारका बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरनेवालेका अपने शरीरसहित सब व्यक्तियों और पदार्थोंका त्याग हो जाता है, पर इससे उसका मोक्ष नहीं हो जाता। अत: हमारे भीतरकी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधनेवाली हैं, संसार बाँधनेवाला नहीं है। इसलिये अपने लिये कुछ न करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है—‘यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (गीता ४।२३)। यदि कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है, इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान हो जाता है; क्योंकि समाधिमें प्रकृतिजन्य कारण-शरीरका सम्बन्ध बना रहता है।
(श्लोक-१२)
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित—ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।
व्याख्या—जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है, वह ‘इष्ट’ (अनुकूल) कर्मफल है, जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता, वह ‘अनिष्ट’ (प्रतिकूल) कर्मफल है, और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका होता है, वह ‘मिश्रित’ कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्राय: मिश्रित ही फल होता है अर्थात् इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। जो मनुष्य फलकी इच्छा रखकर कर्म करते हैं, उन्हें उपर्युक्त तीनों कर्मफल अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें प्राप्त होते हैं, जिनसे वे सुखी-दु:खी होते रहते हैं। अनुकूल परिस्थितिसे सुखी होना और प्रतिकूल परिस्थितिसे दु:खी होना ही बन्धन है। परन्तु फलेच्छाका त्याग करके कार्य करनेवाले मनुष्योंको इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उसके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है, पर वे उनसे सुखी-दु:खी नहीं होते।
(श्लोक-१३)
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
हे महाबाहो! कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्य-सिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मुझसे समझ।
(श्लोक-१४)
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
व्याख्या—यहाँ आत्माको अकर्ता बतानेके लिये पाँच कारणोंका वर्णन किया गया है। इन पाँचोंमें कर्तृत्वका त्याग होनेपर कर्मोंका अन्त (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है। कर्मोंकी सिद्धिमें वे पाँच कारण इस प्रकार हैं—
१-अधिष्ठान—शरीर।
२-कर्ता—अपरा प्रकृतिके अहंकारके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला अविवेकी मनुष्य।
३-करण—पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन, बुद्धि तथा अहंकार—ये तेरह करण।
४-करणोंकी अलग-अलग चेष्टाएँ।
५-स्वभाव अथवा अन्त:करणके अच्छे-बुरे संस्कार। क्रियाका वेग और स्वभाव—दोनों एक ही हैं (‘स्वभावस्तुप्रवर्तते’ गीता ५।१४)।
(श्लोक-१५)
शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नर:।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव:॥
मनुष्य शरीर, वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।
(श्लोक-१६)
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान् न स पश्यति दुर्मति:॥
परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता देखता है, वह दुष्ट बुद्धिवाला ठीक नहीं देखता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है अर्थात् उसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है।
व्याख्या—सब कारकोंमें कर्ता मुख्य है। कर्तामें चेतनकी झलक आती है, अन्य कारकोंमें नहीं। वास्तवमें ‘कर्ता’ नाम चेतनका नहीं है, प्रत्युत चेतनद्वारा जड़से माने हुए सम्बन्धका है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसलिये भगवान् ने प्रस्तुत श्लोकमें अपने वास्तविक स्वरूप (चेतन)-को कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है। स्वरूपमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों ही नहीं हैं (गीता १३।३१)। मूलमें ये नहीं हैं, तभी इनका त्याग होता है।
वास्तवमें कर्ता कोई नहीं है। न चेतन कर्ता है, न जड़। यदि किसीको कर्ता मानना ही पड़े तो साधकके लिये यही उचित है कि वह जड़को कर्ता माने। गीतामें भगवान् ने कर्मोंके होनेमें पाँच कारण बताये हैं—१-प्रकृति (३।२७, १३।२९), २-गुण (३।२८, १४।१९), ३-इन्द्रियाँ (५।९), ४-स्वभाव (५।१४, ३।३३), ५-पाँच हेतु (१८।१४)। वास्तवमें कर्मोंके होनेमें मूल कारण एक ‘प्रकृति’ ही है। अत: कर्तृत्व प्रकृतिमें ही है, स्वरूपमें नहीं।
साधक खाने-पीने, सोने-जागने आदि लौकिक क्रियाओंको तो विचारद्वारा प्रकृतिमें होनेवाली सुगमतासे मान सकता है, पर वह जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है तो यह वास्तवमें साधकके लिये बाधक है। कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे क्रिया चाहे ऊँची-से-ऊँची हो अथवा नीची-से-नीची, वह एक जातिकी (प्राकृत) ही है। लाठी घुमाना और माला फेरना—दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। तात्पर्य है कि खाने-पीने, सोने-जागने आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। प्रकृतिके सम्बन्धके बिना कोई क्रिया सम्भव ही नहीं है। अत: साधकको चाहिये कि वह पारमार्थिक क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उन्हें अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्त:करणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है। भगवान् के लिये की गयी उपासनामें भगवत्कृपाकी प्रधानता होती है, इसलिये इसमें भी साधकका कर्तृत्व नहीं है। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा होनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रियाकी मुख्यता होनेपर वर्षोंतक साधन करनेपर भी लाभ नहीं होता। अत: क्रियाका महत्त्व न होकर भगवान् में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं।
(श्लोक-१७)
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥
जिसका अहंकृतभाव (‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा भाव) नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह (युद्धमें) इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
व्याख्या—अहंकृतभाव नहीं होनेका तात्पर्य है—अहंतारहित होना अर्थात् ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा भाव न होना। बुद्धि लिप्त नहीं होनेका तात्पर्य है—कामना, ममता और स्वार्थभावसे रहित होना अर्थात् ‘मैं भोक्ता हूँ’—ऐसा भाव न होना। स्वरूपमें न कर्तापन है, न भोक्तापन। केवल जड़ शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जीव जिस अहंभावको स्वीकार करता है, उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आ जाता है।
अर्जुनने कहा था कि इन आततायियोंको और गुरुजनोंको मारनेसे हमें पाप लगेगा (गीता १। ३६, २।५)। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि यदि अहंता और बुद्धिकी लिप्तता न हो तो इनके मारनेसे पाप लगनेकी बात ही क्या है, सम्पूर्ण प्राणियोंको मारनेसे भी पाप नहीं लगेगा! बुद्धि कामना, ममता और स्वार्थभावसे लिप्त होती है। गंगाजीमें कोई डूबकर मर जाता है तो उससे गंगाजीको पाप नहीं लगता और कोई उसका जल पीता है, स्नान करता है, खेती करता है तो उससे गंगाजीको पुण्य नहीं लगता। कारण कि गंगाजीमें अहंकृतभाव और बुद्धिकी लिप्तता नहीं है। डॉक्टरमें कामना, ममता और स्वार्थबुद्धि नहीं होती तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसे पाप नहीं लगता।
ज्ञानयोगसे अहंकृतभावका नाश होता है और कर्मयोगसे बुद्धिकी लिप्तताका नाश होता है। दोनोंमेंसे किसी एकका नाश होनेपर दूसरा भी नष्ट हो जाता है। अहंकृतभावके कारण ही जीवमें भोग और मोक्षकी इच्छा पैदा होती है। अहंकृतभाव मिटनेसे भोगेच्छा भी मिट जाती है। भोगेच्छा मिटनेपर मोक्षकी इच्छा स्वत: पूरी हो जाती है; क्योंकि मोक्ष स्वत:सिद्ध है।
(श्लोक-१८)
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसङ्ग्रह:॥
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता—इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।
व्याख्या—जब मनुष्यके भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—इस त्रिपुटीसे ‘कर्मप्रेरणा’ अर्थात् कर्म करनेमें प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मुझे अमुक फल मिलेगा। कर्मप्रेरणा होनेसे कर्ता, करण और कर्म—इनसे ‘कर्मसंग्रह’ अर्थात् पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्मका संग्रह होता है। यदि कर्मसंग्रह न हो तो कर्म बाँधनेवाला नहीं होता, केवल क्रियामात्र होती है।
(श्लोक-१९)
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत:।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥
गुणोंका विवेचन करनेवाले शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो।
(श्लोक-२०)
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव (सत्ता)-को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।
व्याख्या—अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो ‘है’-पन दीखता है, वह उस वस्तु, व्यक्ति आदिका नहीं है, प्रत्युत उन सबमें परिपूर्ण एक परमात्माका है। उन वस्तु, व्यक्ति आदिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। परन्तु अपनी अज्ञतासे उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, तब अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह उनमें परिपूर्ण एक निर्विकार तत्त्वको देखता है।
साधककी दृष्टिमें प्राणियोंकी भी सत्ता रहनेके कारण यह ‘सात्त्विक ज्ञान’ (विवेक) कहा गया है। यदि उसकी दृष्टिमें प्राणियोंकी सत्ता न रहे, केवल एक अविनाशी सत्ता ही रहे तो यह गुणातीत ‘तत्त्वज्ञान’ (ब्रह्मकी प्राप्ति) ही है। वह अविनाशी सत्ता सब जगह समानरूपसे विद्यमान है। उस सत्ताके साथ हमारी स्वाभाविक एकता है।
(श्लोक-२१)
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग रूपसे अनेक भावोंको अलग-अलग जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो।
व्याख्या—राजस ज्ञानमें रागकी मुख्यता होती है, क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिको सत्ता देकर उनके साथ रागपूर्वक सम्बन्ध जोड़नेके कारण सब अलग-अलग दीखते हैं।
(श्लोक-२२)
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
व्याख्या—तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। वह उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पांचभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है।
इस श्लोकमें ‘ज्ञान’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। भागवतमें इसे ‘पशुबुद्धि’ कहा गया है—‘पशुबुद्धिमिमां जहि’ (१२। ५। २)।
(श्लोक-२३)
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषत: कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या—जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक वह ‘सात्त्विक कर्म’ है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर यह ‘अकर्म’ हो जाता है।
(श्लोक-२४)
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन:।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
परन्तु जो कर्म भोगोंकी इच्छासे अथवा अहंकारसे और परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
व्याख्या—कर्म करते समय प्रत्येक मनुष्यके शरीरमें परिश्रम होता ही है; परन्तु शरीरमें राग रहनेके कारण राजस मनुष्य शरीरका आराम चाहता है, जिससे उसे थोड़े काममें भी अधिक परिश्रम प्रतीत होता है।
(श्लोक-२५)
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
व्याख्या—तामस मनुष्य अपनी शक्ति, परिणाम आदिका विचार न करके मूढ़तासे काम करता है। वह स्वाभाविक ही ऐसे काम करता है, जिनसे दूसरोंको बाधा पहुँचे; जैसे—रास्तेमें खड़े होकर बात करने लग जाना, रास्तेमें स्कूटर, साइकिल आदि खड़ी कर देना, दरवाजेके बीचमें खड़े हो जाना, आदि-आदि। दूसरोंको लगनेवाली बाधाकी तरफ उसका ध्यान जाता ही नहीं!
