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ॐ श्रीपरमात्मने नम:

अथ पञ्चदशोऽध्याय:

पन्द्रहवाँ अध्याय

(श्लोक-१)
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमध:शाख‍‍‍मश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

श्रीभगवान् बोले—ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको (प्रवाहरूपसे) अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार-वृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।

व्याख्या—परिवर्तनशील होनेपर भी संसारको ‘अव्यय’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें निरन्तर परिवर्तन होनेपर भी कुछ व्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् अन्त नहीं होता। जैसे समुद्रके ऊपर कितनी लहरें उठती दीखती हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर उसका जल उतना ही रहता है, घटता-बढ़ता नहीं। ऐसे ही निरन्तर परिवर्तन दीखनेपर भी संसार अव्यय ही रहता है।

परिवर्तनशील संसार भी परमात्माकी शक्ति ‘अपरा प्रकृति’ का कार्य होनेसे परमात्माका ही स्वरूप है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता९।१९)। परिवर्तनरूप अपरा प्रकृति भी परमात्माका स्वरूप है। यह संसार उस परमात्माकी ही लहरें हैं। जैसे ऊपरसे लहरें दीखनेपर भी समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं है, भीतरसे समुद्र सम-शान्त है, ऐसे ही ऊपरसे संसार परिवर्तनशील दीखते हुए भी भीतरसे एक सम, शान्त परमात्मतत्त्व है (गीता १३।२७)। तात्पर्य यह हुआ कि संसार संसाररूपसे अव्यय नहीं है, प्रत्युत भगवद्‍रूपसे अव्यय है।

(श्लोक-२)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्र‍‍‍वृद्धा विषयप्रवाला:।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥

उस संसार-वृक्षकी गुणों (सत्त्व, रज और तम)-के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, (मध्यमें) और ऊपर (सब जगह)फैली हुई हैं। मनुष्यलोकमें कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाले मूल भी नीचे और ऊपर (सभी लोकोंमें) व्याप्त हो रहे हैं।

व्याख्या—प्रथम श्लोकमें आये ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदका तात्पर्य है—परमात्मा, जो संसारके रचयिता तथा उसके मूल आधार हैं; और यहाँ ‘मूलानि’ पदका तात्पर्य है—तादात्म्य,ममता और कामनारूप मूल,जो संसारमें मनुष्यको बाँधते हैं। साधकको इन मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माका आश्रय लेना है।

(श्लोक-३)
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥

इस संसार-वृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थ-वृक्षको दृढ़ असंगतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर—

व्याख्या—भगवान् आदिमें भी हैं, अन्तमें भी हैं और मध्यमें भी हैं (गीता १०।२०,३२); परन्तु संसार न आदिमें है, न अन्तमें है और न मध्यमें ही है अर्थात् संसारकी सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता २।१६)। अत: एक भगवान् के सिवाय कुछ भी नहीं है।

इस श्लोकमें आये ‘छित्त्वा’ पदका तात्पर्य काटना अथवा नाश (अभाव) करना नहीं है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद करना है। कारण कि यह संसार-वृक्ष भगवान् की अपरा प्रकृति होनेसे अव्यय है।

संसार रागके कारण ही दीखता है। जिस वस्तुमें राग होता है, उसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता दीखती है। यदि राग न रहे तो नेत्रोंसे संसारकी सत्ता दीखते हुए भी महत्ता नहीं रहती। अत: ‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ पदोंका तात्पर्य है—संसारके रागको सर्वथा मिटा देना अर्थात् अपने अन्त:करणमें एक परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध न मानना, सृष्टिमात्रकी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानना। वास्तवमें संसारकी सत्ता बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत उससे रागपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनकारक है। सत्ता बाधक नहीं है, महत्ता बाधक है। हम जिस वस्तुको महत्ता देते हैं, वही बाँधनेवाली हो जाती है। महत्ता हमारी दी हुई है, उसमें है नहीं। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर संसारका संसाररूपसे अभाव हो जाता है और वह भगवद्‍रूपसे दीखने लगता है—‘वासुदेव: सर्वम्’।

