ॐ श्रीपरमात्मने नम:
अथाष्टमोऽध्याय:
आठवाँ अध्याय
(श्लोक-१)
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
(श्लोक-२)
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि:॥
अर्जुन बोले—हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदैव किसको कहा जाता है? यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस देहमें कैसे है? हे मधुसूदन! वशीभूत अन्त:करणवाले मनुष्योंके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं?
(श्लोक-३)
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित:॥
श्रीभगवान् बोले—परम अक्षर ब्रह्म है और परा प्रकृति (जीव)-को अध्यात्म कहते हैं। प्राणियोंकी सत्ताको प्रकट करनेवाला त्याग कर्म कहा जाता है।
(श्लोक-४)
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥
हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! क्षर भाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ अधिभूत हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अधिदैव हैं और इस देहमें (अन्तर्यामी-रूपसे) मैं ही अधियज्ञ हूँ।
व्याख्या—जैसे एक ही जल-तत्त्व परमाणु, भाप, बादल, वर्षाकी क्रिया, बूँदें और ओले (बर्फ)-के रूपसे भिन्न-भिन्न दीखते हुए भी वास्तवमें एक ही है, इसी तरह एक ही परमात्मतत्त्व ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके रूपसे भिन्न-भिन्न दीखते हुए भी वास्तवमें एक ही है। परमाणुरूपसे जल ‘ब्रह्म’ है, भापरूपसे जल ‘अधियज्ञ’ है, बादलरूपसे जल ‘अधिदैव’ है, बूँदेंरूपसे जल ‘अध्यात्म’ है, वर्षाकी क्रिया ‘कर्म’ है और बर्फरूपसे जल ‘अधिभूत’ है। परमात्माके इसी समग्ररूपके लिये गीतामें आया है—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९), ‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)।
(श्लोक-५)
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥
जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूपको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।
व्याख्या—भगवान् ने मनुष्यपर विशेष कृपा करके उसे यह छूट दी है कि उसका जीवन कैसा ही रहा हो, यदि अन्तसमयमें भी वह मुझे याद कर ले तो मैं उसका कल्याण कर दूँगा। कारण कि भगवान् ने अहैतुकी कृपासे जीवको अपना कल्याण करनेके लिये ही मनुष्यशरीर दिया है।
वास्तवमें सब समय अन्तसमय ही है; क्योंकि अन्तसमय किसी भी समय आ सकता है। ऐसा कोई क्षण नहीं है, जिस क्षणमें अन्तसमय न आता हो। इसलिये मनुष्यको हर समय भगवान् को याद रखना चाहिये।
(श्लोक-६)
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।
व्याख्या—सातवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान् ने ‘यो यो यां यां तनुं भक्त:’ आदि पदोंसे उपासनाके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बतायी थी। अब यहाँ गतिके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बताते हैं। तात्पर्य है कि भगवान् अपने दयालु स्वभावके कारण मनुष्यकी स्वतन्त्रतामें बाधक नहीं बनते; परन्तु मनुष्य ही इस मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके (भोग तथा संग्रहमें लगकर) अपना पतन कर लेता है और दुर्गतिमें चला जाता है। मनुष्य यदि चाहे तो इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके देवताओंके लिये भी दुर्लभ पदको प्राप्त कर सकता है।
(श्लोक-७)
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्-मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
व्याख्या—ऐसा कोई समय नहीं है, जिसमें अन्तकाल (मृत्यु) न आ सके। इसलिये मनुष्यको नित्य-निरन्तर भगवान् का स्मरण करते रहना चाहिये। फिर किसी भी समय अन्तकाल आयेगा तो वह भगवान् का स्मरण करते हुए ही शरीर छोड़ेगा, जिससे वह भगवान् को ही प्राप्त होगा।
पूर्वपक्ष—यहाँ युद्धका प्रसंग है। निरन्तर भगवत्स्मरण करते हुए युद्ध कैसे होगा और युद्ध करते हुए निरन्तर भगवत्स्मरण कैसे होगा?