सात्त्विक स्वभाव स्वत: उत्थानकी ओर जाता है, राजस स्वभावमें उत्थान रुक जाता है और तामस स्वभाव स्वत: पतनकी ओर जाता है।
(श्लोक-२६)
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
जो कर्ता रागरहित, कर्तृत्वाभिमानसे रहित, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या—सात्त्विक मनुष्य संग और अहंवदनशीलता—इन दो बातोंसे रहित होता है, धृति और उत्साह—इन दो बातोंसे युक्त होता है, तथा सिद्धि और असिद्धि—इन दो बातोंमें निर्विकार (सम) रहता है।
(श्लोक-२७)
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्-लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:।
हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्ष-शोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।
(श्लोक-२८)
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस:।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।
व्याख्या—छब्बीसवाँ, सत्ताईसवाँ और अट्ठाईसवाँ श्लोक ‘कर्ता’-को लेकर कहे गये हैं। कर्ता जैसा होता है, वैसे ही कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंवाला होता है, उन्हीं गुणोंके अनुसार कर्मोंका रूप होता है। करण भी कर्ताके अनुरूप ही होते हैं। कर्ता सात्त्विक, राजस अथवा तामस होगा तो उसके द्वारा होनेवाले कर्म भी सात्त्विक, राजस अथवा तामस हो जाते हैं।
(श्लोक-२९)
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥
हे धनंजय! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलग रूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं।
व्याख्या—मनुष्य कोई भी कार्य करता है, बुद्धिपूर्वक ही करता है। उस कार्यकी सिद्धिके लिये धृतिकी अत्यन्त आवश्यकता है। धृति (धारणशक्ति)-के बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। यदि मनुष्यकी बुद्धिमें विचार-शक्ति तेज है और उसे धारण करनेकी शक्ति श्रेष्ठ है तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती, जिससे उसका कार्य सिद्ध हो जाता है।
(श्लोक-३०)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी॥
हे पृथानन्दन! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
व्याख्या—प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको—दोनोंको जाननेका तात्पर्य संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही है। अगर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद न हो तो वह जानना वास्तवमें जानना नहीं है, प्रत्युत सीखना है।
गीताका ‘सात्त्विक’ गुण गुणातीत करनेवाला, संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेवाला है। इसलिये इसमें बन्धन और मोक्षतकका विचार होता है—‘बन्धं मोक्षं च या वेत्ति’। सात्त्विकी बुद्धिमें वह विवेक होता है, जो तत्त्वज्ञानमें परिणत होता है। विवेकवती बुद्धि ही यह जानती है कि ब्रह्मलोककी प्राप्तितक सब बन्धन है।
(श्लोक-३१)
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी॥
हे पार्थ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
व्याख्या—जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती, ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण (राग) आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्म-अधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। जो मनुष्य धर्म-अधर्म तथा कर्तव्य-अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बन्धन और मोक्षको कैसे जानेगा? नहीं जान सकता। बुद्धि रागात्मिका होनेसे वह इनको ठीक तरहसे नहीं जानता; क्योंकि रागकी मुख्यता होनेसे वह विवेकको महत्त्व नहीं दे पाता। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका रंग चढ़नेसे उसका विवेक लुप्त हो जाता है।
(श्लोक-३२)
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥
हे पृथानन्दन! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म—ऐसा मान लेती है और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।
व्याख्या—जिनकी बुद्धि तामसी होती है, उन्हें व्यवहार और परमार्थमें सब जगह उलटा ही दीखता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वर्तमानमें देखनेमें आ रहा है। जैसे, पशुओंके विनाशको ‘मांसका उत्पादन’ कहा जाता है! गर्भपातरूपी महापापको और मनुष्यकी उत्पादक शक्तिके विनाशको ‘परिवार-कल्याण’ कहा जाता है! स्त्रियोंकी उच्छृंखलताको, मर्यादाके नाशको ‘नारीमुक्ति’ कहा जाता है! पहले स्त्री घरकी स्वामिनी (गृहलक्ष्मी) होती थी, अब घरसे बाहर अनेक पुरुषोंकी दासता (नौकरी) करनेको ‘नारीकी स्वाधीनता’ कहा जाता है! बालकोंको स्कूलमें भरती करनेके लिये दी गयी रिश्वत, घूसको ‘दान’ (डोनेशन) कहा जाता है! धार्मिकताको ‘साम्प्रदायिकता’ और धर्म-विरुद्धको ‘धर्म-निरपेक्ष’ कहा जाता है! जब विनाशकाल समीप आता है, तभी ऐसी विपरीत, तामसी बुद्धि उत्पन्न होती है।
(श्लोक-३३)
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया:।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्त्विकी॥
हे पार्थ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है अर्थात् संयम रखता है, वह धृति सात्त्विकी है।
व्याख्या—जीव परमात्माका अंश है, इसलिये परमात्माके सिवाय कहीं भी जाना ‘व्यभिचार’ है, और केवल परमात्माकी तरफ चलना ‘अव्यभिचार’ है। केवल परमात्माकी तरफ चलनेवाली धृति ‘अव्यभिचारिणी धृति’ है। इस धृतिसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर आधिपत्य हो जाता है।
(श्लोक-३४)
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा पार्थ राजसी॥
हे पृथानन्दन अर्जुन! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और धनको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।
व्याख्या—राजसी धारणशक्तिसे मनुष्य अपनी विविध कामनाओंकी पूर्तिके लिये ही धर्मका अनुष्ठान करता है, भोग-पदार्थोंको भोगता है और धनका संग्रह करता है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस मनुष्य जो कुछ भी शुभ-कर्म करता है, उसमें उसकी यही कामना रहती है कि इस कर्मसे मुझे इस लोकमें भी सुख-आराम, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि मिले और परलोकमें भी सुखभोग मिले।
(श्लोक-३५)
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी॥
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दु:ख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है, वह धृति तामसी है।
व्याख्या—निद्रा, भय, चिन्ता, दु:ख, घमण्ड आदि दोष तो रहेंगे ही, ये दूर हो ही नहीं सकते—ऐसा निश्चय करनेवाले तामस मनुष्य ‘दुर्मेधा’ हैं। ऐसे मनुष्योंका दोषोंको छोड़नेकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता, छोड़नेकी हिम्मत ही नहीं होती, प्रत्युत वे इनको स्वाभाविक ही धारण किये रहते हैं। इन दोषोंको छोड़नेसे भला होगा—यह बात उनकी समझमें आती ही नहीं!