(श्लोक-४)
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय:।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी॥

उसके बाद उस परमपद (परमात्मा)-की खोज करनी चाहिये। जिसको प्राप्त हुए मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदि पुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ।

व्याख्या—संसार नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है—‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ और परमात्मा नित्यप्राप्त हैं, इसलिये उनकी खोज होती है—‘तत: पदं तत्परिमार्गितव्यम्’। निर्माण और खोज—दोनोंमें बहुत अन्तर है। निर्माण उस वस्तुका होता है,जिसका पहलेसे अभाव है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो पहलेसे ही विद्यमान है। परमात्मा नित्यप्राप्त और स्वत:सिद्ध हैं, इसलिये उनकी खोज होती है, निर्माण नहीं होता। जब साधक परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है। खोज करनेके दो प्रकार हैं—एक तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जाय तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो पर न दीखनेसे यह वहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम उसकी खोज करते हैं। परमात्मा गलेमें पड़ी कण्ठीकी खोजके समान हैं। तात्पर्य है कि वास्तवमें परमात्मा खोये नहीं हैं, पर संसारकी ओर दृष्टि (सम्मुखता) रहनेसे हमारी दृष्टि परमात्माकी ओर नहीं जाती। उधर दृष्टि न जाना ही उसका खोना है।

परमात्मा कभी अप्राप्त हुए ही नहीं, अप्राप्त हैं ही नहीं, अप्राप्त हो सकते ही नहीं। उनकी अप्राप्ति नहीं हुई है, प्रत्युत विस्मृति हुई है, उनसे विमुखता हुई है, उनकी अप्राप्तिका वहम हुआ है। परमात्माकी खोज करनेका उपाय है—अप्राप्त संसारका त्याग करना अर्थात् उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना, उसे अस्वीकार करना। अत: संसारके त्यागमें ही परमात्माकी खोज निहित है—‘अतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त:’ (श्रीमद्भा०१०।१४।२८)।

संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधक मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर संसारकी कामना तो मिट जाती है, पर प्रेमकी भूख नहीं मिटती। ब्रह्मसूत्रमें आया है—‘मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्’(१।३।२) ‘उस प्रेमस्वरूप भगवान् को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है’। तात्पर्य है कि स्वरूप जिसका अंश है, उस अंशी (परमात्मा)-के प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है। अंश (स्वरूप)-में निजानन्द (अखण्ड आनन्द) है और अंशीेमें परमानन्द (अनन्त आनन्द) है। जो मुक्तिमें नहीं अटकता, उसमें सन्तोष नहीं करता, उसे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम (अनन्त आनन्द)-की प्राप्ति होती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८।५४)। इसीलिये प्रस्तुत श्लोकमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करने अर्थात् मुक्त होनेके बाद परमात्माकी खोज करके उनकी शरण ग्रहण करनेकी बात कही गयी है।

(श्लोक-५)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसञ्ज्ञैर्-
गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत्॥

जो (अपनी दृष्टिसे) मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं, जो सुख-दु:ख नामवाले द्वन्द्वोंसे मुक्त हो गये हैं, (ऐसे ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद (परमात्मा)-को प्राप्त होते हैं।

व्याख्या—जिस परमात्माको इसी अध्यायके प्रथम श्लोकमें ‘ऊर्ध्वमूलम्’ पदसे कहा गया तथा जिस परमपदरूपी परमात्माकी खोज करनेके लिये चौथे श्लोकमें प्रेरणा की गयी और आगे छठे श्लोकमें जिसकी महिमाका वर्णन किया गया है, उसी परमात्मस्वरूप परमपदको यहाँ ‘अव्ययम् पदम्’ कहा गया है। जो ऊँची स्थितिके साधक भक्त मान, मोह, ममता आदि दोषोंसे सर्वथा रहित हो जाते हैं, वे उस अविनाशी परमपदको अवश्य प्राप्त होते हैं, जिसे प्राप्त होनेपर जीव लौटकर नाशवान् संसारमें नहीं आता।