उत्तरपक्ष—एक याद करते हैं, एक याद रहती है। जो बात अहंतामें बैठ जाती है, वह भूलती नहीं। अत: साधक सच्चे हृदयसे दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर ले कि ‘मैं भगवान् का ही हूँ; भगवान् ही मेरे हैं’ तो फिर सब कार्य करते हुए भी भगवान् की याद स्वत: निरन्तर बनी रहेगी। जैसे, ब्राह्मणको अपने ब्राह्मणपनेका स्मरण बिना याद किये नित्य-निरन्तर बना रहता है। नींदमें भी जगाकर उससे पूछो तो वह यही कहेगा कि मैं ब्राह्मण हूँ। इसमें अभ्यास नहीं है, प्रत्युत स्वीकृति है। विवाह होनेपर पतिव्रता स्त्री बिना याद किये पतिको याद रखती है, स्वप्नमें भी नहीं भूलती। यह स्वीकृति है, जिसकी कभी विस्मृति नहीं होती। भगवान् के साथ सम्बन्ध स्वीकार करनेपर साधकके मन-बुद्धि स्वत: भगवान् के अर्पित हो जाते हैं।
(श्लोक-८)
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
हे पृथानन्दन! अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़नेवाला मनुष्य) उसीको प्राप्त हो जाता है।
(श्लोक-९)
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य:।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्॥
जो सर्वज्ञ, अनादि, सबपर शासन करनेवाला, सूक्ष्मसे अत्यन्त सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करने-वाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाश-स्वरूप अर्थात् ज्ञानस्वरूप—ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है।
(श्लोक-१०)
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है।
(श्लोक-११)
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।
व्याख्या—इस श्लोकमें संकेतरूपसे चारों आश्रमोंका वर्णन ले सकते हैं; जैसे—‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ पदोंसे गृहस्थाश्रम, ‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:’ पदोंसे संन्यास और वानप्रस्थ-आश्रम तथा ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ पदोंसे ब्रह्मचर्याश्रम ले सकते हैं। तात्पर्य है कि चारों आश्रमोंका एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है।
(श्लोक-१२)
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
(श्लोक-१३)
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्मका (मानसिक) उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
(श्लोक-१४)
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
हे पृथानन्दन! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।
व्याख्या—भक्त केवल भगवान् को ही अपना मानता है और सदा उन्हें अपने पास देखता है, इसलिये वह नित्य-निरन्तर भगवान् में ही लगा रहता है। उसकी दृष्टिमें एक भगवान् के सिवाय अन्यकी सत्ता न होनेसे उसका मन भगवान् को छोड़कर कहाँ जाय? कैसे जाय? क्यों जाय? इसलिये वह अनन्य चित्तवाला हो जाता है। उसे भगवान् का स्मरण करना नहीं पड़ता, प्रत्युत उसके द्वारा स्वत: भगवान् का स्मरण होता है। ऐसे नित्य-निरन्तर भगवान् में लगे हुए भक्तके लिये भगवान् सुलभ हैं।
‘सततम्’ का अर्थ है—जिस दिनसे साधकने इस बातको पकड़ा, उस दिनसे लेकर मृत्युतक भगवान् का स्मरण करे; और ‘नित्यश:’ का अर्थ है—जबसे नींद खुले, तबसे लेकर गाढ़ नींद आनेतक भगवान् का स्मरण करे।
भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, अवस्था, परिस्थिति आदिमें परिपूर्ण होनेसे प्राणिमात्रको नित्यप्राप्त हैं। अत: उनके विषयमें सुलभता अथवा दुर्लभता कहना बनता ही नहीं! परन्तु लोगोंने उन्हें दुर्लभ मान रखा है, इस मान्यताको मिटानेके लिये भगवान् यहाँ अपनेको सुलभ बताते हैं।
पूर्वपक्ष—तो फिर सबको भगवत्प्राप्तिका अनुभव क्यों नहीं हो रहा है?