(श्लोक-३६)
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति॥
(श्लोक-३७)
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
‘हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मुझसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दु:खोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।’
व्याख्या—सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान, जप, कीर्तन आदिसे जो सुख होता है, वह परमात्माके सम्बन्धसे होनेके कारण ‘सात्त्विक’ कहा गया है। कारण कि वह सुख मान-बड़ाई, सुख-आराम, रुपये, भोग आदि विषयेन्द्रिय-सम्बन्धका (राजस) भी नहीं है और प्रमाद, आलस्य, निद्राका (तामस) भी नहीं है।
पूर्वपक्ष—चौदहवें अध्यायमें तो सात्त्विक सुखको बाँधनेवाला बताया था—‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (१४। ६)। पर यहाँ उसे दु:खोंका नाश करनेवाला बताते हैं—‘दु:खान्तं च निगच्छति’। इसका सामंजस्य कैसे करेंगे?
उत्तरपक्ष—इसका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक सुखमें रमण (भोग) करनेसे वह बाँधनेवाला हो जाता है अर्थात् गुणातीत नहीं होने देता। यदि रमण न करे तो वह सात्त्विक सुख दु:खोंका नाश करनेवाला हो जाता है। सुख भोगनेसे दु:खोंका नाश नहीं होता। भोगका त्याग करनेसे ही योग होता है। इसलिये सात्त्विक सुखसे भी असंगता होनी चाहिये। संग होनेसे बन्धनकारक रजोगुण आ जाता है। सत्त्वगुणमें रजोगुण आनेसे पतन होता है।
विवेकको महत्त्व न देनेके कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह दीखता है। राजस मनुष्य विवेकको महत्त्व नहीं देता। अत: सात्त्विक सुखका आरम्भमें विषकी तरह दीखना राजसपना है। तात्पर्य है कि सात्त्विक सुख दु:खदायी नहीं होता, प्रत्युत मनुष्यकी बुद्धिमें राजसपना होनेसे सात्त्विक सुख भी उसको विषकी तरह दु:खदायी दीखता है। उसका उद्देश्य तो सात्त्विक सुखका है, पर भीतर राजस सुखमें राग है।
(श्लोक-३८)
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे होता है, वह आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह प्रतीत होता है; अत: वह सुख राजस कहा गया है।
व्याख्या—जैसे भोजन आरम्भमें बहुत प्रिय लगता है, पर भोजन करते-करते जब पेट भर जाता है, भोजन करनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है, तब उससे अरुचि हो जाती है। फिर जो भोजन आरम्भमें सुख देनेवाला प्रतीत होता था, वही दु:ख देनेवाला हो जाता है। उस समय कोई व्यक्ति जबर्दस्ती खिलाये तो वह शत्रुकी तरह प्रतीत होता है! यही बात सभी सांसारिक भोगोंमें लागू होती है। कोई भी सांसारिक सुख अखण्ड नहीं रहता। आरम्भमें सांसारिक सुख अमृतकी तरह बहुत प्रिय लगता है; परन्तु उसे भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है, उस सुखसे बिलकुल अरुचि हो जाती है, तब वही सुख विषकी तरह दु:खदायी हो जाता है। अविवेकी मनुष्य आरम्भको ही महत्त्व देता है। आरम्भ तो सदा रहता नहीं, पर उसकी कामना सदा रहती है, जो सम्पूर्ण दु:खोंका कारण है। परिणामको देखनेकी योग्यता मनुष्यमें ही है। परिणामको न देखना पशुता है। इसलिये विवेकी मनुष्य आरम्भको न देखकर परिणामको देखता है, इसलिये वह भोगोंमें आसक्त नहीं होता—‘न तेषु रमते बुध:’ (गीता ५।२२)।
वास्तवमें आरम्भ (संयोग) मुख्य नहीं है, प्रत्युत अन्त (वियोग) ही मुख्य है। मनुष्य आरम्भकालको चाहता है, पर वह रहता नहीं; क्योंकि यह नियम है कि प्रत्येक आरम्भका अन्त होता ही है। जिसका आरम्भ और अन्त होता है, उसकी इच्छासे ही दु:खोंकी उत्पत्ति होती है। परन्तु राजसी वृत्तिके कारण आरम्भ (संयोग) अच्छा प्रतीत होता है। यदि मनुष्य आरम्भकालके सुखको महत्त्व न दे तो दु:ख कभी आयेगा ही नहीं। आरम्भको देखनेसे भोग होता है और परिणामको देखनेसे योग।
(श्लोक-३९)
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन:।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें भी अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।
व्याख्या—जब तमोगुणी प्रमाद-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके विवेक-ज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्रा-आलस्य-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। तात्पर्य है कि विवेक-ज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है और प्रकाशके ढकनेपर आलस्य तथा निद्रा आती है। तामस मनुष्यको निद्रा, आलस्य और प्रमाद—तीनोंसे सुख मिलता है।
तामस मनुष्यमें मोह रहता है (गीता १४। ८)। मोह विवेकमें बाधक होता है। तामसी वृत्ति विवेक जाग्रत् नहीं होने देती। इसलिये तामस मनुष्यका विवेक मोहके कारण लुप्त हो जाता है, जिससे वह आरम्भ या अन्तको देखता ही नहीं।
(श्लोक-४०)
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन:।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:॥
पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह (ऐसी कोई) वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।
व्याख्या—दसवें अध्यायमें भगवान् ने भक्ति (विश्वास)-की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको अपनेसे उत्पन्न होनेवाली बताया था (१०।३९)। यहाँ भगवान् ज्ञान (विवेक)-की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली बताते हैं। कारण कि विवेकीकी दृष्टिमें सत् और असत् दोनों रहते हैं, पर भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान् ही रहते हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। विवेकमार्गमें असत् का, गुणोंका त्याग मुख्य है, पर भक्तिमार्गमें भगवान् का सम्बन्ध मुख्य है।
संसारकी कोई भी वस्तु तीनों गुणोंसे रहित नहीं है—यह बात अज्ञानीकी दृष्टिसे कही गयी है, तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिसे नहीं। तत्त्वज्ञानीकी दृष्टि सत्तामात्र स्वरूपकी तरफ रहती है, जो स्वत:स्वाभाविक गुणातीत है (गीता १३।३१)।
(श्लोक-४१)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:॥
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शू्द्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं।
व्याख्या—कर्मयोगके प्रकरणमें भगवान् ने नियत कर्मोंके त्यागको अनुचित बताते हुए फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेकी बात कही (गीता १८। ७—९), और सांख्ययोगके प्रकरणमें नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमान, फलेच्छा तथा राग-द्वेषसे रहित होकर करनेकी बात कही (गीता १८। २३)। अब भगवान् यह बताते हैं कि किस वर्णके लिये कौन-से कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय?
मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है, उसके अन्त:करणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पूर्वके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है, उसीके अनुसार उसमें सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता ४।१३)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं, वैसा ही वह कर्म करता है।
पूर्वपक्ष—चौथे अध्यायमें भगवान् ने कहा था कि चारों वर्णोंकी रचना मैंने गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक की है—‘गुणकर्मविभागश:’ (४।१३)। पर यहाँ भगवान् कहते हैं कि चारों वर्णोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं—‘स्वभावप्रभवैर्गुणै:’। इसका सामंजस्य कैसे करेंगे?