(श्लोक-६)
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥

उस परमपदको न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

व्याख्या—यह छठा श्लोक पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेवाला है। इन श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि वह अविनाशी पद मेरा ही धाम है, जो मुझसे अभिन्न है और जीव भी मेरा सनातन अंश होनेके कारण मुझसे अभिन्न है। अत: भगवान् का जो धाम है, वही हमारा धाम है। इसी कारण उस धामकी प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता। जबतक हम अपने उस धाममें नहीं जायँगे, तबतक हम मुसाफिरकी तरह अनेक योनियोंमें तथा अनेक लोकोंमें घूमते ही रहेंगे, कहीं भी ठहर नहीं सकेंगे। यदि हम ऊँचे-से-ऊँचे ब्रह्मलोकमें भी चले जायँ तो वहाँसे भी लौटकर आना पड़ेगा (गीता ८।१६)। कारण कि यह सम्पूर्ण संसार (मात्र ब्रह्माण्ड) परदेश है, स्वदेश नहीं। यह पराया घर है, अपना घर नहीं। विभिन्न योनियों और लोकोंमें हमारा भटकना तभी बन्द होगा, जब हम अपने असली घरमें पहुँच जायँगे।

परमपदको न तो आधिभौतिक प्रकाश (सूर्य, चन्द्र आदि) प्रकाशित कर सकता है, न आधिदैविक प्रकाश (नेत्र, मन, बुद्धि, वाणी आदि) ही प्रकाशित कर सकता है। कारण कि यह स्वयंप्रकाश है। इसमें प्रकाश्य-प्रकाशकका भेद नहीं है।

(श्लोक-७)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा (स्वयं)मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

व्याख्या—प्रस्तुत श्लोकमें ‘ममैवांश:’ पदमें ‘एव’ कहनेका तात्पर्य है कि जीव केवल भगवान् का ही अंश है, इसमें प्रकृतिका अंश किंचिन्मात्र भी नहीं है। जैसे शरीरमें माता और पिता—दोनोंके अंशका मिश्रण होता है, ऐसे जीवमें भगवान् और प्रकृतिके अंशका मिश्रण (संयोग) नहीं है, प्रत्युत यह केवल भगवान् का ही अंश है। अत: इसका सम्बन्ध केवल भगवान् के साथ है, प्रकृतिके साथ नहीं। प्रकृतिके साथ सम्बन्ध तो यह खुद जोड़ता है।

प्रकृतिके कार्य स्थूल,सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही अनर्थका कारण है। जीव शरीरको अपनी तरफ खींचता है (कर्षति) अर्थात् उसे अपना मानता है, पर जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको अपना मानता ही नहीं! यही जीवकी मूल भूल है।

हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोके’, इसलिये हम परमात्मामें ही स्थित हैं। परन्तु शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिका सम्बन्ध अपरा प्रकृतिके साथ है, इसलिये वे प्रकृतिमें ही स्थित हैं—‘प्रकृतिस्थानि’। शरीरके साथ हमारा मिलन कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं और परमात्मासे अलग हम कभी हुए ही नहीं, होंगे ही नहीं, हो सकते ही नहीं। हमसे दूर-से-दूर कोई वस्तु है तो वह शरीर है और समीप-से-समीप कोई वस्तु है तो वह परमात्मा है। परन्तु शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये माननेके कारण मनुष्यको उलटा दीखता है अर्थात् शरीर तो समीप दीखता है, परमात्मा दूर! शरीर तो प्राप्त दीखता है, परमात्मा अप्राप्त!

(श्लोक-८)
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर:।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥

जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको (ग्रहण करके ले जाती है), ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे इन (मनसहित इन्द्रियों)-को ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।

व्याख्या—वास्तवमें शुद्ध चेतन (आत्मा)-का किसी शरीरको प्राप्त करना और उसका त्याग करके दूसरे शरीरमें जाना हो नहीं सकता; क्योंकि आत्मा अचल और समानरूपसे सर्वत्र व्याप्त है (गीता २।१७,२४)। शरीरोंका ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्वके द्वारा ही होना सम्भव है, जबकि आत्मा कभी किसी भी देश-कालादिमें परिच्छिन्न नहीं हो सकती। परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य कर लेती है अर्थात् शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान लेती है, तब सूक्ष्मशरीरके आने-जानेको उसका आना-जाना कहा जाता है।

