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ॐ श्रीपरमात्मने नम:

अथ चतुर्दशोऽध्याय:

चौदहवाँ अध्याय

(श्लोक-१)
श्रीभगवानुवाच
परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता:॥

श्रीभगवान् बोले—सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे (मुक्त होकर) परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं।

व्याख्या—क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका ज्ञान सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक ज्ञानोंसे उत्तम तथा सर्वोत्कृष्ट है। यह ज्ञान परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका निश्चित उपाय है, इसलिये इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते अर्थात् मुक्त हो जाते हैं। मुक्त होनेपर क्रिया (परिश्रम) तथा पदार्थ (पराश्रय)-का अत्यन्त अभाव हो जाता है और एक चिन्मय सत्ता (विश्राम)-के सिवाय कोई जड़ वस्तु रहती ही नहीं, जो वास्तवमें है।

(श्लोक-२)
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता:।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥

इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।

व्याख्या—कारणशरीरके सम्बन्धसे ‘निर्विकल्प स्थिति’ होती है और कारणशरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर (स्वयंमें) ‘निर्विकल्प बोध’ होता है। निर्विकल्प स्थिति तो सविकल्पमें बदल सकती है, पर निर्विकल्प बोध सविकल्पमें कभी नहीं बदलता। तात्पर्य है कि निर्विकल्प स्थितिमें तो परिवर्तन होता है, पर निर्विकल्प बोधमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह महासर्ग अथवा महाप्रलय होनेपर भी सदा ज्यों-का-त्यों रहता है।

महासर्ग और महाप्रलय प्रकृतिमें होते हैं। प्रकृतिसे अतीत तत्त्व (परमात्मा)-की प्राप्ति होनेपर महासर्ग और महाप्रलयका कोई असर नहीं पड़ता; क्योंकि ज्ञानी महापुरुषका प्रकृतिसे सम्बन्ध ही नहीं रहता। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेको ‘आत्यन्तिक प्रलय’ भी कहा गया है। तात्पर्य है कि प्रकृतिके कार्य शरीरको पकड़नेसे मनुष्य परतन्त्र हो जाता है, जन्म-मरणमें पड़ जाता है; परन्तु शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर वह स्वतन्त्र हो जाता है, निरपेक्ष-जीवन हो जाता है, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है। वह परमात्माकी सधर्मताको प्राप्त हो जाता है अर्थात् जैसे परमात्मा सत्-चित्-आनन्दरूप हैं, ऐसे ही वह ज्ञानी महापुरुष भी सत्-चित्-आनन्दरूप हो जाता है, जो कि वास्तवमें वह पहलेसे ही था!

(श्लोक-३)
मम योनिर्महद्‍ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भका स्थापन करता हूँ। उससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है।

व्याख्या—जीव जबतक मुक्त नहीं होता, तबतक प्रकृतिके अंश कारणशरीरसे उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलयमें कारणशरीरसहित ही प्रकृतिमें लीन होता है। जब उस जीवके कर्म परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब महासर्गके आदिमें भगवान् उसका प्रकृतिके साथ पुन: विशेष सम्बन्ध स्थापित कर देते हैं।

(श्लोक-४)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनि‍रहं बीजप्रद: पिता॥

हे कुन्तीनन्दन! सम्पूर्ण योनियोंमें (प्राणियोंके) जितने शरीर पैदा होते हैं, मूल प्रकृति तो उन सबकी माता है और मैं बीज-स्थापन करनेवाला पिता हूँ।

व्याख्या—चौरासी लाख योनियाँ, देवता, पितर, गन्धर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, स्थावर-जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज आदि सम्पूर्ण योनियोंके जितने भी मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त शरीर हैं, उन सबमें भगवान् अपने चेतन-अंशरूप बीजको स्थापित करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणीमें स्थित परमात्माका अंश शरीरोंकी भिन्नतासे ही भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक ही परमात्मतत्त्व विद्यमान है (गीता १३।२)।

(श्लोक-५)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥

हे महाबाहो! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अविनाशी देही (जीवात्मा)-को देहमें बाँध देते हैं।