उत्तरपक्ष—चौथे अध्यायमें तो चारों वर्णोंके उत्पन्न होनेकी बात कही गयी है और यहाँ चारों वर्णोंके कर्मोंकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह हुआ कि चौथे अध्यायमें भगवान् ने बताया कि चारों वर्णोंका जन्म पूर्वजन्मके गुणोंके अनुसार हुआ है, और यहाँ बताते हैं कि जन्मके बाद चारों वर्णोंके अमुक-अमुक कर्म होने चाहिये, जिनके अनुसार उनकी आगे गति होगी।
(श्लोक-४२)
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
मनका निग्रह करना; इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्म-पालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिकभाव रखना—ये सब-के-सब ही ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
व्याख्या—वर्ण-परम्परा शुद्ध हो तो ये गुण ब्राह्मणमें स्वाभाविक होते हैं। परन्तु वर्ण-परम्परामें अशुद्धि (वर्णसंकरता) आनेपर ये गुण स्वाभाविक नहीं होते, इनमें कमी आ जाती है।
पूर्वश्लोकमें ‘स्वभावप्रभवैर्गुणै:’ कहा, इसलिये यहाँ स्वभावज कर्म बताते हैं। स्वभाव बननेमें जन्म मुख्य है, फिर जन्मके बाद संग मुख्य है। संग, स्वाध्याय, अभ्यास आदिके कारण स्वभाव बदल जाता है।
(श्लोक-४३)
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता तथा युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव—ये सब-के-सब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।
(श्लोक-४४)
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और व्यापार करना—ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।
व्याख्या—गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है, इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। भोजन,विवाह आदि लौकिक व्यवहारमें तो जातिकी प्रधानता है, पर परमात्मप्राप्तिमें भाव और विवेककी प्रधानता है, जाति या वर्णकी नहीं। जैसे सब-के-सब बालक माँकी गोदमें जानेके समान अधिकारी हैं, ऐसे ही भगवान् का अंश होनेसे सब-के-सब जीव भगवत्प्राप्तिके समान अधिकारी हैं। सब-के-सब मनुष्य परमात्मतत्त्वको, मुक्तिको, तत्त्वज्ञानको, भगवत्प्रेमको, भगवद्दर्शनको प्राप्त करनेमें स्वतन्त्र, समर्थ, योग्य और अधिकारी हैं। विदुर, निषादराज गुह, कबीर, रैदास, सदन कसाई आदि अनेक निम्न जातिके मनुष्य भगवान् की भक्तिके कारण ही श्रेष्ठ बने, जाति या वर्णके कारण नहीं। अत: चाहे ब्राह्मणका शरीर हो, चाहे शूद्रका शरीर हो, लोक-व्यवहारमें तो उनमें भेद रहेगा, पर भगवत्प्राप्तिमें कोई भेद नहीं रहेगा। कारण कि भगवत्प्राप्ति शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर होती है। जिससे सम्बन्ध-विच्छेद करना हो, वह चाहे बढ़िया हो या घटिया, उससे क्या मतलब?
गुणोंके तारतम्यसे जिस वर्णमें जन्म होता है, उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म सहज-स्वाभाविक होते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये शम, दम आदि; क्षत्रियके लिये शौर्य, तेज आदि; वैश्यके लिये खेती, गोरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा—ये कर्म स्वत:-स्वाभाविक होते हैं। इन कर्मोंको करनेमें उन्हें परिश्रम नहीं होता। इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक रुचि होती है।
(श्लोक-४५)
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणुु॥
अपने-अपने कर्ममें प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है, उस प्रकारको तू मुझसे सुन।
व्याख्या—अपने वर्णके सिवाय जिसने जो-जो कर्म स्वीकार किये हैं, वे सब भी ‘स्वे स्वे कर्मणि’ के अन्तर्गत लेने चाहिये। जैसे, मनुष्य अपनेको वकील, अध्यापक, चिकित्सक, नौकर आदि मानता है तो उसके कर्तव्यका प्रेमपूर्वक, आदरपूर्वक नि:स्वार्थभावसे भलीभाँति पालन करना भी उसके लिये ‘स्वकर्म’ है।
मनुष्य स्वार्थबुद्धि, पक्षपात, कामना आदिको लेकर कर्म करता है तो वह ‘आसक्ति’ होती है। वह प्रेमपूर्वक, निष्कामभावसे और दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है तो वह ‘अभिरति’ होती है। भगवान् ने कर्मोंमें आसक्तिका निषेध किया है—‘न कर्मस्वनुषज्जते’ (गीता ६।४)। मनुष्य जाति आदिको लेकर न अपनेको ऊँचा समझे, न नीचा समझे, प्रत्युत घड़ीके पुर्जेकी तरह अपनी जगह ठीक कर्तव्यका पालन करे और दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करे तथा अपना अभिमान भी न करे, तब ‘अभिरति’ होगी।
वास्तवमें ‘कर्म’ की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत ‘भाव’ की प्रधानता है। कर्ताका भाव शुद्ध होगा तो वह कल्याण करनेवाला हो जायगा, चाहे कर्ता किसी वर्णका हो। ‘कर्म’ में वर्णकी मुख्यता है और भावमें दैवी अथवा आसुरी सम्पत्तिकी मुख्यता है। अत: दैवी अथवा आसुरी सम्पत्ति किसी वर्णको लेकर नहीं होती, प्रत्युत सबमें हो सकती है। दैवी-सम्पत्ति मोक्ष देनेवाली और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली है। इसलिये यदि ब्राह्मणमें भी अपनी जाति आदिको लेकर अभिमान हो जाय तो वह आसुरी-सम्पत्तिवाला हो जायगा अर्थात् उसका पतन हो जायगा।
(श्लोक-४६)
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रवृत्ति (उत्पत्ति) होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्यमात्र सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—यह संसार भगवान् का प्रथम अवतार है—‘आद्योऽवतार: पुरुष: परस्य’ (श्रीमद्भा० २। ६। ४१)। अत: यह संसार भगवान् की ही मूर्ति है। जैसे मूर्तिमें हम भगवान् का पूजन करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं, चन्दन लगाते हैं तो हमारा भाव मूर्तिमें न होकर भगवान् में होता है अर्थात् हम मूर्तिकी पूजा न करके भगवान् की पूजा करते हैं, ऐसे ही हमें अपनी प्रत्येक क्रियासे संसाररूपमें भगवान् का पूजन करना है। श्रोता सुनकर वक्ताका पूजन करे, वक्ता सुनाकर श्रोताका पूजन करे—इस प्रकार सभी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेका पूजन करें। दृष्टि भगवान् की तरफ ही हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णकी तरफ नहीं। जैसे—ऋषि-मुनि भगवान् श्रीरामको प्रणाम करते हैं तो भगवान् के भावसे प्रणाम करते हैं, क्षत्रियके भावसे नहीं।
पूजनमें मुख्य भाव यह रहना चाहिये कि सब कुछ भगवान् का और भगवान् के लिये ही है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन और दीपकसे सूर्यका पूजन करते हैं, ऐसे ही भगवान् की वस्तुओंसे भगवान् का पूजन करना है। इस प्रकार भगवान् का पूजन करनेसे संसार लुप्त हो जायगा और एकमात्र भगवान् रह जायँगे अर्थात् ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव हो जायगा।
दसवें अध्यायमें भगवान् ने कहा था कि सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर स्थित आत्मा मैं ही हूँ—‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:’ (गीता १०। २०)। अत: भगवद्भावसे हम किसी भी प्राणीकी सेवा, आदर-सत्कार करेंगे तो वह भगवान् की ही सेवा होगी। यदि किसी प्राणीका अनादर-तिरस्कार करेंगे तो वह भगवान् का ही अनादर-तिरस्कार होगा।
साधक यदि जगत् को जगत्-रूपसे देखे तो उसकी ‘सेवा’ करे और भगवद्रूपसे देखे तो उसका ‘पूजन’ करे। अपने लिये कुछ न करे। मात्र कर्म अपने लिये करना बन्धन है, संसारके लिये करना सेवा है और भगवान् के लिये करना पूजन है।
(श्लोक-४७)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
व्याख्या—स्वधर्मरूप कर्मको करनेसे पाप बन तो सकता है, पर लग नहीं सकता; क्योंकि पाप लगनेमें मुख्य कारण भाव है, क्रिया नहीं। पाप क्रियासे नहीं लगता, प्रत्युत भावसे अर्थात् स्वार्थ और अभिमान आनेसे लगता है।
(श्लोक-४८)
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:॥
हे कुन्तीनन्दन! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह (किसी-न-किसी) दोषसे युक्त हैं।
व्याख्या—निषिद्ध कर्ममें आसक्ति होनेसे अथवा निषिद्ध रीतिसे भोग भोगनेके कारण ही विहित कर्म कठिन प्रतीत होता है। वास्तवमें विहित कर्म सहज-स्वाभाविक है। इसमें परिश्रम नहीं है।
इकतालीसवें श्लोकसे यहाँतक ‘स्वकर्म’, ‘स्वधर्म’ और ‘सहज कर्म’ शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् स्वकर्म और सहज कर्मको ही ‘स्वधर्म’ मानते हैं (गीता २।३१)।
विहित कर्म करनेमें कुछ-न-कुछ दोष होता तो है, पर कामना, सुखबुद्धि, भोगबुद्धि न रहनेसे दोष लगता नहीं। तात्पर्य है कि दोष लगना या न लगना कर्ताकी नीयतपर निर्भर है; जैसे—डॉक्टरकी नीयत ठीक हो, पैसोंका उद्देश्य न होकर सेवाका उद्देश्य हो तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसे दोष नहीं लगता, प्रत्युत नि:स्वार्थभाव और रोगीके हितका भाव होनेसे पुण्य होता है।
(श्लोक-४९)
असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह:।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा सर्वश्रेष्ठ नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—असक्तबुद्धि, जितात्मा और विगतस्पृह होनेपर कर्मयोग सिद्ध हो जाता है (गीता २। ७१)। कर्मयोग सिद्ध होनेपर साधक सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है । सांख्ययोगसे वह नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है। नैष्कर्म्यसिद्धिका अर्थ है—कर्म सर्वथा अकर्म हो जायँ, कर्म होते हुए भी लिप्तता न हो। कर्मोंको न करना नैष्कर्म्य नहीं है (गीता ३।४), प्रत्युत कर्म करना तो साधकके लिये आवश्यक है (गीता ६।३)।
कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। अत: कर्मयोग तथा ज्ञानयोगसे तो ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है, पर भक्तियोगसे ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है।
(श्लोक-५०)
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
हे कौन्तेय! सिद्धि (अन्त:करणकी शुद्धि)-को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो।
व्याख्या—यहाँ ‘सिद्धिम्’ पदका अर्थ है—साधनरूप कर्मयोगसे होनेवाली अन्त:करणकी पूर्ण शुद्धि, जिसकी प्राप्तिके बाद कर्मयोगी ज्ञानयोगमें अथवा भक्तियोगमें जा सकता है। कर्मयोगीके भीतर यदि ज्ञानके संस्कार हैं तो वह ज्ञानमें चला जायगा, और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो वह भक्तिमें चला जायगा।