वायुका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जीव वायुकी तरह निर्लिप्त रहता है। शरीरसे लिप्त होनेपर भी वास्तवमें इसकी निर्लिप्तता ज्यों-की-त्यों रहती है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)।

(श्लोक-९)
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥

यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर ही श्रोत्र और नेत्र तथा त्वचा, रसना और घ्राण—इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।

व्याख्या—जैसे कोई व्यापारी किसी कारणवश एक जगहसे दूकान उठाकर दूसरी जगह लगाता है, ऐसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है और जैसे पहले शरीरमें विषयोंका रागपूर्वक सेवन करता था, ऐसे ही दूसरे शरीरमें जानेपर (वही स्वभाव होनेसे) विषयोंका सेवन करने लगता है। इस प्रकार जीवात्मा बार-बार विषयोंमें आसक्तिके कारण ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता रहता है। कारण कि विषयोंका सेवन करनेसे स्वयंकी गौणता और शरीर-संसारकी मुख्यता हो जाती है। इसलिये स्वयं भी जगद्‍रूप हो जाता है (गीता ७।१३)।

(श्लोक-१०)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:॥

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले (ज्ञानी मनुष्य ही) जानते हैं।

व्याख्या—शरीरको छोड़कर जाना, दूसरे शरीरमें स्थित होना और विषयोंको भोगना—तीनों क्रियाएँ अलग-अलग हैं, पर उनमें रहनेवाला जीवात्मा एक ही है—यह बात प्रत्यक्ष होते हुए भी अविवेकी मनुष्य इसको नहीं जानता अर्थात् अपने अनुभवको महत्त्व नहीं देता। कारण कि तीनों गुणोंसे मोहित होनेके कारण वह बेहोश-सा रहता है (गीता ७।१३)।

भगवान् ने पिछले श्लोकमें पाँच क्रियाएँ बतायी थीं—सुनना, देखना, स्पर्श करना, स्वाद लेना तथा सूँघना, और इस श्लोकमें तीन क्रियाएँ बतायी हैं— शरीरको छोड़कर जाना, दूसरे शरीरमें स्थित होना तथा विषयोंको भोगना। इन आठोंमें कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती, पर स्वयं निरन्तर रहता है। क्रियाएँ तो आठ हैं, पर इन सबमें स्वयं एक ही रहता है। इसलिये इनके भाव और अभावका, आरम्भ और अन्तका ज्ञान सबको होता है। जिसे आरम्भ और अन्तका ज्ञान होता है, वह स्वयं नित्य होता है—यह नियम है।

अनेक अवस्थाओंमें स्वयं एक रहता है और एक रहते हुए अनेक अवस्थाओंमें जाता है। यदि स्वयं एक न रहता तो सब अवस्थाओंका अलग-अलग अनुभव कौन करता? परन्तु ऐसी बात प्रत्यक्ष होते हुए भी विमूढ़ मनुष्य इस तरफ नहीं देखते, प्रत्युत ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले योगी मनुष्य ही देखते हैं।

(श्लोक-११)
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस:॥

यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्त:करण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते।

व्याख्या—सदा न भोग साथ रहता है, न संग्रह साथ रहता है—यह विवेक मनुष्यमें स्वत: है। परन्तु जो मनुष्य शास्त्र पढ़ते हुए, सत्संग करते हुए, साधन करते हुए भी अपने विवेककी तरफ ध्यान नहीं देते, भोग और संग्रहसे अलगावका अनुभव नहीं करते, वे मनुष्य ‘अकृतात्मा’ हैं। ऐसे मनुष्योंको अठारहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें भगवान् ने ‘अकृतबुद्धि’ और ‘दुर्मति’ कहा है। यद्यपि परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, तथापि भीतरमें राग, आसक्ति, सुखबुद्धि पड़ी रहनेसे वे साधन करते हुए भी परमात्माको नहीं जानते। कारण कि भोग तथा संग्रहमें रुचि रखनेवाले मनुष्यका विवेक स्थिर नहीं रहता।