व्याख्या—प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति-विभागमें ही हैं। परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीरसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण ये गुण अविनाशी चेतनको नाशवान्, जड़ शरीरमें बाँध देते हैं अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ, शरीर मेरा है’—ऐसा देहाभिमान उत्पन्न कर देते हैं। तात्पर्य है कि सभी विकार प्रकृतिके सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। चिन्मय सत्तामात्र स्वरूपमें कोई भी विकार नहीं है—‘असङ्गो ह्ययं पुरुष:’ (बृहदारण्यक० ४।३।१५), ‘देहेऽस्मिन्पुरुष: पर:’ (गीता १३।२२)। विकारोंके कारण ही जन्म-मरण होता है।

वास्तवमें गुण जीवको नहीं बाँधते, प्रत्युत जीव ही उनका संग करके बँध जाता है। अगर गुण बाँधनेवाले होते तो गुणोंके रहते हुए कोई उनसे छूट सकता ही नहीं, गुणातीत (जीवन्मुक्त) हो सकता ही नहीं!

(श्लोक-६)
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वा‍त् प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥

हे पापरहित अर्जुन! उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुखकी आसक्तिसे और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है।

व्याख्या—गुणातीत होनेके बहुत समीप होनेके कारण सत्त्वगुणको अनामय (निर्विकार) कहा गया है। परन्तु सुख और ज्ञानके संगके कारण वह विकारी हो जाता है; क्योंकि संग रजोगुणका स्वरूप है। सुख और ज्ञान बाधक नहीं हैं, प्रत्युत उनका संग बाधक है। संग है—उनको अपना मान लेना। वास्तवमें सत्त्वगुण अपना है ही नहीं, वह तो प्रकृतिका है। अत: जबतक संग रहता है, तबतक मुक्ति नहीं होती; क्योंकि स्वरूप असंग है।

सात्त्विक सुख और सात्त्विक ज्ञान भी स्वयंके नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृतिजन्य होनेसे ‘पर’ के अर्थात् पराधीन हैं। इनमें पराधीनताका सुख है, स्वरूपका सुख नहीं।

सात्त्विक ज्ञानमें तो ‘मैं ज्ञानी हूँ’—यह संग रहता है, पर तत्त्वज्ञान सर्वथा असंग है अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेपर ‘मैं ज्ञानी हूँ’—यह संग नहीं रहता। सात्त्विक ज्ञानमें द्रष्टा रहता है और अपनेमें विशेषताका भान होता है, परन्तु तत्त्वज्ञानमें कोई द्रष्टा नहीं रहता और अपनेमें कोई कमी भी नहीं रहती तथा (व्यक्तित्व न रहनेसे) विशेषताका भान भी नहीं होता।

(श्लोक-७)
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥

हे कुन्तीनन्दन! तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो। वह कर्मोंकी आसक्तिसे देही (जीवात्मा)-को बाँधता है।

व्याख्या—रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात् किसी वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो प्रियता उत्पन्न होती है, वह प्रियता रजोगुण है। रजोगुण कर्मोंके संग (आसक्ति)-से मनुष्यको बाँधता है। अत: सात्त्विक कर्म भी संग होनेसे बाँधनेवाले हो जाते हैं। यदि संग न हो तो कर्म बन्धनकारक नहीं होते। इसलिये कर्मयोगसे मुक्ति हो जाती है; क्योंकि कर्मोंका और उनके फलोंका संग न होनेसे ही कर्मयोग होता है (गीता ६।४)।

(श्लोक-८)
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि‍स्-तन्निबध्नाति भारत॥

और हे भरतवंशी अर्जुन! सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा (देहके साथ अपना सम्बन्ध माननेवालोंको) बाँधता है।

व्याख्या—सत्त्वगुण और रजोगुण तो संग (सुखासक्ति)-से बाँधते हैं, पर तमोगुण स्वरूपसे ही बाँधनेवाला है। ये तीनों गुण प्रकृतिके कार्य हैं और जीव स्वयं प्रकृति और उसके कार्य गुणोंसे सर्वथा रहित है। परन्तु गुणोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण स्वयं गुणातीत होते हुए भी गुणोंसे बँध जाता है।