यदि किसी एक साधनका आग्रह न हो तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों साधनरूपसे भी हैं और साध्यरूपसे भी। साधनरूपसे तो तीनों अलग-अलग हैं, पर साध्यरूपसे तीनों एक ही हैं। इसलिये गीतामें भगवान् ने कहीं तो साधन-भक्तिसे साध्य-ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है (गीता १३। १०, १४। २६) और कहीं साधन-ज्ञानसे साध्य-भक्तिकी प्राप्ति बतायी है (गीता १२। ४, १८। ५४)।
भगवान् ने पहले ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:’ (गीता १८। ४६)—इन पदोंसे कर्मयोगके द्वारा भक्तिकी सिद्धि बतायी और यहाँ ‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म’ पदोंसे कर्मयोगके द्वारा ज्ञानयोगकी सिद्धि बताते हैं।
(श्लोक-५१)
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
(श्लोक-५२)
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस:।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित:॥
(श्लोक-५३)
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादिविषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहसे रहित होकर एवं ममतारहित तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
व्याख्या—ज्ञानयोगका साधक जबतक असत् पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता रहता है, तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। जब असत् पदार्थोंके सम्बन्धकी मान्यता मिट जाती है, तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य आ जाती है अर्थात् उसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
(श्लोक-५४)
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
वह ब्रह्मरूप बना हुआ प्रसन्न मनवाला साधक न तो (किसीके लिये) शोक करता है और न (किसीकी) इच्छा ही करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, जो अपने मतका आग्रह नहीं रखता, मुक्तिको ही सर्वोपरि नहीं मानता और भक्तिका खण्डन नहीं करता, उसे मुक्त होनेपर भी सन्तोष नहीं होता। इसलिये मुक्ति प्राप्त होनेके बाद उसे पराभक्ति (परमप्रेम)-की प्राप्ति हो जाती है।
जो अपनी दृष्टि (मान्यता)-से ब्रह्मरूप बना हुआ है, ब्रह्म हुआ नहीं है, उसे यहाँ ‘ब्रह्मभूत’ कहा गया है। ब्रह्मभूत होनेके बाद जीवका ब्रह्मके साथ तात्त्विक सम्बन्ध (साधर्म्य) हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागता:’ (गीता १४। २)। तात्त्विक सम्बन्ध होना ही मुक्ति है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मामें अपने-आपको विलीन (समर्पित) कर देनेसे परमात्माके साथ आत्मीय सम्बन्ध हो जाता है—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ (गीता ७। १८); ‘द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि’ (गीता ४। ३५)। आत्मीय सम्बन्ध होना ही पराभक्तिकी प्राप्ति है।
ज्ञानमार्गमें जड़ताका त्याग मुख्य है। जड़ताका त्याग विवेक-साध्य है। विवेकपूर्वक जड़ताका त्याग करनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार शेष रह सकता है, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं। परन्तु परमप्रेमकी प्राप्ति होनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार नहीं रहता; क्योंकि भक्त जड़ताका त्याग नहीं करता, प्रत्युत उसे भी भगवान् का स्वरूप ही मानता है—‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९। १९)। परम प्रेमकी प्राप्ति विवेक-साध्य नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वास-साध्य है। श्रद्धा-विश्वासमें केवल भगवत्कृपापर ही भरोसा है। इसलिये जिसके भीतर भक्तिके संस्कार होते हैं, उसे भगवत्कृपा मुक्तिमें सन्तुष्ट नहीं होने देती, प्रत्युत मुक्तिके रस (अखण्डरस)-को फीका करके परम प्रेमका रस (अनन्तरस) प्रदान कर देती है।
संसारके सम्बन्धसे अशान्ति होती है, इसलिये कर्मयोगमें संसारसे सम्बन्ध छूटनेपर ‘शान्त आनन्द’ मिलता है। ज्ञानयोगमें निजस्वरूपमें स्थिति होनेसे ‘अखण्ड आनन्द’ मिलता है। भक्तियोगमें भगवान् से अभिन्नता होनेपर ‘अनन्त आनन्द’ मिलता है।
(श्लोक-५५)
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
उस पराभक्तिसे मुझे, मैं जितना हूँ और जो हूँ—इसको तत्त्वसे जान लेता है, फिर मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।
व्याख्या—मैं जितना हूँ और जो हूँ—यह बात सगुण ईश्वरकी ही है; क्योंकि ‘यावान्-तावान्’ सगुणमें ही हो सकता है, निर्गुणमें कदापि नहीं। ‘यावान्यश्चास्मि’ का वर्णन सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:’ पदोंसे कर चुके हैं। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है।
यहाँ ‘भक्त्या मामभिजानाति’ पदोंमें भगवान् को दृढ़तापूर्वक मानना (सन्देहरहित विश्वास) ही उन्हें जानना है।
ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको जब (ज्ञानोत्तरकालमें) भक्ति प्राप्त होती है, तब उसमें तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते)—ये दो ही होते हैं, दर्शन नहीं होते। उनमें कोई कमी तो नहीं रहती, पर दर्शनकी इच्छा उनमें नहीं होती। परन्तु आरम्भसे ही भक्तिमार्गसे चलनेवालेको तत्त्वसे जानने और प्रविष्ट होनेके सिवाय भगवान् के दर्शन भी होते हैं (गीता ११। ५४)। इसलिये ज्ञानमार्गी सन्तोंमें भगवत्प्रेम (भक्ति)-की बात तो आती है, पर दर्शनकी बात नहीं आती।
जैसे विभिन्न मार्गोंसे आनेवाले व्यक्ति द्वारमें प्रविष्ट होनेपर एक साथ मिल जाते हैं, ऐसे ही विभिन्न योग-मार्गोंपर चलनेवाले साधक भगवान् में प्रविष्ट होनेपर (विशते) एक हो जाते हैं अर्थात् अहम् की सूक्ष्म गन्ध भी न रहनेसे उनमें कोई मतभेद नहीं रहता।
(श्लोक-५६)
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान् ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अहंता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है (गीता १८। ५१—५३)। परन्तु भक्तके लिये भगवान् यहाँ बताते हैं कि वह सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है। तात्पर्य है कि भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता। कारण कि वह अपने बल, बुद्धि, योग्यता आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न रखकर केवल भगवान् का ही आश्रय रखता है। फिर भगवत्कृपा ही उसका कल्याण कर देती है।
(श्लोक-५७)
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव॥
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।
व्याख्या—पूर्वश्लोकमें शाश्वत पदकी प्राप्ति बताकर अब उसकी विधि बताते हैं कि वह कैसे प्राप्त होगा? साधकके लिये दो ही मुख्य कार्य हैं—संसारके सम्बन्धका त्याग करना और भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ना। पूर्वश्लोकमें आये ‘मद्व्यापाश्रय:’ पदमें भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़नेकी मुख्यता है और प्रस्तुत श्लोकमें आये ‘बुद्धियोगमुपाश्रित्य’ पदमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी मुख्यता है। एकमात्र भगवान् का चिन्तन करनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वत: समता आ जाती है। भगवान् का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब ‘मैं भगवान् का ही हूँ’— इस प्रकार अहंता भगवान् में हो जायगी। अहंता भगवान् में लग जानेपर चित्त स्वत:-स्वाभाविक भगवान् में लग जाता है।
भगवान् के साथ जीवमात्रका स्वत:सिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध माननेसे ही इस नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। इस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।
(श्लोक-५८)
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान् न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।
व्याख्या—साधकका काम केवल संसारसे विमुख होकर भगवान् के सम्मुख होना है। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ कमी रह जायगी, वह भगवान् की कृपासे दूर हो जायगी। तात्पर्य है कि उस कमीको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती, प्रत्युत उसे दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान् की हो जाती है। भगवान् विशेष कृपा करके उसके साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर देते हैं और अपनी प्राप्ति भी करा देते हैं।
(श्लोक-५९)
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तुझे युद्धमें लगा देगी।
व्याख्या—भगवान् ने कहा कि मेरी कृपासे तू मेरी प्राप्ति भी कर लेगा और सभी विघ्नोंसे भी छूट जायगा। (गीता १८। ५६, ५८)। परन्तु इतना कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं तो भगवान् कहते हैं कि यदि तू भूलसे मेरी बात न सुने तो कोई दोष नहीं, पर तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। भगवान् का भाव है कि जैसे भक्तका सब काम (साधन और सिद्धि) मैं कर देता हूँ, ऐसे ही भक्तको भी चाहिये कि वह सब प्रकारसे मेरा ही आश्रय ले। यदि मेरा आश्रय न लेकर वह अहंकारका आश्रय लेगा तो उसका पतन हो जायगा। कर्तव्य-कर्म (युद्ध)-में एक तो मैं लगाता हूँ और एक प्रकृति लगाती है। यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो तेरी क्षात्र-प्रकृति तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगी, तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा। फिर सब जिम्मेवारी तेरी होगी, मेरी नहीं।
(श्लोक-६०)
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
हे कुन्तीनन्दन! अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जिस युद्धको नहीं करना चाहता, उसको भी तू (क्षात्र-प्रकृतिके) परवश होकर करेगा।
व्याख्या—भगवान् कहते हैं कि चाहे कर्तव्यमात्र समझकर युद्ध कर, चाहे मेरी आज्ञा मानकर युद्ध कर, युद्ध तो तुझे करना ही पड़ेगा। मेरी आज्ञा न माननेसे तेरा अहंकार रहेगा, जिससे विहित कर्म भी बाँधनेवाला हो जायगा। परन्तु मेरी आज्ञा मानकर विहित कर्म करनेसे वह कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा।
जो प्रकृतिके परवश नहीं होता, जिसकी प्रकृति (स्वभाव) महान् शुद्ध होती है, ऐसा ज्ञानी महापुरुष भी जब अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है (गीता ३।३३), फिर प्रकृतिके परवश हुआ तथा अशुद्ध प्रकृतिवाला मनुष्य प्रकृतिके विरुद्ध कर्म कैसे कर सकता है?