पूर्वश्लोकमें जिन्हें ‘विमूढा:’ कहा गया है, उन्हींको यहाँ ‘अचेतस:’ कहा गया है। गुणोंसे मोहित होनेके कारण वे न तो विषयोंके विभागको जानते हैं और न स्वयंके विभागको ही जानते हैं अर्थात् भोगोंका संयोग-वियोग अलग है और स्वयं अलग है—यह नहीं जानते।

सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें भगवान् यह बताना चाहते हैं कि मेरा अंश जीवात्मा सर्वथा अलग है और जिस सामग्री (शरीरादि पदार्थ और क्रिया)-को वह भूलसे अपनी मानता है, वह सर्वथा अलग है। सूर्य और अमावस्याकी रात्रिकी तरह दोनोंका विभाग ही अलग-अलग है। उनका परस्पर संयोग होना सम्भव ही नहीं है। जो उपर्युक्त जड़ और चेतन—दोनोंके विभागको सर्वथा अलग-अलग देखता है, वही ज्ञानी और योगी है। परन्तु जो दोनोंको मिला हुआ देखता है, वह अज्ञानी और भोगी है।

(श्लोक-१२)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥

सूर्यको प्राप्त हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है,उस तेजको मेरा ही जान।

व्याख्या—प्रभाव और महत्त्वकी तरफ आकर्षित होना जीवका स्वभाव है। प्राकृत पदार्थोंके सम्बन्धसे जीव प्राकृत पदार्थोंके प्रभाव और महत्त्वसे प्रभावित हो जाता है। अत: जीवपर पड़े प्राकृत पदार्थोंके प्रभाव और महत्त्वको हटानेके लिये भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि उन पदार्थोंमें जो प्रभाव और महत्त्व देखनेमें आता है, वह वस्तुत: (मूलमें) मेरा ही है, उनका नहीं। सर्वोपरि प्रभावशाली तथा महत्त्वशाली मैं ही हूँ। मेरे ही प्रकाशसे सब प्रकाशित हो रहे हैं।

(श्लोक-१३)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:॥

मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ और (मैं ही) रसस्वरूप चन्द्रमा होकर समस्त ओषधियों (वनस्पतियों)-को पुष्ट करता हूँ।

व्याख्या—पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान् की अपरा प्रकृति है (गीता ७।४)। अत: इसके उत्पादक, धारक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् की शक्ति होनेसे अपरा प्रकृति भगवान् से अभिन्न है।

(श्लोक-१४)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला मैं प्राण-अपानसे युक्त वैश्वानर (जठराग्नि) होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ।
गीतामें सब जगह प्राण और अपान—इन दोका ही वर्णन हुआ है; जैसे—
(१) अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:॥
(४। २९)
(२) प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
(५। २७)*

व्याख्या—पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करना, चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियोंका पोषण करना, फिर उनको खानेवाले प्राणियोंके भीतर जठराग्नि होकर खाये हुए अन्नको पचाना आदि सम्पूर्ण कार्य भगवान् की ही शक्तिसे होते हैं। परन्तु मनुष्य उन कार्योंको अपने द्वारा किया जानेवाला मानकर व्यर्थमें ही अभिमान कर लेता है; जैसे बैलगाड़ीके नीचे छायामें चलनेवाला कुत्ता समझता है कि बैलगाड़ी मैं ही चलाता हूँ!

(श्लोक-१५)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ।

व्याख्या—पिछले तीन श्लोकोंमें भगवान् ने प्रभाव और क्रिया-रूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया, अब प्रस्तुत श्लोकमें स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोकमें स्वयं भगवान् का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान् का वर्णन नहीं। मूलमें एक ही तत्त्व है, केवल वर्णनमें भिन्नता है।

पहले ‘ममैवांशो जीवलोके’ (१५। ७) पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् अपने हैं और यहाँ ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ पदोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् अपनेमें हैं। भगवान् को अपना स्वीकार करनेसे उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और अपनेमें स्वीकार करनेसे उन्हें पानेके लिये दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं रहेगी। सबके हृदयमें रहनेके कारण भगवान् प्राणिमात्रको नित्यप्राप्त हैं; अत: किसी भी साधकको भगवान् की प्राप्तिसे निराश नहीं होना चाहिये।