(श्लोक-९)
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रज: कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे सञ्जयत्युत॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है।

व्याख्या—सत्त्वगुण केवल सुख होनेपर विजय नहीं करता, प्रत्युत सुखका संग होनेपर विजय करता है—‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४।६)। इसी तरह रजोगुण भी कर्मका संग होनेपर विजय करता है—‘तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्’ (गीता १४।७)। परन्तु तमोगुण स्वरूपसे ही विजय करता है। इसलिये तमोगुणमें ‘संग’ शब्द नहीं आया है।

(श्लोक-१०)
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रज: सत्त्वं तमश्चैव तम: सत्त्वं रजस्तथा॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, सत्त्वगुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

व्याख्या—दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्यको बाँध देता है। जो गुण बढ़ता है, उसकी मुख्यता हो जाती है और दूसरे गुणोंकी गौणता हो जाती है। यह गुणोंका स्वभाव है।

(श्लोक-११)
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मि‍न् प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्या‍द् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥

जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्त:करण)-में प्रकाश (स्वच्छता) और विवेक प्रकट हो जाता है, तब यह जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

व्याख्या—‘प्रकाश’ और ‘ज्ञान’—दोनोंमें भेद है। ‘प्रकाश’ का अर्थ है—इन्द्रियों और अन्त:करणमें जागृति अर्थात् रजोगुणसे होनेवाला मनोराज्य तथा तमोगुणसे होनेवाले निद्रा, आलस्य और प्रमाद न होकर स्वच्छता होना। ‘ज्ञान’ का अर्थ है—विवेक अर्थात् सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका ज्ञान होना। प्रकाश और ज्ञान आनेपर साधक उनको अपना गुण मानकर अभिमान न करे, प्रत्युत उनको सत्त्वगुणका ही कार्य माने और विशेषरूपसे भजन-ध्यान आदिमें लग जाय। कारण कि ऐसे समयमें किये गये साधनसे अधिक लाभ हो सकता है।

(श्लोक-१२)
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा—ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

व्याख्या—जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं। अत: ऐसे समय साधकको यह विचार करना चाहिये कि जब अनन्त ब्रह्माण्डोंमें लेशमात्र भी कोई वस्तु अपनी नहीं है, सब वस्तुएँ मिलने-बिछुड़नेवाली हैं, फिर अपने लिये क्या चाहिये? ऐसा विचार करके रजोगुणकी वृत्तियोंको मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय।

रजोगुण असंगताका विरोधी है—‘रजो रागात्मकं विद्धि’ (गीता १४।७)। मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता ६।४)। परन्तु क्रिया और पदार्थका संग करनेके कारण रजोगुण मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता।

(श्लोक-१३)
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥

हे कुरुनन्दन! तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह—ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

व्याख्या—भगवान् पूर्वोक्त तीन श्लोकोंमें क्रमश: सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी वृद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके साधकको सावधान करते हैं कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही गुणोंमें होनेवाली वृत्तियाँ उसे अपनेमें प्रतीत होती हैं। वास्तवमें साधकका इन वृत्तियोंके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण तथा गुणोंकी वृत्तियाँ प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील हैं और स्वयं परमात्माका अंश होनेसे अपरिवर्तनशील है। परिवर्तनशीलके साथ अपरिवर्तनशीलका सम्बन्ध कैसे हो सकता है?

(श्लोक-१४)
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोका‍नमलान्प्रतिपद्यते॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है तो वह उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है।

व्याख्या—गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मोंके समान ही श्रेष्ठ है। तात्पर्य यह हुआ कि शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है, पुण्यकर्मका नहीं। पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य—ये चारों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।

यदि उत्तमवेत्ता (विवेकवान्) मनुष्य सत्त्वगुणको अपना मानते हुए उसमें रमण न करे और भगवान् के सम्मुख रहे तो वह सत्त्वगुणसे भी असंग (गुणातीत) होकर भगवान् के परमधामको चला जायगा, अन्यथा सत्त्वगुणका सम्बन्ध रहनेपर वह ब्रह्मलोक-तकके ऊँचे लोकोंतक ही जायगा।