(श्लोक-६१)
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
हे अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।
व्याख्या—जो ईश्वर सबका शासक, नियामक, पालक एवं संचालक है, वह अपनी शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है, जिन्होंने शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान रखा है। जैसे कोई रेलगाड़ीपर चढ़ जाता है तो उसे परवशतासे रेलगाड़ीके अनुसार ही जाना पड़ता है, ऐसे ही मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ ‘मैं’ और ‘मेरे’-पनका सम्बन्ध मानता है, तबतक ईश्वर उसे उसके स्वभावके अनुसार जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें घुमाता रहता है। शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध न रहनेपर ईश्वरकी माया उसे संचालित नहीं करती।
(श्लोक-६२)
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परम शान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति)-को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।
व्याख्या—जीव ईश्वरका ही अंश है—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर० ११७।१),‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७)। इसलिये भगवान् ईश्वरकी ही शरणमें जानेकी आज्ञा देते हैं। ईश्वरकी शरण लेनेसे अहंकार नहीं रहता। जबतक जीव ईश्वरके वश (शरण) में नहीं होता, तबतक वह प्रकृतिके वशमें रहता है।
सबके हृदयमें अन्तर्यामी-रूपसे स्थित ईश्वर ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं, और भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके हृदयमें अन्तर्यामी-रूपसे स्थित ईश्वर हैं (गीता ४। ६; ५। २९; ८। ४; ९। २४; १५।१५)।
(श्लोक-६३)
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
यह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
व्याख्या—तू जैसा चाहता है, वैसा कर—इस कथनमें भगवान् की विशेष आत्मीयता, कृपालुता और हितैषिता भरी हुई है। ये वचन भगवान् अर्जुनका त्याग करनेके लिये नहीं कहते हैं, प्रत्युत अपनी तरफ विशेषतासे खींचनेके लिये कहते हैं; जैसे—गेंद फेंकते हैं विशेषतासे पीछे लेनेके लिये, न कि त्याग करनेके लिये। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें अन्तर्यामी निराकार ईश्वरकी शरणागतिकी बात कहकर अब भगवान् अर्जुनको अपनी तरफ अर्थात् सगुण-साकारकी तरफ खींचना चाहते हैं, जिससे अर्जुन समग्रकी प्राप्तिसे वंचित न रह जाय। निराकारमें साकार नहीं आता, पर साकारमें निराकार भी आ जाता है।
(श्लोक-६४)
सर्वगुह्यतमं भूय: शृणु मे परमं वच:।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
सबसे अत्यन्त गोपनीय सर्वोत्कृष्ट वचन तू फिर मुझसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय मित्र है, इसलिये यह (विशेष) हितकी बात मैं तुझे कहूँगा।
व्याख्या—कर्मयोग ‘गुह्य’ है (गीता४।३), अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी शरणागति ‘गुह्यतर’ है (गीता१८।६३), परमात्माके प्रभावकी बात ‘गुह्यतम’ है (गीता ९। १, १५। २०) और साकार परमात्माकी शरणागति ‘सर्वगुह्यतम’ है। यह ‘सर्वगुह्यतमम्’ पद गीतामें एक ही बार यहाँ आया है।
निराकारकी शरणमें जानेसे मुक्ति हो जाती है, पर साकारकी शरणमें जानेसे मुक्तिके साथ-साथ प्रेमकी भी प्राप्ति हो जाती है। भगवान् ने भक्तिके प्रसंगमें ही ‘परम वचन’ कहे हैं (गीता १०।१)।
अर्जुनने भगवान् से कहा था कि मैं आपका शिष्य हूँ—‘शिष्यस्तेऽहम्’ (२। ७), पर भगवान् यहाँ कहते हैं कि तू मेरा प्रिय मित्र है—‘इष्टोऽसि’। तात्पर्य है कि भगवान् अपनेको गुरु न मानकर मित्र ही मानते हैं। भगवान् सबको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं, किसीको अपना शिष्य नहीं बनाते। यह सिद्धान्त है कि जो खुद छोटा होता है, वही दूसरेको छोटा बनाता है। भगवान् सबसे बड़े हैं, इसलिये वे कभी किसीको छोटा नहीं बनाते।
(श्लोक-६५)
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
तू मेरा भक्त हो जा, मुझमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मुझे ही प्राप्त हो जायगा—यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।
व्याख्या—भगवान् का भक्त होना, उनमें मन लगाना, उनका पूजन करना और उन्हें नमस्कार करना—इन चारोंमें एक भी साधन ठीक तरहसे होनेपर शेष तीनों साधन स्वत: उसमें आ जाते हैं। भगवान् का भक्त होनेका तात्पर्य है—‘मैं भगवान् का ही हूँ’ इस प्रकार अपनी अहंताको बदल देना। भगवान् में मन लगानेका तात्पर्य है—भगवान् को अपना मानना। भगवान् का पूजन करनेका तात्पर्य है—सब कार्य पूजाभावसे करना। भगवान् को नमस्कार करनेका तात्पर्य है—अपने-आपको भगवान् के समर्पित करना।
(श्लोक-६६)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
व्याख्या—यहाँ ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ पदका अर्थ ‘सम्पूर्ण धर्मोंका स्वरूपसे त्याग’ नहीं है, प्रत्युत ‘सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग’ है। जैसे, पहले अध्यायमें आया है—‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ (१।३३) तो इसका अर्थ यह नहीं ले सकते कि ‘वे प्राणोंका त्याग करके युद्धमें खड़े हैं’। इसका अर्थ होगा—वे प्राणोंकी आशाका त्याग करके युद्धमें खड़े हैं; क्योंकि प्राणोंका त्याग करके कोई युद्धमें कैसे खड़ा होगा? इसी प्रकार ‘अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता:।’ (१।९)—इसका अर्थ यह नहीं ले सकते कि बहुत-से शूरवीर अपने जीवनका त्याग करके खड़े हैं। इसका अर्थ होगा—वे शूरवीर अपने जीवनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् उनको अपने जीवनका मोह नहीं है। अत: प्रस्तुत श्लोकमें भी ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ पदका अर्थ ‘सब धर्मोंके आश्रयका त्याग’ लेना चाहिये। तात्पर्य है कि भक्तकी दृष्टिमें भगवान् की शरणागतिका जितना महत्त्व है, उतना धर्मों (कर्तव्य-कर्मों)-का नहीं है। धर्म अपने वर्ण-आश्रम आदिको लेकर होता है; अत: उसमें शरीरकी मुख्यता रहती है। परन्तु शरणागति स्वयंको लेकर होती है; अत: उसमें भगवान् की मुख्यता रहती है।
‘मामेकं शरणं व्रज’ का तात्पर्य है कि बाहरसे सबके साथ प्रेम, आदर-सत्कारका व्यवहार करते हुए भी भीतरसे केवल भगवान् का ही आश्रय रहे।
अर्जुन पापोंसे छूटना चाहते थे, इसलिये भगवान् ने भी पापोंसे मुक्त करनेकी बात कही है। वास्तवमें केवल पापोंसे मुक्ति ही शरणागतिका फल नहीं है। पापोंसे मुक्ति मोक्षका फल है। शरणागतिसे मनुष्य मोक्षके साथ-साथ भगवान् के परमप्रेम (अनन्तरस)-को भी प्राप्त कर लेता है! इसलिये भक्तको पापोंसे अथवा दु:खोंसे मुक्ति पानेकी इच्छा न रखकर केवल भगवान् की शरणमें चले जाना चाहिये। कुछ भी चाहनेसे कुछ (सीमित) ही मिलता है, पर कुछ भी न चाहनेसे सब कुछ (असीम) मिलता है! इतना ही नहीं, भगवान् भी शरणागत भक्तके वशमें हो जाते हैं, उसके ऋणी हो जाते हैं।