भगवान् कहते हैं कि वेद अनेक हैं, पर उन सबमें जाननेयोग्य एक मैं ही हूँ और उन सबको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ—‘वासुदेव: सर्वम्’।

(श्लोक-१६)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी)—ये दो प्रकारके ही पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर क्षर और जीवात्मा अक्षर कहा जाता है।

व्याख्या—पहले छठे श्लोकमें और फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान् ने अलौकिक तत्त्वका वर्णन किया कि स्वतन्त्र सत्ता अलौकिककी ही है, लौकिककी नहीं। लौकिककी सत्ता अलौकिकसे ही है। अलौकिकसे ही लौकिक प्रकाशित होता है। लौकिकमें जो प्रभाव देखनेमें आता है, वह सब अलौकिकका ही है। अब सोलहवें श्लोकमें भगवान् ‘लोके’ पदसे ‘लौकिक तत्त्व’ का वर्णन करते हैं।

क्षर (जगत्) तथा अक्षर (जीव)—दोनों लौकिक हैं, और भगवान् इन दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं—‘उत्तम: पुरुषस्त्वन्य:’ (गीता १५।१७)। कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दो योगमार्ग भी लौकिक हैं—‘लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा........’ (गीता ३।३)। क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; परन्तु भक्तियोग अलौकिक है, जो भगवान् को लेकर चलता है। सातवें अध्यायमें वर्णित अपरा प्रकृतिको यहाँ ‘क्षर’ नामसे और परा प्रकृतिको यहाँ ‘अक्षर’ नामसे कहा गया है।

(श्लोक-१७)
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:॥

उत्तम पुरुष तो अन्य (विलक्षण) ही है, जो ‘परमात्मा’—इस नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।

व्याख्या—पुरुषोत्तमको ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं। अत: परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं। परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं। ‘अन्य’ का स्पष्टीकरण भगवान् ने अगले श्लोकमें किया है।

भगवान् मात्र प्राणियोंका पालन-पोषण करते हैं। पालन-पोषण करनेमें भगवान् किसीके साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते। वे भक्त-अभक्त, पापी-पुण्यात्मा, आस्तिक-नास्तिक आदि सबका समानरूपसे पालन-पोषण करते हैं। प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है कि भगवान् द्वारा रचित सृष्टिमें सूर्य सबको समानरूपसे प्रकाश देता है,पृथ्वी सबको समानरूपसे धारण करती है, वायु श्वास लेनेके लिये सबको समानरूपसे प्राप्त होती है, अन्न-जल सबको समानरूपसे तृप्त करते हैं, इत्यादि। जब भगवान् के द्वारा रचित सृष्टि भी इतनी निष्पक्ष, उदार है तो फिर भगवान् स्वयं कितने निष्पक्ष, उदार होंगे!

आधुनिक वेदान्तियोंने ईश्वरको कल्पित बताकर साधक-जगत् की बहुत बड़ी हानि की है! उन्हें इस बातका भय है कि ईश्वरको माननेसे अपने अद्वैत सिद्धान्तमें कमी आ जायगी! परन्तु ईश्वर किसकी कल्पना है—इसका उत्तर उनके पास नहीं है। वास्तवमें सत्ता एक ही (अद्वैत) है, पर अपने रागके कारण दूसरी सत्ता (द्वैत) दीखती है। दूसरी सत्ताका तात्पर्य संसारसे है, ईश्वरसे नहीं; क्योंकि संसार ‘पर’ है और ईश्वर ‘स्व’ (स्वकीय) है। अपना राग मिटाये बिना दूसरी सत्ता नहीं मिटेगी। राग तो अपना है, पर मान लिया ईश्वरको कल्पित! अत: ईश्वरको कल्पित न मानकर अपना राग मिटाना चाहिये। ईश्वर कल्पित नहीं है, प्रत्युत अलौकिक है। वह मायारूपी धेनुका बछड़ा नहीं है, प्रत्युत साँड़ है! उपनिषद्में भी आया है—‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’ (श्वेताश्वतर० ४। १०) ‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये। आजतक जिस ईश्वरके असंख्य भक्त हो चुके हैं, वह कल्पित कैसे हो सकता है?’