(श्लोक-१५)
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥

रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़ योनियोंमें जन्म लेता है।

व्याख्या—जिसने जीवनभर अच्छे कर्म किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकालमें रजोगुणके बढ़नेपर मर जाता है तो मनुष्ययोनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण, भाव अच्छे रहेंगे। इसी प्रकार अच्छे कर्म करनेवाला यदि अन्तकालमें तमोगुणके बढ़नेपर मर जाता है तो पशु, पक्षी आदि मूढ़योनिमें जन्म लेनेपर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे।

रजोगुणमें ‘राग’-अंश ही जन्म-मरण देनेवाला है, ‘क्रिया’- अंश नहीं। पदार्थ, क्रिया अथवा व्यक्ति, किसीमें भी राग हो जायगा तो वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेगा। मनुष्य स्वाभाविक कर्मसंगी है; क्योंकि नये कर्म करनेका अधिकार मनुष्ययोनिमें ही है।

(श्लोक-१६)
कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दु:ख‍‍‍मज्ञानं तमस: फलम्॥

विवेकी पुरुषोंने शुभ कर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दु:ख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

व्याख्या—वास्तवमें कर्म सात्त्विक-राजस-तामस नहीं होते, प्रत्युत कर्ता ही सात्त्विक-राजस-तामस होता है। जैसा कर्ता होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं। जैसे कर्म होते हैं, वैसा ही भाव दृढ़ होता है। जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही अन्तकालीन चिन्तन होता है। अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार ही गति होती है (गीता ८। ६)।

(श्लोक-१७)
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं। तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।

व्याख्या—ज्ञान (विवेक) सत्त्वगुणसे प्रकट होता है और संग न करनेपर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। परन्तु रजोगुण-तमोगुणसे होनेवाले लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते हैं तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दु:ख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़योनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता!

(श्लोक-१८)
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:॥

सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित तामस मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।

व्याख्या—सात्त्विक, राजस अथवा तामस मनुष्यकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार होगी, पर सुख-दु:खका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। उदाहरणार्थ, किसीके कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन पशुका हो गया तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह पशु बन जायगा, परन्तु उस पशुयोनिमें भी उसे कर्मोंके अनुसार बहुत सुख-आराम मिलेगा। इसी प्रकार किसीके कर्म तो बुरे हैं, पर अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह मनुष्य बन गया तो उस मनुष्ययोनिमें भी उसे कर्मोंके अनुसार दु:ख, शोक, रोग आदि मिलेंगे।

आधुनिक वेदान्तमें आया है कि सत्त्वगुणसे पुण्य तथा रजोगुणसे पाप उत्पन्न होता है; किन्तु तमोगुणसे आयु वृथा होती है—

सात्त्विकै: पुण्यनिष्पत्ति: पापोत्पत्तिश्च राजसै:।
तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायु:क्षपणं भवेत्॥
(पंचदशी २।१५)

परन्तु यह बात गीतासे विरुद्ध पड़ती है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि तमोगुणसे मनुष्यको अधोगतिकी प्राप्ति होती है—‘अधो गच्छन्ति तामसा:’। पहले भी भगवान् ने कहा है—‘तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते’ (१४।१५)।

(श्लोक-१९)
नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥

जब विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे सत्स्वरूपको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—सम्पूर्ण क्रियाओंके होनेमें गुण ही कारण हैं, अन्य कोई कारण नहीं है। विवेकशील साधक जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशकमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव करता है अर्थात् अपनेको गुणों (क्रियाओं और पदार्थों)-से असंग अनुभव करता है। गुणोंसे असंग अनुभव करनेपर वह योगारूढ़ हो जाता है (गीता ६।४)। योगारूढ़ होनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है और उस शान्तिमें न अटकनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।

(श्लोक-२०)
गुणानेतानतीत्य त्री‍न् देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादु:खै‍र्-विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दु:खोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है।