उत्तरपक्ष—जैसे गायके शरीरमें व्याप्त घी किसीके काम नहीं आता, ऐसे ही सबमें व्याप्त होनेपर भी भगवान् लगनके बिना अनुभवमें नहीं आते। लगन न होनेका कारण है—शरीर-संसारको सत्ता और महत्ता देकर उन्हें अपना मानना। इसलिये भगवान् ने नित्य-निरन्तर अपनेमें लगे हुए भक्तके लिये ही अपनेको सुलभ बताया है।
(श्लोक-१५)
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:॥
महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दु:खालय अर्थात् दु:खोंके घर और अशाश्वत अर्थात् निरन्तर बदलनेवाले पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।
व्याख्या—भोग और संग्रहमें लगे हुए सकाम मनुष्यके लिये तो यह संसार दु:खालय है, पर सेवा और भगवद्भजनमें लगे हुए निष्काम मनुष्यके लिये यह संसार भगवत्स्वरूप है।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति एक बार होती है और सदाके लिये होती है, इसलिये परमात्माको प्राप्त हुए मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता, वह सदा-सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है। यदि उसमें भक्तिके संस्कार हों तो वह जन्म-मरणसे मुक्तिके साथ-साथ प्रतिक्षण वर्धमान परम प्रेमको भी प्राप्त कर लेता है।
(श्लोक-१६)
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्तीवाले हैं अर्थात् वहाँ जानेपर पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।
व्याख्या—भोग और संग्रहकी आसक्तिसे ही पुनर्जन्म होता है। इसलिये जिस मनुष्यमें भोग और संग्रहकी आसक्ति है, वह यदि पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ब्रह्मलोकतक चला जाय तो भी उसे लौटकर जन्म-मरणमें अर्थात् दु:खालय संसारमें आना ही पड़ता है।
ब्रह्मलोकतक सभी लोकोंकी प्राप्ति कर्मोंका फल है। जब प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है तो फिर उसका फल अविनाशी कैसे होगा? परन्तु परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंका फल नहीं है। अत: परमात्माकी प्राप्ति होनेपर फिर वहाँसे लौटकर दु:खालय संसारमें नहीं आना पड़ता।
(श्लोक-१७)
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना:॥
जो मनुष्य ब्रह्माके एक हजार चतुर्युगीवाले एक दिनको और एक हजार चतुर्युगीवाली एक रात्रिको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जाननेवाले हैं।
(श्लोक-१८)
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥
ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-से सम्पूर्ण शरीर पैदा होते हैं और ब्रह्माकी रातके आरम्भकालमें उस अव्यक्त नामवाले (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-में ही सम्पूर्ण शरीर लीन हो जाते हैं।
(श्लोक-१९)
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥
हे पार्थ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है।
व्याख्या—बदलनेवाले शरीर-संसारका विभाग अलग है और न बदलनेवाले आत्मा-परमात्माका विभाग अलग है। शरीर-संसार तो बार-बार उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं, पर आत्मा-परमात्मा वे-के-वे ही रहते हैं। कितने ही प्रलय-महाप्रलय और सर्ग-महासर्ग क्यों न हो जायँ, जीवात्मा स्वयं वही-का-वही रहता है। इसलिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति आदिके अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर स्वयंके अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। परन्तु शरीरको मैं, मेरा तथा मेरे लिये मान लेनेके कारण शरीरके परिवर्तनको जीवात्मा अपना परिवर्तन मान लेता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है।
जैसे रेलगाड़ीपर चढ़नेसे मनुष्य रेलगाड़ीके परवश हो जाता है, जहाँ रेलगाड़ी जायगी, वहाँ उसे जाना ही पड़ता है, ऐसे ही शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे मनुष्य प्रकृतिके परवश हो जाता है और उसे जन्म-मरणके चक्रमें जाना ही पड़ता है।
(श्लोक-२०)
परस्तस्मात्तु भावोऽन्यो-ऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥
परन्तु उस अव्यक्त (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-से अन्य (विलक्षण) अनादि अत्यन्त श्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त (ईश्वर) है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता।
व्याख्या—ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे भी श्रेष्ठ कारणशरीर (मूल प्रकृति) है और उससे भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं। परमात्माके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर उनसे श्रेष्ठ कोई हो ही कैसे सकता है (गीता ११।४३)। असंख्य ब्रह्माजी उत्पन्न हो-होकर लीन हो गये, पर परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं।
(श्लोक-२१)
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्-तमाहु: परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