(श्लोक-१८)
यस्मात्क्षरमतीतोऽह‍‍‍मक्षरादपि चोत्तम:।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:॥

कारण कि मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें ‘पुरुषोत्तम’ नामसे प्रसिद्ध हूँ।

व्याख्या—क्षर और अक्षरकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, पर परमात्माकी स्वतन्त्र सत्ता है। क्षर और अक्षर दोनों परमात्मामें ही रहते हैं। परन्तु अक्षर अर्थात् जीव क्षरके साथ सम्बन्ध जोड़कर उसके अधीन हो जाता है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। परमात्मा क्षरके अधीन नहीं होते, प्रत्युत क्षरसे अतीत रहते हैं। इसलिये परमात्मा अक्षर (जीव)-से भी उत्तम हैं। यदि जीव जगत् के साथ सम्बन्ध न जोड़कर उसके स्वामी परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़े तो वह परमात्मासे अभिन्न (आत्मीय) हो जायगा—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ (गीता ७।१८)।

मुक्तिमें तो अक्षर (स्वरूप)-में स्थिति होती है, पर भक्तिमें अक्षरसे भी उत्तम पुरुषोत्तमकी प्राप्ति होती है। स्वरूप अंश है, पुरुषोत्तम अंशी हैं।

(श्लोक-१९)
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

हे भरतवंशी अर्जुन! इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है।

व्याख्या—किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बातपर मन रागपूर्वक लगता है और बुद्धि श्रद्धापूर्वक। जब मनुष्य भगवान् को क्षरसे अतीत जान लेता है, तब उसका मन क्षरसे हटकर भगवान् में लग जाता है। जब वह भगवान् को अक्षरसे उत्तम जान लेता है, तब उसकी बुद्धि भगवान् में लग जाती है फिर उसकी प्रत्येक वृत्ति और क्रियासे स्वत: भगवान् का भजन होता है। कारण कि उसकी दृष्टिमें एक भगवान् के सिवाय दूसरा कोई होता ही नहीं।

गीतामें ‘सर्ववित्’ शब्द केवल भक्तके लिये ही यहाँ आया है। भक्त समग्रको अर्थात् लौकिक और अलौकिक—दोनोंको जानता है, इसलिये वह सर्ववित् होता है। कारण कि लौकिकके अन्तर्गत अलौकिक नहीं आ सकता, पर अलौकिकके अन्तर्गत लौकिक भी आ जाता है। अत: निर्गुण तत्त्व (अक्षर)-को जाननेवाला ब्रह्मज्ञानी सर्ववित् नहीं होता, प्रत्युत समग्र भगवान् को जाननेवाला भक्त सर्ववित् होता है।

(श्लोक-२०)
इति गुह्यतमं शास्त्र‍‍‍मिदमुक्तं मयानघ।
एतद्‍बुद्‍ध्‍वा बुद्धिमान्स्या‍त् कृतकृत्यश्च भारत॥

हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (ज्ञात-ज्ञातव्य) तथा कृतकृत्य हो जाता है।

व्याख्या—भगवान् ने इस अध्यायमें अपने-आपको पुरुषोत्तमरूपसे अर्थात् अलौकिक समग्ररूपसे प्रकट किया है, इसलिये इसे ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है।

पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान् का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिमें मनुष्य प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है। अत: पूर्वश्लोकमें प्राप्तप्राप्तव्य होनेकी बात माननी चाहिये। इस श्लोकमें (‘बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च’ पदमें) ज्ञातज्ञातव्य तथा कृतकृत्य होनेकी बात आयी है।

लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अत: अलौकिक परमात्मा ही प्राप्तव्य हैं। इस श्लोकसे यह भाव निकलता है कि भक्तको ज्ञानयोग तथा कर्मयोग—दोनोंका फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ज्ञातज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है (गीता ७।२९-३०,१०।१०-११)।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥

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