व्याख्या—मनुष्यमात्रके भीतर यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं। वह अमर रहना चाहता है। अमरताकी इस इच्छासे सिद्ध होता है कि वास्तवमें वह अमर है। यदि वह अमर न होता तो उसमें अमरताकी इच्छा भी नहीं होती। उदाहरणार्थ, हमें भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे भूख और प्यास मिट जाती है। यदि अन्न-जल न होते तो भूख-प्यास भी नहीं लगती। अत: अमरता स्वत:सिद्ध है (गीता ८।१९)। परन्तु जब मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है अर्थात् ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है, तब उसमें मृत्युका भय और अमरताकी इच्छा पैदा हो जाती है। जब वह अपने विवेकको महत्त्व देता है कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर तो निरन्तर मृत्युमें रहता है और मैं स्वयं निरन्तर अमरतामें रहता हूँ’ तब उसे अपनी स्वत:सिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है। अत: साधकको चाहिये कि वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था आदि शरीरके विकारोंको मुख्यता न देकर अपनी चिन्मय सत्ता (होनेपन)-को ही मुख्यता दे।

(श्लोक-२१)
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेता‍नतीतो भवति प्रभो।
किमाचार: कथं चैतां‍स्-त्रीन्गुणानतिवर्तते॥

अर्जुन बोले—हे प्रभो! इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?

(श्लोक-२२)
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥

श्रीभगवान् बोले—हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह—ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।

व्याख्या—वृत्तियाँ एक समान किसीकी भी नहीं रहतीं। तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुषके अन्त:करणमें भी होती हैं,पर उसका उन वृत्तियोंसे राग-द्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ अपने-आप आती और चली जाती हैं। गुणातीत महापुरुषकी दृष्टि उधर जाती ही नहीं; क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय और कुछ रहता ही नहीं।

गुणातीत महापुरुषमें ‘अनुकूलता बनी रहे, प्रतिकूलता मिट जाय’—ऐसी इच्छा नहीं होती। निर्विकारताका अनुभव होनेपर उसे अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान तो होता है, पर स्वयंपर उनका असर नहीं पड़ता। अन्त:करणमें वृत्तियाँ बदलती हैं, पर स्वयं उनसे निर्लिप्त रहता है। साधकपर भी वृत्तियोंका असर नहीं पड़ना चाहिये; क्योंकि गुणातीत मनुष्य साधकका आदर्श होता है, साधक उसका अनुयायी होता है।

साधकमात्रके लिये यह आवश्यक है कि वह शरीरका धर्म अपनेमें न माने। वृत्तियाँ अन्त:करणमें हैं, अपनेमें नहीं। अत: साधक वृत्तियोंको न तो अच्छा माने, न बुरा माने और न अपनेमें ही माने। कारण कि वृत्तियाँ तो आने-जानेवाली हैं, पर स्वयं निरन्तर रहनेवाला है। वृत्तियाँ हममें नहीं होतीं, प्रत्युत अन्त:करणमें ही होती हैं। यदि वृत्तियाँ हममें होतीं तो जबतक हम रहते, तबतक वृत्तियाँ भी रहतीं। परन्तु यह सबका अनुभव है कि हम तो निरन्तर रहते हैं, पर वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं। वृत्तियोंका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ है और हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध परमात्माके साथ है। इसलिये वृत्तियोंके परिवर्तनका अनुभव करनेवाला स्वयं एक ही रहता है।

(श्लोक-२३)
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥

जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—इस भावसे जो (अपने स्वरूपमें ही) स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।

व्याख्या—तीन विभाग हैं—‘करना’, ‘होना’ और ‘है’। ‘करना’ होनेमें और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्त:करणमें क्रिया और पदार्थका महत्त्व है, ऐसा संसारी मनुष्य मानता है कि मैं क्रिया कर रहा हूँ—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। जो कर्ता बनता है, उसे भोक्ता बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेककी प्रधानता है, ऐसा साधक तो अनुभव करता है कि क्रिया हो रही है— गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८) अर्थात् मैं कुछ भी नहीं करता हूँ—‘नैव किञ्चित्करोमीति’ (गीता ५।८)। परन्तु जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा गुणातीत महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’)-का ही अनुभव करता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओंमें ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओंका तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुषकी दृष्टि क्रियाओंपर न रहकर स्वत: एकमात्र चिन्मय सत्ता (‘है’)-पर ही रहती है।