उसीको अव्यक्त और अक्षर—ऐसा कहा गया है तथा उसीको परम गति कहा गया है और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर संसारमें नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।
व्याख्या—वास्तवमें परमात्मतत्त्व वर्णनातीत है। अव्यक्त, अक्षर, परमगति आदि नाम उस तत्त्वका संकेतमात्र करते हैं; क्योंकि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति आदिसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है। उसे प्राप्त होनेपर जीव लौटकर संसारमें नहीं आता। कारण कि जीव उस परमात्मतत्त्वका सनातन अंश होनेसे उससे अलग नहीं है। संसारमें तो वह भूलसे अपनेको स्थित मानता है। वास्तवमें शरीर ही संसारमें स्थित है, स्वयं नहीं।
(श्लोक-२२)
पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥
हे पृथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है।
व्याख्या—ज्ञानमार्गमें तो ज्ञानी पुरुष संसारसे छूट जाता है, मुक्त हो जाता है और अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें संसारसे मुक्त होनेके साथ-साथ भक्तको भगवान् की तथा उनके प्रेमकी भी प्राप्ति हो जाती है। अत: कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं और भक्तियोग साध्य है।
(श्लोक-२३)
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिन:।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥
परन्तु हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और जिस मार्गमें गये हुए आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा।
व्याख्या—जैसे किसी स्थानपर हमारी कोई वस्तु (कपड़ा, थैला, रुपये आदि) छूट जाती है तो उसे लेनेके लिये हम वापस उस स्थानपर जाते हैं, ऐसे ही संसारमें किसी वस्तु-व्यक्तिमें मनुष्यकी आसक्ति रहती है तो उसे पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है। तात्पर्य है कि परिवर्तनशील शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे पीछे लौटकर आना पड़ता है और शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध न रखनेसे पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता।
(श्लोक-२४)
अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना:॥
जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता और छ: महीनोंवाले उत्तरायणका अधिपति देवता है, उस मार्गसे शरीर छोड़कर गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माके साथ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं।
व्याख्या—पहले साधनावस्थामें जिनके भीतर ब्रह्मलोककी वासना अथवा अपने मतका आग्रह रहा है, वे क्रममुक्तिसे पहले ब्रह्मलोकमें जाते हैं और फिर महाप्रलय आनेपर ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं।
क्रममुक्तिमें ब्रह्मलोक मार्गमें आनेवाले एक स्टेशनकी तरह है, जहाँ भोगोंकी वासनावाले मनुष्य उतरते हैं। परन्तु जिनमें भोगोंकी वासना नहीं है, वे वहाँ नहीं उतरते। हमारा कोई प्रयोजन न हो तो मार्गमें स्टेशन आये या जंगल, क्या फर्क पड़ता है!
(श्लोक-२५)
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्-योगी प्राप्य निवर्तते॥
जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छ: महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्गसे गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है।
(श्लोक-२६)
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुन:॥
क्योंकि शुक्ल और कृष्ण—ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत् (प्राणिमात्र)-के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गयी हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जानेवालेको पुन: लौटना पड़ता है।
(श्लोक-२७)
नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥
हे पृथानन्दन! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अत: हे अर्जुन! तू सब समयमें योगयुक्त (समतामें स्थित) हो जा।
व्याख्या—सकाम (भोग तथा संग्रहकी कामनावाला) मनुष्य ही मोहित होता अर्थात् जन्म-मरणमें जाता है। शुक्ल और कृष्णमार्गको जाननेवाला मनुष्य निष्काम (योगी) हो जाता है, इसलिये वह जन्म-मरणमें नहीं जाता अर्थात् कृष्णमार्गको प्राप्त नहीं होता।
(श्लोक-२८)
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
योगी (भक्त) इसको (इस अध्यायमें वर्णित विषयको)जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदि-स्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—पूर्वश्लोकमें शुक्ल और कृष्ण—दोनों गतियोंका उपसंहार करके अब भगवान् यहाँ पूरे अध्यायका उपसंहार करते हैं। वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान आदि जितने भी पुण्यकर्म हैं, उनका अधिक-से-अधिक फल ब्रह्मलोककी प्राप्ति होना है, जहाँसे पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है, परन्तु भगवान् का आश्रय लेनेवाला भक्त उस ब्रह्मलोकका भी अतिक्रमण करके परमधामको प्राप्त हो जाता है, जहाँसे पुन: लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्याय:॥ ८॥