भगवान् का आश्रय लेना और अपने लिये कुछ न करना ही गीताका तात्पर्य है। इसलिये साधकके लिये सबसे मूल्यवान् वस्तुएँ दो ही हैं—भगवदाश्रय और विश्राम। शरीरादि पदार्थोंका आश्रय ‘पराश्रय’ है और क्रियाका आश्रय ‘परिश्रम’ है। परमात्मप्राप्ति पदार्थ और क्रियाके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत पदार्थ और क्रियाके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। जब साधक पराश्रयका त्याग करके ‘भगवदाश्रय’ को अपनाता है और परिश्रमका त्याग करके ‘विश्राम’ को अपनाता है, तब उसका मानव-जीवन सफल हो जाता है।
शरीरके लिये विश्राम (कुछ न करना) भोग है। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है (गीता १८।३९)। परन्तु परमात्माके लिये विश्राम करना साधन है; क्योंकि परमात्मा परम विश्रामस्वरूप हैं। नित्य परमात्मसत्तामें सदा-सर्वदा निरन्तर स्थित रहना ही परमात्माके लिये विश्राम करना है। परमात्माके लिये होनेवाला विश्राम तामस नहीं होता, प्रत्युत सात्त्विक होकर गुणातीत हो जाता है।
पराश्रय और परिश्रम तो संसारके लिये हैं, पर भगवदाश्रय और विश्राम अपने लिये हैं। यदि किसी साधकका भगवान् पर विश्वास न हो, प्रत्युत अपनेपर विश्वास हो तो वह ‘स्वाश्रय’ को अपना सकता है। यदि साधकका न तो भगवान् पर विश्वास हो, न अपनेपर तो वह ‘धर्म (कर्तव्य-कर्म)-का आश्रय’ अपना सकता है।
मैं भगवान् का ही हूँ, भगवान् ही मेरे हैं—इसको स्वीकार कर लेना ‘भगवान्’ का आश्रय है। मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये—इसको स्वीकार कर लेना ‘स्व’ का आश्रय है। पदार्थ और क्रिया केवल दूसरोंकी सेवाके लिये है—इसको स्वीकार कर लेना ‘धर्म’ का आश्रय है। भगवान् का आश्रय ‘भक्तियोग’ है। स्वका आश्रय ‘ज्ञानयोग’ है। धर्मका आश्रय ‘कर्मयोग’ है। यद्यपि तीनों ही योगमार्गोंसे पदार्थ और क्रियारूप प्रकृतिका आश्रय (बन्धन) और सत्तामात्रमें अपनी स्वत:सिद्ध स्थिति (मोक्ष)-का अनुभव हो जाता है, तथापि इन तीनोंमें भक्तियोग (भगवान् का आश्रय) सर्वश्रेष्ठ है। कारण कि मूलमें हम भगवान् के ही अंश हैं। भगवदाश्रयसे मुक्तिके साथ-साथ भक्ति (परम प्रेम)-की भी प्राप्ति हो जाती है, जो मानव-जीवनका चरम लक्ष्य है।
यह भगवदाश्रय (शरणागति) गीताका सार है, जिसे भगवान् ने विशेष कृपा करके कहा है। भगवदाश्रयमें ही गीताके उपदेशकी पूर्णता होती है। इसके बिना गीता अधूरी रहती है। इसलिये अर्जुनके द्वारा ‘करिष्ये वचनं तव’ कहकर भगवान् का पूर्ण आश्रय स्वीकार करनेपर फिर भगवान् नहीं बोले (१८।७३)।
(श्लोक-६७)
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
यह सर्वगुह्यतम वचन तुझे अतपस्वीको नहीं कहना चाहिये; अभक्तको नहीं कहना चाहिये तथा जो सुनना नहीं चाहता, उसको नहीं कहना चाहिये और जो मुझमें दोषदृष्टि करता है, उसको भी नहीं कहना चाहिये।
व्याख्या—जो सहिष्णु (सहनशील) नहीं है, वह ‘अतपस्वी’ है। जो भक्तिका विरोध अथवा खण्डन करनेवाला है, वह ‘अभक्त’ है। जो अहंकारके कारण सुनना नहीं चाहता, वह ‘अशुश्रूषवे’ है। जो भगवान् में दोषदृष्टि रखता है, वह ‘अभ्यसूयति’ है।
जिसकी भगवान् पर तथा उनके वचनोंपर श्रद्धा नहीं है, जो भगवान् को मनुष्योंकी तरह स्वार्थी तथा अभिमानी समझता है, वह भगवान् पर दोषारोपण करके पतनकी तरफ न चला जाय, इसलिये उसे पूर्वश्लोकमें कहे गये गोपनीय वचनको कहनेका निषेध किया गया है।
(श्लोक-६८)
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥
मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद (गीताग्रन्थ)-को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है।
व्याख्या—जो केवल भगवान् की भक्तिका उद्देश्य रखकर नि:स्वार्थभावसे इस परम गोपनीय गीताको भक्तोंमें सुनाता है, वह भगवान् को प्राप्त होता है। जो भोजन-शयन, शौच-स्नान आदि शारीरिक क्रियाओंको भी भगवान् के अर्पित कर देता है, वह भी भगवान् को प्राप्त हो जाता है (गीता ९।२७-२८); फिर जो केवल भगवद्भक्तिका उद्देश्य रखकर भगवद्वाणी (गीता)-का प्रचार करता है, वह भगवान् को प्राप्त हो जाय, इसमें कहना ही क्या है।
(श्लोक-६९)
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि॥
उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डल-पर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
व्याख्या—जिसका एकमात्र भगवत्प्राप्तिका, भगवत्प्रेमका ही उद्देश्य है, जो गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है, ऐसा साधक ही गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। ऐसा साधक ही भगवान् का अत्यन्त प्रिय कार्य (गीता-प्रचार) करनेवाला है। जो लोगोंको गीतामें लगाता है, उसके समान पृथ्वी-मण्डलपर भगवान् का दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा। कारण कि गीताकी शिक्षासे मनुष्यमात्र प्रत्येक परिस्थितिमें सुगमतासे अपना कल्याण कर सकता है। गीताने युद्ध-जैसी परिस्थितिमें भी कल्याण होनेकी बात कही है (गीता २।३८, ९।२७, १८।४६ आदि)। जब युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है, फिर अन्य परिस्थितिमें कैसे नहीं होगा? इसलिये भगवान् गीताके प्रचारकी विशेष महिमा गाते हैं।
जो मनुष्य भगवान् का अत्यन्त प्रिय हो जाता है, उसे ज्ञान-योग, कर्मयोग और भक्तियोग—तीनों योग प्राप्त हो जाते हैं।
(श्लोक-७०)
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥
जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है।
व्याख्या—भगवान् ज्ञानयज्ञको द्रव्ययज्ञसे भी श्रेष्ठ मानते हैं (गीता ४। ३३)। जो गीताका अध्ययन करता है, उसके द्वारा भगवान् ज्ञानयज्ञसे पूजित होते हैं। जब गीताके अध्ययनमात्रका इतना माहात्म्य है, फिर उसके अनुसार आचरण करनेका कितना माहात्म्य होगा।
(श्लोक-७१)
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर:।
सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य (इस गीताग्रन्थको) सुन भी लेगा, वह भी शरीर छूटनेपर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।
व्याख्या—गीताकी बातोंको जैसा सुन ले, उसे प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसा-का-वैसा माननेवालेका नाम ‘श्रद्धावान्’ है, और उन बातोंमें कहीं भी, किसी भी विषयमें किंचिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम ‘अनसूय:’ है। ऐसा श्रद्धावान् तथा दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले तो वह भी शरीर छूटनेपर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है।
श्रद्धा-भक्तिके तारतम्यसे गीताके सुननेमें तारतम्य रहता है, और सुननेके तारतम्यसे श्रोताका स्वर्गादि लोकोंसे लेकर भगवल्लोकतक अधिकार हो जाता है। तात्पर्य है कि श्रोतामें अधिक श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह भगवान् के परमधामको प्राप्त हो जायगा, और कम श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह ब्रह्मलोकतकके लोकोंको प्राप्त हो जायगा।
(श्लोक-७२)
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
हे पृथानन्दन! क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना? और हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?