(श्लोक-२४)
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर‍‍‍स्-तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:॥
(श्लोक-२५)
मानापमानयोस्तुल्य‍‍‍स्-तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते॥

जो धीर मनुष्य दु:ख-सुखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है; जो प्रिय-अप्रियमें सम रहता है; जो अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें सम रहता है; जो मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है और जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

व्याख्या—यहाँ भगवान् ने सुख:-दु:ख, प्रिय-अप्रिय, निन्दा-स्तुति और मान-अपमान—ये आठ परस्पर-विरुद्ध नाम लिये हैं, जिनमें साधारण मनुष्योंकी तो विषमता हो ही जाती है, साधकोंकी भी कभी-कभी विषमता हो जाती है। इन आठ कठिन स्थलोंमें जिसकी समता हो जाती है, उसके लिये अन्य सभी अवस्थाओंमें समता रखना सुगम हो जाता है। गुणातीत महापुरुषकी इन आठों स्थलोंमें स्वत:-स्वाभाविक समता रहती है।

(श्लोक-२६)
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैता‍न् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

व्याख्या—भक्तिसे साधक जो भी चाहता है, उसीकी प्राप्ति हो जाती है। जो साधक मुख्यरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् मुक्ति, तत्त्वज्ञान चाहता है, उसे भक्तिसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि ब्रह्मकी प्रतिष्ठा भगवान् ही हैं (गीता १४।२७)। ब्रह्म समग्र भगवान् का ही एक अंग (स्वरूप) है (गीता ७।२९-३०)। तेरहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भक्तिको ज्ञानप्राप्तिका साधन बताया गया है।

श्रीमद्भागवतमहापुराणमें सगुणकी उपासनाको निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे अतीत) बताया गया है; जैसे—‘मन्निकेतं तु निर्गुणम्’ (११।२५।२५) ‘मत्सेवायां तु निर्गुणा’ (११।२५।२७) आदि। इसलिये सगुणोपासक भक्त तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है।

सगुण भगवान् भी गुणोंके आश्रित नहीं हैं, प्रत्युत गुण उनके आश्रित हैं। जो सत्त्व-रज-तम गुणोंके वशमें है, उसका नाम ‘सगुण’ नहीं है, प्रत्युत जिसमें असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि अनन्त दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम ‘सगुण’ है। भगवान् के द्वारा सात्त्विक, राजस अथवा तामस क्रियाएँ तो हो सकती हैं, पर वे उन गुणोंके वशमें नहीं होते।

भगवान् की तरफ चलनेसे भक्त स्वत: और सुगमतासे गुणातीत हो जाता है। इतना ही नहीं, उसे भगवान् के समग्र रूपका भी ज्ञान हो जाता है और प्रेम भी प्राप्त हो जाता है।

(श्लोक-२७)
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाह‍‍‍ममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥

क्योंकि ब्रह्मका और अविनाशी अमृतका तथा शाश्वत धर्मका और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।

व्याख्या—‘ब्रह्म तथा अविनाशी अमृतका आश्रय मैं हूँ’—यह निर्गुण-निराकारकी तथा ‘ज्ञानयोग’ की बात है। ‘शाश्वत धर्मका आश्रय मैं हूँ’—यह सगुण-साकारकी तथा ‘कर्मयोग’ की बात है। ‘ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं हूँ’—यह सगुण-निराकारकी तथा ‘ध्यानयोग’ की बात है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरी (सगुण-साकारकी) उपासना करनेसे, मेरा आश्रय लेनेसे भक्तको ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग—तीनोंकी सिद्धि हो जाती है। कारण कि समग्र भगवान् के एक अंशमें सब कुछ विद्यमान है (गीता १०।४२)। भगवान् ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग आदि सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:॥ १४॥

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