(श्लोक-७३)
अर्जुन उवाच
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव॥
अर्जुन बोले—हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
व्याख्या—लौकिक स्मृति तो विस्मृतिकी अपेक्षासे कही जाती है, पर अलौकिक तत्त्वकी स्मृति विस्मृतिकी अपेक्षासे नहीं है, प्रत्युत अनुभवरूप है। इस तत्त्वकी निरपेक्ष स्मृति अर्थात् अनुभवको ही यहाँ ‘स्मृतिर्लब्धा’ कहा गया है।
वास्तवमें तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती, प्रत्युत विमुखता होती है। तात्पर्य है कि पहले ज्ञान था, फिर उसकी विस्मृति हो गयी—इस तरह तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती। यदि ऐसी विस्मृति मानें तो स्मृति होनेके बाद पुन: विस्मृति हो जायगी। इसलिये गीतामें आया है—‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्’ (४।३५) अर्थात् उसे जान लेनेके बाद फिर मोह नहीं होता। अभावरूप असत् को भावरूप मानकर महत्त्व देनेसे तत्त्वकी तरफसे वृत्ति हट गयी—इसीको ‘विस्मृति’ कह देते हैं। वृत्तिका हटना अथवा लगना भी साधककी दृष्टिसे है, तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं। तत्त्वकी दृष्टिसे वृत्ति हटे अथवा लगे, तत्त्व ज्यों-का-त्यों ही रहता है। अभावरूप असत् को अभावरूप ही मान लें तो भावरूप तत्त्व स्वत: ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
जीव अनादिकालसे स्वत: परमात्माका है। उसे केवल संसारके आश्रयका त्याग करना है। अर्जुनको मुख्यरूपसे भक्तियोगकी स्मृति हुई है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। इसलिये भक्तियोगकी स्मृति ही वास्तविक है। भक्तियोगकी स्मृति है—‘वासुदेव:’ (गीता ७।१९)। अत: एक वासुदेवके सिवाय कुछ भी नहीं है—इसका अनुभव होना ही ‘स्मृतिर्लब्धा’ है। यह अनुभव केवल भगवत्कृपासे ही होता है—‘त्वत्प्रसादात्’। वचन सीमित होते हैं, पर कृपा असीम होती है।
चिन्तनमें तो कर्तृत्व होता है, पर स्मृतिमें कर्तृत्व नहीं है। कारण कि चिन्तन मनमें होता है। मनसे परे बुद्धि है, बुद्धिसे परे अहम् है और अहम् से परे स्वरूप है। उस स्वरूपमें स्मृति होती है। स्वरूप कर्तृत्वरहित है। चिन्तन तो हम करते हैं, पर स्मृतिमें केवल दृष्टि उधर जाती है। तत्त्वमें विस्मृति नहीं है, इसलिये दृष्टि उधर जाते ही स्मृति हो जाती है।
‘स्थितोऽस्मि गतसन्देह:’—अर्जुनको पहले क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना ठीक दीखता था। फिर गुरुजनोंके सामने आनेसे युद्ध करना पाप दीखने लगा। परन्तु स्मृति प्राप्त होते ही सब उलझनें मिट गयीं। मैं क्या करूँ? युद्ध करूँ या नहीं करूँ? मेरा कल्याण किसमें है?—यह सन्देह बिलकुल नहीं रहा। अब अर्जुनके लिये कुछ करना शेष नहीं रहा, प्रत्युत केवल भगवान् की आज्ञाका पालन करना ही शेष रहा—‘करिष्ये वचनं तव’। यही शरणागति है।
(श्लोक-७४)
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन:।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
संजय बोले—इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमांचित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना।
व्याख्या—भगवान् का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य-जैसा काम करते हुए अपने-आपको प्रकट कर देना और ‘मेरी शरणमें आ जा’—यह अत्यन्त रहस्यकी बात कह देना—यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाली, प्रसन्न करनेवाली, आनन्द देनेवाली बात है।
गीतामें ‘महात्मा’ शब्द केवल भक्तोंके लिये आया है। यहाँ संजयने अर्जुनको भी ‘महात्मा’ कहा है; क्योंकि वे अर्जुनको भक्त ही मानते हैं। भगवान् ने भी कहा—‘भक्तोऽसि मे’ (गीता ४। ३)।
(श्लोक-७५)
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात् साक्षात्कथयत: स्वयम्॥
व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परमगोपनीय योग (गीताग्रन्थ)-को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।
व्याख्या—भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुननेपर संजयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि मैंने यह संवाद परम्परासे अथवा किसीके द्वारा नहीं सुना है, प्रत्युत इसे मैंने साक्षात् भगवान् के मुखसे सुना है।
(श्लोक-७६)
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु:॥
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद कर-करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
व्याख्या—भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस संवादमें जो तत्त्व भरा हुआ है, वह किसी ग्रन्थ, महात्मा आदिसे सुननेको नहीं मिला। यह भगवान् और उनके भक्तका बड़ा विलक्षण संवाद है। इतनी स्पष्ट बातें दूसरी जगह पढ़ने-सुननेको मिलती नहीं। इस संवादमें युद्ध-जैसे घोर कर्मसे भी कल्याण होनेकी बात कही गयी है। प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें अपना कल्याण कर सकता है—यह बात इस संवादसे मिलती है। इसलिये यह संवाद बड़ा अद्भुत है। केवल संवादमें ही इतनी विलक्षणता है, फिर इसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या है। ज्ञान-कर्म-भक्तिकी ऐसी विलक्षण बातें और जगह सुननेको मिली ही नहीं, इसलिये इनको सुनकर संजय बार-बार हर्षित हो रहे हैं।
(श्लोक-७७)
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे:।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुन: पुन:॥
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको भी याद कर-करके मुझे बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
व्याख्या—भगवान् के विषयमें पहले तो संजयने शास्त्रमें पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट्रूप देखा। तात्पर्य है कि शास्त्रकी अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवादकी अपेक्षा भी विराट्रूप अत्यन्त अद्भुत था।
(श्लोक-७८)
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्-ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है।
व्याख्या—संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले, उन्हें सम्मति देनेवाले, सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान् की आज्ञाका पालन करनेवाले, भगवान् के प्रिय सखा तथा शरणागत भक्त गाण्डीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उसी पक्षमें ही है।
युद्धमें कौन जीतेगा और कौन हारेगा—इसका निर्णय वास्तवमें उसी समय हो गया था, जब अर्जुन और दुर्योधन—दोनों युद्धका निमन्त्रण देने भगवान् श्रीकृष्णके पास पहुँचे थे! अर्जुनने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेनाको छोड़कर नि:शस्त्र भगवान् श्रीकृष्णको स्वीकार किया, और दुर्योधनने भगवान् को छोड़कर उनकी नारायणी सेनाको स्वीकार किया। गीताके अन्तमें संजय भी मानो उसी निर्णयकी ओर संकेत करते हैं। यह सर्वविदित तथ्य है कि जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं, वहीं विजय है—‘यत: कृष्णस्ततो जय:’ (महाभारत भीष्म० ४३।६०, शल्य० ६२।३२)।
ब्रह्मषट्शून्यनेत्राब्दे हेमलम्बाख्यवत्सरे।
नवम्यां चैत्रशुक्लायां रामजन्ममहोत्सवे॥
गीताप्रबोधनीटीकालेखनं पूर्णतामगात्।
यत्कृपातो नमामस्तं गीतागायकमच्युतम्॥
श्रीरामनवमी, वि० सं० २०६१
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